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मीन संक्रांति 2026: सूर्य के गुरु की राशि में प्रवेश से लगेगा खरमास, 15 मार्च को दान-पुण्य के लिए बन रहा है विशेष महामुहूर्त

मीन संक्रांति 2026/सनातन धर्म और ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों के राजा भगवान सूर्य के राशि परिवर्तन को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। जब भी सूर्य देव एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस तिथि को ‘संक्रांति‘ के रूप में मनाया जाता है। इसी कड़ी में, बहुत जल्द सूर्य देव अपने पुत्र शनि की राशि कुंभ से निकलकर देवगुरु बृहस्पति की राशि मीन में प्रवेश करने वाले हैं। इस विशेष खगोलीय और धार्मिक घटना को ‘मीन संक्रांति’ कहा जाता है।

मीन संक्रांति 2026/इस वर्ष मीन संक्रांति का पर्व 15 मार्च 2026 को मनाया जाएगा। यह दिन धार्मिक दृष्टिकोण से जितना पवित्र है, उतना ही यह जीवन में बड़े बदलावों का संकेत भी लेकर आता है।

ज्योतिषीय गणना के अनुसार, यश और आत्मा के कारक सूर्य देव 15 मार्च की रात 01 बजकर 08 मिनट पर मीन राशि में प्रवेश करेंगे। उदया तिथि की मान्यता के अनुसार, 15 मार्च को ही मीन संक्रांति का पुण्य काल मनाया जाएगा। सूर्य के इस राशि परिवर्तन के साथ ही हिंदू कैलेंडर में ‘खरमास’ की भी शुरुआत हो जाएगी। खरमास लगने के कारण अगले एक महीने तक विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और नए व्यापार की शुरुआत जैसे सभी मांगलिक और शुभ कार्य वर्जित हो जाएंगे। हालांकि, यह समय दान-पुण्य, मंत्र जाप और आध्यात्मिक साधना के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।

मीन संक्रांति पर स्नान और दान का विशेष महत्व है। इस दिन के लिए निर्धारित शुभ मुहूर्त की बात करें तो ‘पुण्य काल’ सुबह 06 बजकर 41 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 40 मिनट तक रहेगा। वहीं, ‘महा पुण्य काल’ का समय सुबह 06 बजकर 41 मिनट से सुबह 08 बजकर 41 मिनट तक रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महा पुण्य काल में किया गया दान और पूजा-पाठ अक्षय फल प्रदान करता है। इस समय में किसी पवित्र नदी में स्नान करना या घर पर ही गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करना अत्यंत लाभकारी समझा जाता है।

पूजा विधि की बात करें तो मीन संक्रांति के दिन सूर्योदय के समय भगवान सूर्य को अर्घ्य देना सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। इसके लिए तांबे के लोटे में शुद्ध जल लेकर उसमें थोड़ा सिंदूर, अक्षत (चावल) और लाल फूल डालकर सूर्य देव को अर्पित करना चाहिए। अर्घ्य देते समय सूर्य मंत्रों का जाप करना मन और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। अर्घ्य के पश्चात सूर्य चालीसा और ‘आदित्य हृदय स्तोत्र’ का पाठ करना चाहिए। अंत में घी के दीपक या कपूर से भगवान भास्कर की आरती करनी चाहिए।

इस दिन गुड़, तिल, तांबे के बर्तन और लाल वस्त्रों का दान करना कुंडली में सूर्य की स्थिति को मजबूत करता है और व्यक्ति को मान-सम्मान व आरोग्य की प्राप्ति होती है। भले ही इस दौरान मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है, लेकिन श्रद्धा के साथ की गई पूजा और धार्मिक अनुष्ठान जीवन की बाधाओं को दूर करने में सहायक सिद्ध होते हैं।

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. cgwall इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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