bankipur election results/बिहार की राजनीति में आज एक ऐसा ऐतिहासिक उलटफेर देखने को मिला है, जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की थी। राजधानी पटना के जिस बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र को पिछले तीन दशकों से भारतीय जनता पार्टी का ‘अजेय दुर्ग’ माना जाता था, आज वहां प्रशांत किशोर के ‘जन सुराज’ की ऐसी लहर चली कि भाजपा का वह किला ताश के पत्तों की तरह ढह गया। यह हार भाजपा के लिए इसलिए भी अधिक शर्मनाक और दर्दनाक है.

bankipur election results/ क्योंकि बांकीपुर वह सीट है जिसका प्रतिनिधित्व खुद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन करते आ रहे थे। उनके अध्यक्ष बनने के बाद खाली हुई इस सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने न केवल भाजपा के ओवर-कॉन्फिडेंस को चकनाचूर कर दिया है, बल्कि प्रशांत किशोर को बिहार की मुख्यधारा की राजनीति में एक कद्दावर खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर दिया है।

bankipur election results/मतगणना के अंतिम नतीजों के अनुसार, जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बांकीपुर सीट पर शानदार जीत दर्ज की है। उन्हें कुल 63,203 वोट मिले, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी भाजपा के नीरज कुमार को 44,250 वोटों से संतोष करना पड़ा। तीसरे नंबर पर राष्ट्रीय जनता दल की रेखा कुमारी रहीं, जिन्हें महज 14,085 वोट मिले।

bankipur election results.यह जीत इसलिए भी अचंभित करने वाली है क्योंकि 2025 के पिछले चुनाव में इसी सीट पर जन सुराज की उम्मीदवार वंदना कुमारी को मात्र 7,717 वोट मिले थे। महज कुछ ही समय में 7 हजार से 63 हजार तक का यह सफर बिहार की बदलती राजनीतिक हवा का सबसे बड़ा प्रमाण है।

आखिर भाजपा अपने इस सबसे मजबूत गढ़ को बचाने में नाकाम क्यों रही? इसके पीछे कई बड़े कारण उभरकर सामने आए हैं। सबसे प्रमुख कारण ‘नीट छात्र आंदोलन’ का असर रहा। नीट यूजी पेपर लीक मामले में दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुआ आंदोलन जब बिहार पहुंचा और छात्रों पर लाठीचार्ज हुआ, तो युवाओं में केंद्र और राज्य सरकार के खिलाफ गहरा गुस्सा पैदा हो गया।

भले ही बाद में सरकार ने मांगें मानीं और शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन छात्रों की नाराजगी ईवीएम में भाजपा के खिलाफ वोट बनकर निकली। इसके अलावा, भोजपुर जिले में हुए भरत तिवारी एनकाउंटर ने भी आग में घी डालने का काम किया, जिसे लेकर पूरे प्रदेश में भारी विरोध था। लोगों के बीच इस एनकाउंटर को लेकर व्याप्त आक्रोश का खामियाजा भी भाजपा को इस उपचुनाव में भुगतना पड़ा।

रणनीतिक मोर्चे पर भी भाजपा ने इस बार कई गलतियां कीं। चुनाव से ठीक पहले उम्मीदवार बदलने का निर्णय (अभिषेक बंटी की जगह नीरज को टिकट देना) पार्टी के कार्यकर्ताओं और जनता के बीच भ्रम पैदा कर गया।

प्रशांत किशोर ने इस कमजोरी का पूरा फायदा उठाया और लोगों को यह समझाने में सफल रहे कि भाजपा केवल अपने सिंबल पर किसी को भी थोपकर नहीं जीत सकती। वहीं, भाजपा का ओवर-कॉन्फिडेंस इतना ज्यादा था कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और केंद्रीय मंत्रियों की पूरी फौज बांकीपुर में कैंप करती रही, लेकिन वे जनता की नब्ज नहीं पहचान सके। दूसरी ओर, विपक्ष के लगभग गायब रहने (कांग्रेस की अनुपस्थिति और आरजेडी की सुस्ती) के कारण सरकार विरोधी सारा वोट एकमुश्त प्रशांत किशोर के खाते में चला गया।

इस चुनाव की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि बिहार की राजनीति से ‘जाति का जहर’ गायब नजर आया। पहली बार लोगों ने जाति-पाती के समीकरणों को दरकिनार कर विकास और बदलाव के नाम पर प्रशांत किशोर को अपना समर्थन दिया। प्रशांत किशोर पिछले कई महीनों से बिहार के गांवों और शहरों में घूम-घूमकर जिस तरह आमजन के बुनियादी मुद्दे उठा रहे थे, उसने जनता के साथ उनका सीधा संवाद स्थापित कर दिया था। बांकीपुर की यह जीत संकेत है कि अब बिहार की जनता पुराने घिसे-पिटे राजनीतिक चेहरों और वादों से हटकर एक नए विकल्प की तलाश में है।