CG NEWS:युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया में प्रधान पाठकों की भूमिका से उठ रहे कई सवाल..! क्या नियमों के विपरीत हुई इस पद की पदोन्नति …?

CG NEWS:बिलासपुर (मनीष जायसवाल) ।छत्तीसगढ़ में स्कूल शिक्षा विभाग की युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया ने शिक्षक समुदाय में हलचल मचा दी है। शिक्षक संघों का आगामी मंत्रालय घेराव और इसमें सियासत की एंट्री ने इस मुद्दे को और गर्म कर दिया है। वही इस पूरी प्रक्रिया में उठ रहे कई तरह के कयासों को लेकर विभाग का फेक्ट चेक तथ्यों के साथ सभी मीडिया के सभी माध्यमों में वायरल भी है। तथ्यात्मक आंकड़ों और बताए गए नियमों के आधार पर लगता है कि विभाग ने रणनीति के साथ होमवर्क किया है…। फिर भी कई सुलगते सवाल अब भी बाकी है। उसमें से एक प्राथमिक स्कूल के प्रधान पाठक का भी है। जिसने अब तक इस पद में हुई पदोन्नति और इनकी संस्था में भूमिका पर सवाल खड़े किए है।
स्कूल शिक्षा विभाग का कहना है कि 30700 प्राथमिक विद्यालयों में से 17000 प्राथमिक विद्यालय ऐसे हैं, जहां 20 से कम विद्यार्थियों पर एक शिक्षक का अनुपात है मतलब विद्यार्थियों की तुलना में शिक्षक ज्यादा है। इसमें केवल 3608 सहायक शिक्षक अतिशेष हैं। वही शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE Act, 2009) की अनुसूची के तहत प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों की संख्या छात्रों की दर्ज संख्या के आधार पर निर्धारित की जाती है।
दस्तावेज़ के अनुसार जिन प्राथमिक विद्यालयों में 150 से कम छात्र हैं, वहां प्रधान पाठक का पद अनिवार्य नहीं है, और उन्हें शिक्षक के रूप में गिना जा रहा है। विभाग यह भी मानता है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 पूरे देश में एक अप्रैल 2010 से प्राथमिक एवं पूर्व माध्यमिक शालाओं के लिए लागू किया गया है। शिक्षा के अधिकार अधिनियम की अनुसूची (विद्यालय के लिए मान एवं मानक) के अनुसार प्राथमिक शाला में 60 तक की दर्ज संख्या के लिए दो सहायक शिक्षकों का प्रावधान है तथा प्रत्येक 30 अतिरिक्त छात्र पर एक अतिरिक्त सहायक शिक्षक का प्रावधान है। जिन विद्यालयों की दर्ज संख्या 150 से अधिक है, वहां एक प्रधान पाठक का प्रावधान है।
विभाग का कहना है छत्तीसगढ़ में 2008 के सेटअप से पूर्व से ही बहुत से विद्यालयों में प्रधान पाठक का पद स्वीकृत था, इसी कारण 2008 के सेटअप में एक प्रधान पाठक एवं दो सहायक शिक्षक का प्रावधान किया गया था ..! एक अप्रैल 2010 को शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागु होने के बाद से इसे लागु करना प्रत्येक राज्य सरकार की अनिवार्यता थी। इसलिए शिक्षा के अधिकार अधिनियम की अनुसूची को विद्यालयों में लागू किया गया। चूंकि छत्तीसगढ़ में प्रधान पाठक का पद स्वीकृत था , इसलिए इसे अब कम दर्ज संख्या के स्कूलों में सहायक शिक्षक की गणना में लिया गया है।
युक्ति युक्तकरण प्रक्रिया में विभाग का दावा है कि कोई भी स्कूल एकल शिक्षकीय नहीं होगा। जिन स्कूलों में दो सहायक शिक्षक कार्यरत हैं, वहां से किसी को हटाया नहीं जाएगा, और प्रधान पाठक सहित सभी शिक्षकों को गणना में शामिल किया गया है। लेकिन, यह नीति उन स्कूलों में जटिलता पैदा कर रही है, जहां 150 से कम छात्र हैं। यदि प्रधान पाठक को शिक्षक के रूप में गिना जाता है, तो उनकी प्रशासनिक भूमिका पर सवाल उठता है..। क्या उन्हें केवल शिक्षण कार्य करना होगा, या उनकी प्रशासनिक जिम्मेदारियां बरकरार रहेंगी.. ? या फिर सिर्फ पद का नाम का रहेगा। यह अस्पष्टता अब भी बनी हुई है।
भ्रम इस बात को लेकर भी है कि अगर 2008 के बाद के यदि स्कूलों में प्रधान पाठक के पद स्वीकृत नहीं होने के बावजूद बहुत से शिक्षकों को इस पद पर पदोन्नत किया गया है। तो यह नीतिगत त्रुटि विभाग तो नहीं ..? क्योंकि बिना स्वीकृत पद के पदोन्नति करना नियमों के विरुद्ध भी हो सकता है। अब यह विरोधाभास इस लिए भी हो रहा है क्योंकि लोक शिक्षण संचालनालय के 13 मई 2022 के एक पत्र के अनुसार विभाग में फैल रहे भ्रम को दूर करते हुए बताया गया था कि वस्तुस्थिति यह है, कि वित्त विभाग द्वारा पूर्व में स्वीकृत सेटअप के अनुरूप ही सेटअप निर्धारित रहेगा..। यही वजह रही कि इस दौरान हुई शिक्षक पदोन्नति में छात्रों की दर्ज संख्या जहां 150 से कम रही वहां भी प्रधान पाठक की पदोन्नति निरंतर रखी गई।
अभी प्रधान पाठकों को युक्ति युक्तकरण में अतिशेष नहीं माना जा रहा है । लेकिन छात्रों की दर्ज संख्या कम है तो उनकी गणना शिक्षक के रूप में की जा रही है।इससे कई पदोन्नत प्रधान पाठक बहुत सी संस्था में सुपर सीनियर की भूमिका में आ रहे है।इसको लेकर भी शिक्षकों में असंतोष है।क्योंकि उसी संस्था में कुछ शिक्षक वरिष्ठ होते हुए भी युक्तियुक्तकरण के दायरे में आने वाले हैं।
लेकिन प्रधान पाठकों की स्थिति को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देशों की कमी है जब प्रधान पाठकों को शिक्षक के रूप में गिना जा रहा है तो उनकी प्रशासनिक भूमिका और उनके वेतन संरचना बढ़ाने का अर्थ क्या हो सकता है ..? कहीं पूर्व की सरकार के कार्यकाल में इस पद में हुई पदोन्नति में वन टाइम रिलैक्सेशन सहायक शिक्षकों की वेतन विसंगति दूर करने का फार्मूला तो नहीं था ..! जो अब भी जारी है।
शिक्षक नेताओं और व्यवस्था को समझने वाले जिम्मेदार लोगों से हुई चर्चा में यह सार उभर कर आता है कि यदि एक अप्रैल 2010 से लागू शिक्षा का अधिकार अधिनियम का हवाला देते हुए 2025 में हो रही विभाग की युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया के पूर्व जारी शालाओं की पद संरचना संबंधी समस्त आदेशों को अधिक्रमित करते हुए विभाग की ओर से नवीन पद की संरचना के लिए एक स्पष्ट आदेश जारी किया गया होता तो विवाद की ऐसी स्थिति नहीं बनती..! इसके अलावा अब तक हुए प्रधान पाठक के पद पर जो पदोन्नतियां हुई है उसमें भी 150 से कम और इससे अधिक की दर्ज संख्या वाले स्कूलों के प्रधान पाठक के आदेश में उनकी भूमिका स्पष्ट की गई होती तो ऐसी भ्रम की स्थिति नहीं आती..! विभाग की ओर से वायरल फेक्ट चेक में बहुत सी तथ्यात्मक बाते है। जो कई विषय को स्पष्ट कर रही है। लेकिन प्रधान पाठक के विषय में यही बात उभर कर आ रही है कि ” विद्यालय जाने का रास्ता बहुत अच्छा लगता है …। ” लेकिन बहुत अच्छा है..! यह नहीं कहा जा रहा है। “लगता” शब्द में संशय है इस वजह से उथल पुथल मची हुई है।