CG News-बगैर सुनवाई नौकरी से निकालना असंवैधानिक, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एनएचएम कर्मी की बर्खास्तगी रद्द कर सेवा बहाली का दिया आदेश

CG News/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कर्मचारी अधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी कर्मचारी की सेवाएं केवल ‘असंतोषजनक कार्य’ का हवाला देकर बिना कारण बताओ नोटिस या बिना सुनवाई के समाप्त नहीं की जा सकतीं। जस्टिस बीडी गुरु की एकल पीठ ने कोरबा जिले में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत कार्यरत एक महिला स्वास्थ्य कर्मी की सेवा समाप्ति के आदेश को असंवैधानिक और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत ठहराते हुए रद्द कर दिया है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को बहाल करने के निर्देश दिए हैं, हालांकि विभाग को यह छूट दी है कि वे नियमानुसार और कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए नए सिरे से कार्यवाही कर सकते हैं।

यह पूरा मामला राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) जिला कोरबा से जुड़ा है, जहां याचिकाकर्ता सुनीता जांगड़े (31 वर्ष) जिला क्षय रोग नियंत्रण कार्यालय में ‘ट्यूबरकुलोसिस हेल्थ विजिटर’ (T.B.H.V.) के पद पर संविदा नियुक्त थीं। कोरबा के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) ने 6 मई 2026 को एक आदेश जारी कर सुनीता जांगड़े की सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी थीं। विभाग का आरोप था कि उनका कार्य संतोषजनक नहीं है। इस आदेश के खिलाफ सुनीता ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर न्याय की गुहार लगाई थी।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्रीकांत कौशिक ने कोर्ट को बताया कि सीएमएचओ का यह आदेश पूरी तरह से एकतरफा और मनमाना है। उन्होंने एनएचएम की ‘मानव संसाधन नीति-2018’ के क्लॉज 34.2 का महत्वपूर्ण हवाला देते हुए दलील दी कि यदि किसी कर्मचारी का प्रदर्शन खराब भी है, तो भी उसे नौकरी से निकालने से पहले स्पष्टीकरण देने और अपना पक्ष रखने का प्रभावी अवसर देना अनिवार्य है। इस मामले में विभाग ने ऐसी किसी भी अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया, जो सीधे तौर पर संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। उन्होंने कोर्ट के समक्ष पूर्व में दिए गए न्यायिक दृष्टांतों की नजीर भी पेश की।

दूसरी ओर, राज्य सरकार और मिशन डायरेक्टर की ओर से पक्ष रखते हुए अधिवक्ता आकांक्षा वर्मा ने दलील दी कि याचिकाकर्ता को पहले भी काम में सुधार के लिए नोटिस दिए गए थे, लेकिन उनके प्रदर्शन में कोई बदलाव नहीं आया। विभाग का तर्क था कि सुधार न होने की स्थिति में ही अनुबंध समाप्त करने का निर्णय लिया गया, इसलिए इसमें कोई कानूनी खामी नहीं है।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने पाया कि सेवा समाप्ति के अंतिम आदेश से पहले याचिकाकर्ता को कोई औपचारिक कारण बताओ नोटिस जारी नहीं किया गया था और न ही उनकी बात सुनी गई। कोर्ट ने अपने फैसले में कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि एनएचएम की अपनी नीति ही सुनवाई का अवसर देने का प्रावधान करती है, जिसकी अनदेखी करना कानूनन गलत है। हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए बर्खास्तगी आदेश को निरस्त कर दिया।






