बिलासपुर।छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने जशपुर में कब्रिस्तान के लिए आरक्षित सरकारी जमीन पर करीब 70 साल से कब्जे के आधार पर मालिकाना हक मांगने वाले तीन लोगों की याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की सिंगल बेंच ने स्पष्ट किया कि केवल लंबे समय तक किसी जमीन पर कब्जा बनाए रखने से स्वामित्व का अधिकार नहीं मिल जाता। प्रतिकूल कब्जे के आधार पर मालिकाना हक का दावा करने के लिए कब्जे की प्रकृति और उससे जुड़े जरूरी तथ्यों को प्रमाणित करना अनिवार्य है।

मामला जशपुर तहसील के खसरा नंबर 505 की कुल 6.69 एकड़ भूमि में से चिर बगीचा मोहल्ले की 1.50 एकड़ जमीन से जुड़ा है। बाराती भगत, दीपक राम भगत और राजेश राम भगत ने इस भूमि पर स्वामित्व घोषित करने और स्थायी निषेधाज्ञा जारी करने की मांग की थी।

उनका दावा था कि उनके पूर्वज आजादी से पहले से जमीन पर काबिज थे और वहां कृषि कार्य करते आ रहे थे। उनके अनुसार, लगभग 70 साल से लगातार कब्जा होने के कारण वे मालिकाना हक के अधिकारी बन गए थे।

राज्य सरकार ने इस दावे का विरोध करते हुए राजस्व अभिलेखों और 26 जून 1957 के निस्तार पत्रक का हवाला दिया। सरकार के अनुसार, संबंधित भूमि कब्रिस्तान के लिए आरक्षित है। ऐसे में केवल लंबे समय से कब्जे का दावा करने के आधार पर जमीन का स्वामित्व घोषित नहीं किया जा सकता।

इस मामले में जशपुर के सिविल न्यायालय ने साक्ष्यों के आधार पर दावेदारों का स्वामित्व संबंधी दावा खारिज कर दिया था।

इसके बाद जिला न्यायालय ने भी अपील स्वीकार नहीं की और निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। दोनों अदालतों के निर्णय को चुनौती देते हुए दावेदारों ने हाई कोर्ट में दूसरी अपील दायर की थी।

हाई कोर्ट ने प्रतिकूल कब्जे के कानूनी सिद्धांतों पर विचार करते हुए कहा कि दावेदारों को यह स्पष्ट रूप से साबित करना होता है कि कब्जा कब शुरू हुआ, उसकी प्रकृति क्या थी, वास्तविक मालिक को कब्जे की जानकारी कब हुई और कब्जा किस समय से उसके अधिकारों के प्रतिकूल हो गया। कब्जा खुला, लगातार और वास्तविक मालिक के अधिकार को चुनौती देने वाला होना भी जरूरी है। केवल कई दशकों से जमीन पर रहने या उसका उपयोग करने की बात कहना पर्याप्त नहीं है।

अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों में प्रतिपादित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि लंबी अवधि का कब्जा अपने आप प्रतिकूल कब्जा नहीं बन जाता। इसके लिए कानून में निर्धारित आवश्यक शर्तों और तथ्यों को साक्ष्यों के माध्यम से साबित करना पड़ता है।

दूसरी अपील में भी दावेदारों के पक्ष में हस्तक्षेप का आधार नहीं मिलने पर हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। इस फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि जमीन पर लंबे समय से कब्जे का दावा, अपने आप में मालिकाना हक हासिल करने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार नहीं है।