शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण की कहानीः क्या पहले गड़बड़ी दिखी नहीं, या अब दबाव में फैसले बदले जा रहे हैं…?

बिलासपुर (मनीष जायसवाल) ।बिलासपुर में शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण की कहानी अब गलती हो गई साहब से आगे बढ़कर किस-किस को फायदा, किस-किस को नुकसान तक पहुंच चुकी है। जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय ने खुद मान लिया है कि काउंसलिंग सूची बनाते वक्त एक ही संवर्ग में कहीं नियुक्ति तिथि तो कहीं वरिष्ठता तिथि का हिसाब लगाया गया। नतीजा ये हुआ कि जो पीछे थे, वे आगे बुला लिए गए और जो सच में वरिष्ठ थे, वे हाथ मलते रह गए..।
इसी गड़बड़ी में सहायक शिक्षक लक्ष्मी राठौर का नाम सामने आया। उनका अभ्यावेदन मान लिया गया और उन्हें अलग से दोबारा काउंसलिंग का मौका दे दिया जाएगा । ऐसा समिति ने भी हामी भर दी फिलहाल दोबारा काउंसलिंग का अता पता सार्वजनिक नहीं हुआ है ।लेकिन यहीं से सवाल खड़े होने लगे क्योंकि इसी आदेश में दर्ज 19 से ज्यादा नाम ऐसे हैं, जिन्हें कनिष्ठ होने के बावजूद ऊपर रखा गया, फिर भी उनकी वजह से पूरी सूची सुधारी नहीं गई।
यानी सिस्टम की गलती मानी गई, मगर सुधार सिर्फ एक के लिए। बाकी लोग..? वे शायद किस्मत के भरोसे..।
फिर मामला आया बबीता मन्नेवार का, वरिष्ठता क्रम 737, लेकिन काउंसलिंग में उनसे पीछे वाली ममता बैरागी पहले बुला ली गई। दूरस्थ स्कूल की सजा बबीता को भुगतनी पड़ी। जांच हुई, गलती मानी गई और उन्हें भी दोबारा काउंसलिंग का मौका दे दिया जाएगा ऐसा आदेश जारी हुआ था और प्रकरण निपटा दिया गया फाइल बंद कर दी गई।
तीसरा नाम द्वारिका प्रसाद राठौर का है। यहां भी वही कहानी कहीं नियुक्ति तिथि, कहीं वरिष्ठता तिथि। कनिष्ठ आगे, वरिष्ठ पीछे। शिकायत युक्तिकरण समिति के सर्वे सर्वा जिला कलेक्टर साहब के जनदर्शन तक पहुंची, तब जाकर विभाग की आंख खुली गई । गलती स्वीकार हुई, राहत मिली, मामला खत्म हो गया।
अब सवाल ये नहीं कि तीन लोगों को राहत मिली। सवाल ये है कि जब एक ही सूची में इतने नाम दर्ज हैं जितेंद्र वैष्णव से लेकर सत्यवती कश्यप तक तो क्या ये सब इक्का-दुक्का गलती है..? या फिर पूरी काउंसलिंग ही भगवान भरोसे चलाई गई थी..?
सूत्र बताते हैं कि ऐसे मामलों की संख्या कहीं ज्यादा है, बस सबके कागज सामने नहीं आए। अगर ठीक से जांच बैठी, तो कई चौंकाने वाले फैसले निकल सकते हैं। अभी तो सिर्फ सतह खुरची गई है।
यही वो युक्तियुक्तकरण है, जिसे लेकर सरकार और स्कूल शिक्षा विभाग बड़े-बड़े दावे कर रहे थे। प्रमुख शिक्षा सचिव सिद्धार्थ कोमल परदेसी के दौर में इसे बड़ी मुहिम बताया गया, मगर मैदानी अमले ने इसे बंदर पूंछ बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बिलासपुर जिला शिक्षा कार्यालय आज पूरे सिस्टम का आईना बन गया है।
पहले आपत्तियां खारिज की गई। शिक्षक कोर्ट पहुंचे। कोर्ट ने कहा अभ्यावेदन सुना जाए। महीनों बाद वही बातें, वही कागज, वही गलती अब मान ली गई। सवाल मिनरल वाटर के पानी की तरह साफ है अगर गलती थी तो पहले क्यों नहीं मानी गई..? और अगर पहले सही थे तो अब राहत क्यों दी जा रही है..?
26 सितंबर 2025 के आदेश खुद कहते हैं कि कहीं काउंसलिंग क्रम में, कहीं वरिष्ठता निर्धारण में, कहीं चिन्हांकन में गड़बड़ी हुई। यानी समस्या हर जगह थी। फिर भी समाधान चुनिंदा लोगों को मिला।
प्रशासनिक जानकार साफ कहते हैं अगर 8-10 जगह भी वरिष्ठता गलत है, तो पूरी काउंसलिंग संदिग्ध हो जाती है। ऐसे में अलग-अलग लोगों को चुपचाप दोबारा मौका देना न न्याय है, न पारदर्शिता। जिनकी आपत्तियां पहले खारिज हुई, वे खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं।
अब निगाहें जिला शिक्षा अधिकारी और जिला स्तरीय युक्तियुक्तकरण समिति पर टिक गई हैं। क्या पहले गड़बड़ी दिखी नहीं, या अब दबाव में फैसले बदले जा रहे हैं.? अगर ये मानवीय भूल थी, तो जिम्मेदारी किसकी है..?
बिलासपुर का मामला अब सिर्फ एक जिले की कहानी नहीं रहा। ये पूरे स्कूल शिक्षा विभाग के लिए चेतावनी है। जहां नियमों की जगह जोड़-घटाव और चुनिंदा राहत चलने लगे, वहीं से भ्रष्टाचार की बू आने लगती है। अब देखना ये है कि विभाग इस बदबू को साफ करता है या फाइलों में बंद कर चुप्पी साध लेता है।





