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छत्तीसगढ़ का सियासी IPL-“सट्टा वाला मेरा नहीं..तेरी टीम का खिलाड़ी है”, उधर रन गिने जा रहे..इधर मशीन से नोट की गिनती

इस पूरे मामले का सबसे बड़ा तंज शायद यही है कि आईपीएल में खिलाड़ी रन बना रहे हैं.... और यहां नेता “नैरेटिव” बना रहे हैं....। पुलिस नोट गिन रही है...। राजनीतिक दल फोटो गिन रहे हैं....। सोशल मीडिया ट्वीट गिन रहा है...। और जनता यह गिन रही है कि आखिर सच कौन बोल रहा है....।

(रुद्र अवस्थी)इन दिनों देश भर में IPL का रोमांच सर चढ़कर बोल रहा है….। देश के कई हिस्सों के साथ छत्तीसगढ़ के मैदान में भी मैच खेले जा रहे हैं । क्रिकेट के इस नए अवतार के साथ सट्टे का  खेल भी गजब फल – फूल रहा है। खिलाड़ी इस खेल में भी अपना हाथ आजमा रहे हैं। रोजाना कहीं ना कहीं से सट्टे की खबर छप ही जाती है।

इन खबरों को देखकर दिमाग कन्फ्यूज़ हो जाता है कि – “क्रिकेट के लिए आईपीएल है… सट्टा के लिए आईपीएल है…. या आईपीएल के लिए सट्टा है….?” इन्हीं सवालों के बीच हमारे छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में सट्टे का बड़ा मामला पकड़ा गया है । मामला इतना बड़ा है कि लाखों रुपए की गड्डी के साथ नोट गिनने की मशीन भी बरामद की गई है ।

यानी उधर क्रिकेट के मैदान में चौके – छक्के पड़ रहे हैं। टीवी स्क्रीन पर रन रेट, स्ट्राइक रेट और ऑरेंज कैप की चर्चा है। लेकिन छत्तीसगढ़ में ऑनलाइन क्रिकेट सट्टा कारोबार में मशीन से नोट की गिनती हो रही है। यहां क्रिकेट का एक दूसरा स्कोर बोर्ड भी खुला हुआ है। जहां रन नहीं नोट गिने जा रहे हैं, वह भी नोट गिनने की मशीन से…..।

दिलचस्प बात यह भी है कि  रायगढ़ में पकड़े गए ऑनलाइन क्रिकेट सट्टा नेटवर्क ने पुलिस को ही नहीं राजनीति को भी एक्टिव मोड में ला दिया है। एक करोड़ से ज्यादा नगदी, हवाला कनेक्शन, ब्लैक मनी को व्हाइट करने का खेल, दिल्ली तक फैला नेटवर्क. कारोबारी चैनलों में छिपा पैसा….. कहानी किसी वेब सीरीज जैसी लगती है ।

फर्क सिर्फ इतना है कि यहां स्क्रिप्ट पुलिस लिख रही है और संवाद नेता बोल रहे हैं….। आईपीएल क्रिकेट और सट्टे के इस मामले में पुलिस की कार्रवाई से अधिक सुर्खियां तो इसके बाद शुरू हुई राजनीतिक बल्लेबाजी और बाउंसर गोलंदाजी ही बटोर रही है।

जिसमें सबसे दिलचस्प डायलॉग बना हुआ है…. “ सट्टा वाला मेरा नहीं तेरी टीम का खिलाड़ी है….”।वैसे आईपीएल की शुरूआत में एक दिलचस्प सीन होता है, जब “दमदार” खिलाड़ी को अपनी टीम में शामिल करने के लिए होड़ लग जाती है और लोग मजा लेते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के सियासी आईपीएल में “दागदार” खिलाड़ी को अपना नहीं दूसरी टीम का बताने की होड़ लगी है….। तो लोग यहां भी मजा ना लें तो क्या करें..।

कहानी दरअसल यहां से शुरू हुई जब रायगढ़ पुलिस ने ऑनलाइन क्रिकेट सट्टा केस में मास्टरमाइंड सहित 3 आरोपियों को गिरफ्तार किया । पुलिस ने उनके पास से 1 करोड़ 2 लाख 81 हजार 300 रुपए कैश, एक नोट गिनने की मशीन, 4 मोबाइल फोन और अन्य सामान जब्त कर लिए। कुल मिलाकर पुलिस ने करीब 1 करोड़ 3 लाख 86 हजार 300 रुपए की संपत्ति जब्त की । कहानी में ट्वीट तब आया जब सट्टे के कारोबार में पकड़े गए एक आरोपी की तस्वीर रायगढ़ के विधायक और प्रदेश के वित्त मेंत्री ओ.पी. चौधरी के साथ सोशल मीडिया में वायरल हो गई।

फिर तो छत्तीसगढ़ के सियासी मैदान में सोशल मीडिया एक्स की स्क्रिन पर बाउंसर और चौके – छक्के की बौछार लग गई।पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने तस्वीरें पोस्ट कीं। तस्वीरों में कथित सट्टा नेटवर्क का मास्टरमाइंड करन चौधरी वित्त मंत्री ओपी चौधरी और मुख्यमंत्री के साथ दिखाई दिया। फिर क्या था… कांग्रेस ने इसे “भाजपा का सट्टा मॉडल” घोषित कर दिया। भूपेश बघेल ने तो यहां तक लिख दिया कि “RSS का सट्टा स्वयंसेवक” सरकार के बेहद करीब था और सवाल उठाया कि “कप्तान का वित्त अब कौन संभालेगा?”

यह सियासत का वही अंदाज है…. जिसमें तस्वीरें अब सबूत से ज्यादा हथियार बन चुकी हैं। जिसके साथ फोटो मिल जाए, वही “करीबी” घोषित हो जाता है। और अगर फोटो किसी मंत्री के साथ हो, तो सोशल मीडिया की अदालत तुरंत फैसला सुना देती है।

लेकिन राजनीति की पिच पर गेंद कभी एक तरफ नहीं रहती।ओपी चौधरी ने भी जवाबी शॉट खेला। उन्होंने वही तस्वीरों का खेल उल्टा घुमा दिया। करन चौधरी की तस्वीरें कांग्रेस नेताओं, टीएस सिंहदेव और जयसिंह अग्रवाल के साथ साझा कर दीं।

संदेश साफ था —“अगर फोटो से रिश्ता तय होगा, तो फिर आपके साथ वाली तस्वीरों का क्या ?”यानी अब बहस यह नहीं रह गई कि सट्टा नेटवर्क इतना बड़ा कैसे हो गया ?बहस यह हो गई कि सट्टेबाज किस पार्टी के “फोटो फ्रेम” में ज्यादा दिखाई देता है ?

दरअसल भारतीय राजनीति में अपराध और फोटो का रिश्ता बड़ा विचित्र है। कोई नेता अपराधी के साथ तब तक फोटो खिंचवा लेता है, जब तक वह “सम्मानित व्यवसायी” माना जाता है। जैसे ही पुलिस प्रेस नोट जारी करती है, वही आदमी “दूसरे दल का करीबी” हो जाता है। रायगढ़ मामले में भी यही हुआ। कल तक जो शायद “सामाजिक कार्यकर्ता”, “युवा व्यवसायी”, “धार्मिक संगठन से जुड़ा व्यक्ति” या “स्थानीय प्रभावशाली चेहरा” रहा होगा, आज वह राजनीतिक फुटबॉल बन चुका है।


जबकि असल सवाल यह है कि आखिर ऐसा नेटवर्क पनपता कैसे है ? पुलिस की जांच कहती है कि सट्टे की रकम सीधे बैंक में नहीं जाती थी। कारोबारी चैनलों, पेट्रोल पंप, मेडिकल स्टोर और परिचित व्यापारियों के जरिए कैश को घुमाया जाता था। फिर हवाला से पैसा ट्रांसफर होता था।
यानी यह सिर्फ मोबाइल पर “लगा दो 500 फलानी टीम पर” वाला खेल नहीं था। यह पूरा आर्थिक सिंडिकेट था। लेकिन राजनीति इस आर्थिक अपराध की जड़ों तक जाने के बजाय फोटो एलबम खंगालने में व्यस्त है।

भाजपा कह रही है — “अगर संरक्षण होता तो कार्रवाई कैसे होती ?”कांग्रेस कह रही है — “इतना बड़ा नेटवर्क सत्ता के संरक्षण के बिना चल ही नहीं सकता। ”दोनों बातों के पीछे अपना-अपना राजनीतिक गणित है।

भाजपा इस कार्रवाई को “सुशासन” का प्रमाण बताना चाहती है। वह यह संदेश देना चाहती है कि उसकी सरकार अपराधियों पर कार्रवाई करती है, चाहे कोई कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो।

वहीं कांग्रेस यह स्थापित करना चाहती है कि सत्ता के गलियारों से निकटता के बिना करोड़ों का ऐसा नेटवर्क चलना संभव नहीं। लेकिन जनता के मन में तीसरा सवाल भी है — अगर नेटवर्क इतना बड़ा था, दिल्ली तक फैला था, हवाला से जुड़ा था, तो क्या इसकी भनक पहले कभी किसी को नहीं लगी ?यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि छत्तीसगढ़ पहले भी “महादेव ऐप” जैसे मामलों से गुजर चुका है। सट्टा अब गली-मोहल्ले की पर्ची वाला धंधा नहीं रहा। यह डिजिटल अर्थव्यवस्था का अपराधी संस्करण बन चुका है —यूपीआई , फर्जी अकाउंट, क्लाउड चैट, हवाला और राजनीतिक कनेक्शन के मिश्रण वाला संगठित कारोबार।

और यहां एक दिलचस्प बात देखिए। राजनीति में “संघर्ष” अब विचारधारा पर कम, “किसके साथ फोटो है” पर ज्यादा हो गया है। कांग्रेस ने “RSS का सट्टा स्वयंसेवक” कहा। भाजपा ने जवाब दिया — “आपके नेताओं के बेडरूम तक पहुंच थी।” टीएस सिंहदेव ने जवाबी पोस्ट किया कि “जनप्रतिनिधि होने के नाते मेरे द्वार सबके लिए खुले हैं।”यानि लोकतंत्र में अब नेता को यह भी समझाना पड़ रहा है कि उसके साथ फोटो खिंचवा लेने से कोई उसका राजनीतिक साझेदार नहीं हो जाता।

हालांकि जनता यह भी जानती है कि हर फोटो मासूम नहीं होती। कुछ तस्वीरें सिर्फ औपचारिक होती हैं। कुछ पहुंच का प्रदर्शन भी होती हैं।और अपराध जगत के लोग अक्सर नेताओं के साथ तस्वीरें इसलिए भी रखते हैं ताकि “रुतबा” बना रहे। यही वजह है कि अपराध और राजनीति के बीच “दूरी” हमेशा उतनी साफ नहीं दिखती, जितनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाई जाती है।

इस पूरे मामले का सबसे बड़ा तंज शायद यही है कि आईपीएल में खिलाड़ी रन बना रहे हैं…. और यहां नेता “नैरेटिव” बना रहे हैं….। पुलिस नोट गिन रही है…। राजनीतिक दल फोटो गिन रहे हैं….। सोशल मीडिया ट्वीट गिन रहा है…। और जनता यह गिन रही है कि आखिर सच कौन बोल रहा है….।

सट्टे के इस मामले ने एक बार फिर दिखा दिया कि छत्तीसगढ़ की राजनीति अब सिर्फ विधानसभा के भीतर नहीं लड़ी जाती। अब लड़ाई एक्स (ट्विटर) की टाइमलाइन पर होती है।
जहां हर ट्वीट एक बाउंसर है और हर जवाब एक पुल शॉट….।लेकिन इस शोर में मूल सवाल कहीं दब जाता है —क्या सचमुच सट्टे के खिलाफ स्थायी लड़ाई होगी ?या फिर यह मामला भी कुछ दिनों बाद राजनीतिक स्कोरिंग का एक और मैच बनकर रह जाएगा ?क्योंकि भारत की राजनीति में एक पुराना नियम है —
अपराधी जब तक पकड़ा नहीं जाता, वह “समर्थक” होता है।
और पकड़े जाने के बाद “विपक्ष का आदमी” बन जाता है।

 

Chief Editor

छत्तीसगढ़ के ऐसे पत्रकार, जिन्होने पत्रकारिता के सभी क्षेत्रों में काम किया 1984 में ग्रामीण क्षेत्र से संवाददाता के रूप में काम शुरू किया। 1986 में बिलासपुर के दैनिक लोकस्वर में उपसंपादक बन गए। 1987 से 2000 तक दिल्ली इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के राष्ट्रीय अखबार जनसत्ता में बिलासपुर संभाग के संवाददाता के रूप में सेवाएं दीं। 1991 में नवभारत बिलासपुर में उपसंपादक बने और 2003 तक सेवाएं दी। इस दौरान राजनैतिक विश्लेषण के साथ ही कई चुनावों में समीक्षा की।1991 में आकाशवाणी बिलासपुर में एनाउँसर-कम्पियर के रूप में सेवाएं दी और 2002 में दूरदर्शन के लिए स्थानीय साहित्यकारों के विशेष इंटरव्यू तैयार किए ।1996 में बीबीसी को भी समाचार के रूप में सहयोग किया। 2003 में सहारा समय रायपुर में सीनियर रिपोर्टर बने। 2005 में दैनिक हरिभूमि बिलासपुर संस्करण के स्थानीय संपादक बने। 2009 से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में बिलासपुर के स्थानीय न्यूज चैनल ग्रैण्ड के संपादक की जिम्मेदारी निभाते रहे । छत्तीसगढ़ और स्थानीय खबरों के लिए www.cgwall.com वेब पोर्टल शुरू किया। इस तरह अखबार, रेडियो , टीवी और अब वेबमीडिया में काम करते हुए मीडिया के सभी क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई है।

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