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आज अपने ही गढ़ में वजूद की लडाई लड़ रहे क्षेत्रीय दल..

बिलासपुर : (मनीष जायसवाल)1990 के बाद गठबंधन राजनीति के दौर में भारतीय लोकतंत्र की धुरी बने क्षेत्रीय दल आज अपने ही गढ़ में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। यह परिवर्तन केवल चुनावी हार-जीत का नतीजा नहीं है। यह भारतीय राजनीति में उभर रहे नए शक्ति-संतुलन का संकेत है, जिसकी झलक प्रमुख क्षेत्रीय नेताओं की वर्तमान स्थिति में साफ दिखती है।

के चंद्रशेखर राव ने 2018 में भाजपा को रोकने के लिए थर्ड फ्रंट की पहल की थी। 2023 में तेलंगाना की पराजय के बाद भारत राष्ट्र समिति विधानसभा में विपक्ष तक सीमित हो गई और उसका राष्ट्रीय विस्तार ठहर गया। नीतीश कुमार कभी विपक्षी एकता के सूत्रधार माने जाते थे, पर बिहार में बदलते राजनीतिक समीकरणों और बार-बार गठबंधन बदलने से उनकी राष्ट्रीय भूमिका सिमट गई है। अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी को दिल्ली और पंजाब तक पहुंचाकर खुद को विकल्प के तौर पर पेश किया, लेकिन सीमित राज्यों से बाहर संगठन खड़ा न कर पाने और लगातार कानूनी-राजनीतिक दबाव ने पार्टी के विस्तार को रोक दिया है। ममता बनर्जी ने 2021 और 2024 में पश्चिम बंगाल में भाजपा को रोककर तृणमूल को मजबूत रखा, फिर भी राज्य में बढ़ता ध्रुवीकरण और पंचायत स्तर पर भाजपा की पैठ ने उन्हें रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया है। वे भाजपा-विरोध का सबसे मुखर चेहरा जरूर हैं, पर विपक्षी गठबंधन की धुरी नहीं बन पा रही हैं। तमिलनाडु में एम के स्टालिन के नेतृत्व वाली डीएमके मजबूत है, लेकिन दक्षिण में भाजपा का बढ़ता फोकस और एआईएडीएमके से बिगड़ते समीकरण उसके लिए नई चुनौती बन रहे हैं। वहीं मायावती, जिन्हें कभी प्रधानमंत्री पद का दावेदार माना जाता था, उत्तर प्रदेश में अपने कोर दलित वोट बैंक के खिसकने और नई पीढ़ी से संवाद न बन पाने के कारण राजनीतिक हाशिए पर पहुंच गई हैं। बसपा का अकेले लड़ने का दांव अब असर नहीं छोड़ रहा।

राजनीति की विडंबना यही है कि जिन नेताओं ने कभी दिल्ली की सत्ता का सपना देखा, वे आज अपने राज्यों में ही संघर्ष कर रहे हैं। इससे एक पुराना नियम फिर साबित होता है कि राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा की बुनियाद हमेशा मजबूत क्षेत्रीय जनाधार ही होता है। जो नेता अपने राज्य में संगठन, सामाजिक गठजोड़ और जन-विश्वास को स्थिर नहीं रख पाए, उनके लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव बचाना मुश्किल हो गया।

क्षेत्रीय दलों की यह गिरावट सिर्फ विपक्षी बिखराव का नतीजा नहीं है। लंबे समय तक सत्ता में रहने से उपजी थकान, परिवारवाद की छवि, दूसरी पंक्ति का नेतृत्व न उभरना और बदलते सामाजिक समीकरणों ने भी इन्हें कमजोर किया है। दूसरी तरफ वोटर अब केवल जातीय या क्षेत्रीय पहचान पर नहीं टिकता। विकास, कल्याणकारी योजनाओं की डिलीवरी, नेतृत्व की स्थिरता और राष्ट्रीय दृष्टि जैसे मुद्दे उसके लिए अहम हो गए हैं।

इसी दौर में भारतीय जनता पार्टी ने बूथ-स्तर तक संगठन, वैचारिक कैडर, सोशल मीडिया और केंद्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता के दम पर अपना विस्तार किया। भाजपा की सफलता केवल विपक्ष की कमजोरी से नहीं आई। उसके 365 दिन सक्रिय रहने वाले संगठन और स्पष्ट राजनीतिक संदेश ने भी बड़ी भूमिका निभाई है।

लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन केवल भाजपा का गठबंधन नहीं है। जनता दल यूनाइटेड, तेलुगू देशम पार्टी, जनता दल सेक्युलर, विभाजित शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, लोक जनशक्ति पार्टी, अपना दल जैसे क्षेत्रीय दल भी इसका हिस्सा हैं। सत्ता के साथ रहने से इन दलों को संसाधन और प्रशासनिक सहयोग मिलता है, पर साथ ही अपनी स्वतंत्र पहचान और पारंपरिक वोट बैंक के कमजोर पड़ने का खतरा भी बना रहता है। इसलिए आज लगभग सभी क्षेत्रीय दल, चाहे विपक्ष में हों या सत्ता के साथ, एक ही सवाल से जूझ रहे हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में प्रभाव बनाए रखते हुए अपनी क्षेत्रीय जमीन कैसे बचाई जाए..?

भाजपा से दूरी रखने वाले दलों के सामने गणित साफ है। अलग-अलग लड़ने से विपक्षी वोट बंटता है और उसका सीधा फायदा भाजपा को मिलता है। इसीलिए गठबंधन अब विचारधारा से ज्यादा अस्तित्व की मजबूरी बन गया है। कांग्रेस के पास अब भी अखिल भारतीय ढांचा है जो विपक्ष को जोड़ सकता है। कभी राहुल गांधी ने सहयोगियों को साथ लाने की कोशिश की थी, पर राज्यों में सीट बंटवारे और नेतृत्व की महत्वाकांक्षा एकता में रोड़ा बनती रही है।

फिर भी यह मान लेना गलत होगा कि केवल कांग्रेस के साथ आने से क्षेत्रीय दल सुरक्षित हो जाएंगे। उन्हें अपने घर में काम करना होगा। मजबूत स्थानीय नेतृत्व खड़ा करना होगा, बदले सामाजिक समीकरणों के हिसाब से नया आधार बनाना होगा, बूथ तक संगठन पहुंचाना होगा और नई पीढ़ी से संवाद बनाना होगा। गठबंधन तभी टिकेगा जब उसमें बराबरी का सम्मान हो और हर राज्य के राजनीतिक यथार्थ को जगह मिले।

भारतीय राजनीति आज दोराहे पर खड़ी है। एक रास्ता फिर से गठबंधन युग की तरफ जाता है, दूसरा एक-दलीय प्रभुत्व के नए दौर की तरफ। क्षेत्रीय दलों को 2029 से पहले तय करना है कि वे किंगमेकर की भूमिका में लौटेंगे या किसी किंग की छाया बनकर रह जाएंगे। उनकी राष्ट्रीय भूमिका अब इसी पर निर्भर करेगी कि वे अपने राज्य में कितने प्रासंगिक रह पाते हैं।

Chief Editor

छत्तीसगढ़ के ऐसे पत्रकार, जिन्होने पत्रकारिता के सभी क्षेत्रों में काम किया 1984 में ग्रामीण क्षेत्र से संवाददाता के रूप में काम शुरू किया। 1986 में बिलासपुर के दैनिक लोकस्वर में उपसंपादक बन गए। 1987 से 2000 तक दिल्ली इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के राष्ट्रीय अखबार जनसत्ता में बिलासपुर संभाग के संवाददाता के रूप में सेवाएं दीं। 1991 में नवभारत बिलासपुर में उपसंपादक बने और 2003 तक सेवाएं दी। इस दौरान राजनैतिक विश्लेषण के साथ ही कई चुनावों में समीक्षा की।1991 में आकाशवाणी बिलासपुर में एनाउँसर-कम्पियर के रूप में सेवाएं दी और 2002 में दूरदर्शन के लिए स्थानीय साहित्यकारों के विशेष इंटरव्यू तैयार किए ।1996 में बीबीसी को भी समाचार के रूप में सहयोग किया। 2003 में सहारा समय रायपुर में सीनियर रिपोर्टर बने। 2005 में दैनिक हरिभूमि बिलासपुर संस्करण के स्थानीय संपादक बने। 2009 से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में बिलासपुर के स्थानीय न्यूज चैनल ग्रैण्ड के संपादक की जिम्मेदारी निभाते रहे । छत्तीसगढ़ और स्थानीय खबरों के लिए www.cgwall.com वेब पोर्टल शुरू किया। इस तरह अखबार, रेडियो , टीवी और अब वेबमीडिया में काम करते हुए मीडिया के सभी क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई है।

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