CG High Court:बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि दावे पर विचार करने के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने की शर्त अनिवार्य नहीं बनाई जा सकती। जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने इस संबंध में जारी दो विभागीय पत्रों को निरस्त करते हुए अधिकारियों को पंजीकृत दत्तक विलेख और अन्य दस्तावेजों के आधार पर दावे पर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उत्तराधिकार प्रमाणपत्र को अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर विचार करने की पूर्व शर्त नहीं बनाया जा सकता। हालांकि, नियुक्ति का अधिकार स्वतः नहीं मिल जाता। संबंधित विभाग को लागू अनुकंपा नियुक्ति नीति और कानूनी प्रावधानों के तहत याचिकाकर्ता की पात्रता की जांच करनी होगी।

CG High Court:मामला कोरबा निवासी पवन मेश्राम की याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता के अनुसार, उनकी बुआ दुर्गा मेश्राम जांजगीर में अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) कार्यालय में सहायक ग्रेड-दो के पद पर कार्यरत थीं। वह तलाकशुदा थीं और उनकी कोई संतान नहीं थी।

पवन मेश्राम ने दावा किया कि दुर्गा मेश्राम ने उन्हें अपने जीवनकाल में गोद लिया था। इसके लिए 8 फरवरी 2019 को पंजीकृत दत्तक विलेख तैयार कराया गया था। इससे पहले 24 नवंबर 2018 को सेवा अभिलेख में नाम दर्ज करने और नामांकित व्यक्तियों में बदलाव के लिए आवेदन भी दिया गया था।

CG High Court: दुर्गा मेश्राम की 24 मार्च 2019 को सेवाकाल के दौरान मृत्यु हो गई। इसके बाद पवन मेश्राम ने 9 मई 2019 को अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। लंबे समय तक आवेदन पर निर्णय नहीं होने के कारण उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया।

याचिका के अनुसार, 24 जनवरी 2023 को हाई कोर्ट ने अधिकारियों को अनुकंपा नियुक्ति के आवेदन पर शीघ्र निर्णय लेने का निर्देश दिया था। इसके बाद विभागीय अधिकारियों ने 24 फरवरी और 21 जुलाई 2023 को पत्र जारी कर याचिकाकर्ता से उत्तराधिकार प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने को कहा।

याचिकाकर्ता ने इन पत्रों को चुनौती देते हुए दलील दी कि अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर विचार करने के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र अनिवार्य नहीं है। उन्होंने पूर्व के न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पंजीकृत दत्तक विलेख और अन्य संबंधित दस्तावेजों के आधार पर दावे की जांच की जा सकती है।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता को दत्तक पुत्र होने की स्थिति प्रमाणित करनी होगी।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि उत्तराधिकार प्रमाणपत्र का संबंध मृतक के बकाया ऋण और संबंधित संपत्ति संबंधी दावों से होता है। इसे अनुकंपा नियुक्ति के आवेदन पर विचार करने की अनिवार्य शर्त नहीं बनाया जा सकता।

कोर्ट ने हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम की धारा 16 का भी उल्लेख किया। इस प्रावधान के तहत निर्धारित शर्तें पूरी होने पर पंजीकृत दत्तक विलेख को दत्तक ग्रहण के पक्ष में खंडनीय कानूनी अनुमान का आधार माना जा सकता है। संबंधित दस्तावेजों और परिस्थितियों के आधार पर दत्तक ग्रहण के दावे की जांच की जा सकती है।

दोनों विभागीय पत्र निरस्त, नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश

हाई कोर्ट ने 24 फरवरी और 21 जुलाई 2023 को जारी दोनों पत्रों को निरस्त कर दिया। साथ ही, संबंधित अधिकारियों को 14 जून 2013 की लागू अनुकंपा नियुक्ति नीति और अन्य कानूनी प्रावधानों के अनुसार पवन मेश्राम के दावे पर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया।