CG News/कोरबा/छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में करीब तीन दशक से न्याय की आस लगाए बैठे एक सहायक शिक्षक के लिए उम्मीद की नई किरण जगी है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जाति विवाद के चलते 27 साल पहले सेवा से बर्खास्त किए गए सहायक शिक्षक मंगल साय सिंह भारिया के मामले में बेहद कड़ा रुख अपनाया है।

जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकल पीठ ने कोरबा कलेक्टर को स्पष्ट निर्देश दिया है कि शिक्षक द्वारा दिए गए लंबित अभ्यावेदन पर 30 दिनों के भीतर कानून के अनुसार अंतिम निर्णय लिया जाए। अदालत ने यह भी साफ कर दिया है कि यह निर्णय लेते समय हाईकोर्ट के पुराने आदेशों और राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति के निष्कर्षों को पूरी तरह ध्यान में रखा जाए, ताकि पीड़ित को और अधिक मानसिक व आर्थिक प्रताड़ना न झेलनी पड़े।

यह पूरा मामला साल 1988 से शुरू होता है, जब मंगल साय सिंह भारिया की नियुक्ति सहायक शिक्षक के पद पर हुई थी। खुशहाल चल रही नौकरी में ग्रहण तब लगा जब उनकी जाति को लेकर सवाल खड़े किए गए। विभाग ने उन पर यह आरोप लगाते हुए कि उनकी वास्तविक जाति ‘भारिया (कोष्ठा)’ है, जो अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में आती है.

7 अप्रैल 1999 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया। मंगल साय का दावा था कि वे ‘भारिया’ जनजाति (ST) से ताल्लुक रखते हैं। अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट की शरण ली, जहां लंबी कानूनी लड़ाई के बाद साल 2010 में अदालत ने बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया और मामले की जांच राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति को सौंप दी।

हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद जब राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति ने मामले की गहराई से पड़ताल की, तो 8 अक्टूबर 2015 को आए नतीजे ने मंगल साय के पक्ष को सही साबित किया। समिति ने स्पष्ट रूप से माना कि मंगल साय सिंह भारिया की जाति ‘भारिया’ ही है, जो अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल है।

हालांकि, जाति समिति से ‘क्लीन चिट’ मिलने के बावजूद प्रशासन का रवैया सुस्त बना रहा। वर्षों बीत जाने के बाद भी उन्हें न तो सेवा में बहाल किया गया और न ही उनके बकाया सेवा लाभों का भुगतान किया गया। हार मानकर पीड़ित शिक्षक ने हाल ही में 10 अगस्त 2026 को एक बार फिर कोरबा कलेक्टर के समक्ष अपनी गुहार लगाई।

सुनवाई के दौरान जब यह मामला दोबारा हाईकोर्ट के समक्ष पहुंचा, तो शासन की ओर से वकील ने आश्वासन दिया कि लंबित अभ्यावेदन का निराकरण कानून के दायरे में किया जाएगा।

अदालत ने याचिका का निस्तारण करते हुए कलेक्टर को निर्देशित किया है कि वह 30 दिन की समय सीमा के भीतर यह तय करें कि 2015 के जाति प्रमाणन के आधार पर मंगल साय को पुनर्नियुक्ति और उनके परिणामी लाभ कैसे दिए जा सकते हैं। हालांकि, अदालत ने फिलहाल सीधे तौर पर बहाली का आदेश नहीं दिया है, लेकिन 30 दिन की समय सीमा तय कर प्रशासन को जवाबदेह बना दिया है।