जिसे हटाया, उसी बर्खास्त कर्मचारी को जिम्मेदारी — सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली कटघरे में
कलेक्टर ने किया था बर्खास्त, दो साल बाद फिर समिति में पदस्थ — सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल

रामानुजगंज (पृथ्वी लाल केशरी)…बलरामपुर जिले के सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। वित्तीय अनियमितताओं के आरोप में कलेक्टर के आदेश से सेवा से पृथक किए गए एक कर्मचारी की दो वर्ष बाद फिर समिति में सक्रियता और बाद में अतिरिक्त प्रभार मिलने की जानकारी सामने आने के बाद पूरे मामले ने प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कलेक्टर ने किया था बर्खास्त
जानकारी के अनुसार आदिम जाति सेवा सहकारी समिति भँवरमाल के तत्कालीन सहायक प्रबंधक पर वित्तीय अनियमितता के आरोप सामने आने के बाद तत्कालीन कलेक्टर अवनीश कुमार शरण ने कार्यालय कलेक्टर बलरामपुर (खाद्य शाखा) के आदेश क्रमांक 152/खाद्य/2018, दिनांक 16 जनवरी 2018 के तहत उन्हें सेवा से पृथक करते हुए बर्खास्त कर दिया था।
हालांकि इसके करीब दो वर्ष बाद वही कर्मचारी पुनः समिति में कार्यरत दिखाई देने लगा। यह स्थिति सहायक पंजीयक सहकारी संस्थाएं बलरामपुर और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े करती है।
एक माह में करना था अपील
छत्तीसगढ़ सहकारी सोसायटी अधिनियम 1960 के तहत बर्खास्त कर्मचारी को आदेश के 30 दिनों के भीतर धारा 55(2) के तहत सहायक पंजीयक या सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपील करने का अधिकार होता है।
सूत्रों के अनुसार कर्मचारी ने निर्धारित समय में अपील दाखिल नहीं की। इसके बावजूद बाद के वर्षों में वह फिर से समिति से जुड़ा दिखाई देने लगा। यह भी आरोप है कि कुछ अधिकारियों से मिलीभगत के जरिए बिना वैध प्रक्रिया के उसे दोबारा काम करने का अवसर मिला।
कार्रवाई के बजाय मिला अतिरिक्त प्रभार
विवाद उस समय और गहरा गया जब पुनः सक्रिय हुए इसी कर्मचारी को महावीरगंज समिति के साथ-साथ भँवरमाल समिति का भी अतिरिक्त प्रभार दिए जाने की जानकारी सामने आई।
इस आदेश के बाद सहायक पंजीयक सहकारी संस्थाएं बलरामपुर की भूमिका और निर्णय प्रक्रिया को लेकर क्षेत्र में चर्चाएँ तेज हो गई हैं।
किसानों के नाम पर केसीसी ऋण मामला
स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप सामने आ रहे हैं कि महावीरगंज और भँवरमाल समितियों में कई आदिवासी किसानों के नाम पर पुराने केसीसी ऋण बकाया दर्ज हैं, जबकि किसानों का कहना है कि उन्होंने ऐसा कोई ऋण नहीं लिया।
जब किसान धान बिक्री की राशि निकालने बैंक पहुंचते हैं, तब उन्हें खाते में बकाया ऋण की जानकारी मिलती है। इस तरह के कई मामलों ने सहकारिता व्यवस्था की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
महिला ने भी की थी शिकायत
ग्राम पंचायत मेघुली की एक आदिवासी महिला ने पुलिस अधीक्षक को लिखित शिकायत देकर आरोप लगाया था कि उसके नाम पर फर्जी ऋण निकाल लिया गया। शिकायत में धमकी और दुर्व्यवहार के आरोप भी लगाए गए थे। हालांकि स्थानीय स्तर पर यह मामला अभी तक ठोस कार्रवाई तक नहीं पहुंच पाया है।
कलेक्टर की कार्रवाई पर टिकी नजरें
पूरे मामले में प्रशासनिक स्तर पर क्या कदम उठाए जाएंगे, इस पर अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं। यदि आरोपों की जांच होती है तो सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली से जुड़े कई पहलुओं पर परतें खुल सकती हैं।





