CG High Court/छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के बिलासपुर स्थित डिवीजन बेंच ने पदोन्नति को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। जस्टिस संजय अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पदोन्नति पाना किसी भी कर्मचारी का मौलिक अधिकार नहीं है।

CG High Court/कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ ही राज्य के नगरीय प्रशासन विभाग के वर्ष 2017 के भर्ती नियमों को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है।

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इस फैसले के बाद अब राजस्व निरीक्षकों (RI) के लिए मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO) के पद पर पदोन्नत होने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है। अदालत ने अपने फैसले में जोर देकर कहा कि राजस्व निरीक्षकों को मुख्य नगर पालिका अधिकारी क्लास-बी के पद पर पदोन्नति के लिए पात्र मानना पूरी तरह संवैधानिक है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत मिले समानता के अधिकारों का किसी भी प्रकार से उल्लंघन नहीं करता है।

यह मामला तब चर्चा में आया जब वर्तमान में पदोन्नत होकर CMO के पद पर कार्यरत पुष्पा खलखो सहित अन्य अधिकारियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वे सिविल पदों पर कार्यरत अधिकारी हैं, जबकि राजस्व निरीक्षक केवल नगरपालिका सेवक की श्रेणी में आते हैं।

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उनका कहना था कि इन दो अलग-अलग श्रेणियों को एक समान मानकर पदोन्नति देना असंवैधानिक है। याचिका में विशेष रूप से 2 फरवरी 2018 के उस आदेश को भी चुनौती दी गई थी, जिसमें राजस्व निरीक्षकों को पदोन्नति के लिए अनुभव की समय सीमा में एक साल की छूट दी गई थी। हालांकि, हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इन तर्कों को सिरे से नकारते हुए कहा कि पदोन्नति के लिए एक से अधिक ‘फीडर कैडर’ तय करना और अलग-अलग पदों की समकक्षता निर्धारित करना पूरी तरह से सरकार और कार्यपालिका का नीतिगत निर्णय है, जिसमें दखल देना उचित नहीं है।

कोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में स्पष्ट किया कि किसी भी कर्मचारी के पास पदोन्नति पाने का ‘निहित अधिकार’ नहीं होता, बल्कि उसे केवल नियमों के अनुसार पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का अधिकार प्राप्त होता है। राज्य सरकार द्वारा राजस्व निरीक्षकों के लिए अनिवार्य अनुभव को 6 साल से घटाकर 5 साल करने के निर्णय को भी अदालत ने जनहित में सही ठहराया। सरकार ने दलील दी थी कि विभाग में अधिकारियों की भारी कमी को देखते हुए ‘वन टाइम रियायत’ के रूप में यह निर्णय लिया गया था, जिसे कोर्ट ने तर्कसंगत माना।

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बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहे कि उनके किसी मौलिक अधिकार का हनन हुआ है या सरकार के नियम स्पष्ट रूप से असंवैधानिक हैं।

उल्लेखनीय है कि इस मामले का कानूनी सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। इससे पहले हाईकोर्ट की एक अन्य बेंच ने इन प्रमोशन नियमों को अवैध घोषित कर दिया था, जिसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सर्वोच्च न्यायालय ने 16 सितंबर 2025 को सुनवाई करते हुए पुराने आदेश को रद्द कर दिया था और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को निर्देश दिया था कि वह नए सिरे से इस मामले की सुनवाई करे।CG High Court