टीईटी को लेकर दो लाख शिक्षकों के समर्थन में खुलकर सामने आये दिग्विजय सिंह

भोपाल (मनीष जायसवाल) प्राथमिक और मिडिल स्कूल के शिक्षकों को लेकर इन दिनों पूरे देश में चर्चा चल रही है, और मध्यप्रदेश में यह मुद्दा अब और गरमा सकता है। वजह हैं दिग्विजय सिंह, जो प्रदेश करीब दो लाख शिक्षकों के समर्थन में खुलकर सामने आए हैं..। उनके इस कदम के बाद शिक्षकों में हलचल बढ़ गई है और राजनीतिक गलियारों में भी इसको लेकर बातचीत तेज हो गई है..!
दरअसल, दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को एक पत्र लिखकर टीईटी यानी Teacher Eligibility Test को अनिवार्य बनाने के फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग की है। उनका कहना है कि जो शिक्षक पहले से नौकरी कर रहे हैं, उनके ऊपर अचानक से टीईटी पास करने की शर्त थोपना ठीक नहीं है।
उन्होंने सरकार से यह भी कहा है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटिशन या क्यूरेटिव पिटिशन डाली जाए। ताकि यह नियम आगे से लागू हो, न कि पुराने शिक्षकों पर भी लागू कर दिया जाए। यानी जो पहले से सेवा दे रहे हैं, उन्हें इस नई शर्त से राहत मिलनी चाहिए।
दिग्विजय सिंह ने अपने पत्र में यह बात भी उठाई कि जिस केस के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया, वह अन्य राज्य से जुड़ा हुआ था और मध्यप्रदेश उस केस में पक्षकार भी नहीं था। ऐसे में यहां के शिक्षकों पर उसी फैसले का सीधा असर डालना कई लोगों को सही नहीं लग रहा है।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि केंद्र सरकार ने 2009 में शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया था, और मध्यप्रदेश में यह 1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ। उस समय जो भर्तियां हुई, वे पूरी तरह नियम और मेरिट के आधार पर हुई थीं। यानी शिक्षक पहले से तय प्रक्रिया से चयनित होकर काम कर रहे हैं, ऐसे में अब नई शर्त लगाना उनके साथ अन्याय जैसा माना जा रहा है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर कोई शिक्षक टीईटी परीक्षा पास नहीं कर पाता, तो उसकी नौकरी पर खतरा आ सकता है या उसे समय से पहले रिटायर होना पड़ सकता है। यही वजह है कि प्रदेशभर में शिक्षकों के बीच डर और असमंजस का माहौल बना हुआ है।
इस पूरे मामले का एक साफ राजनीतिक पहलू भी नजर आता है। दिग्विजय सिंह का शिक्षकों, खासकर शिक्षा कर्मियों से पुराना और गहरा जुड़ाव रहा है। उन्हें शिक्षा कर्मी कैडर का जनक भी माना जाता है। उनके समय में गांव के बेरोजगार युवाओं को ही गांव में शिक्षक के रूप में जोड़ने की पहल की गई थी, जिससे शिक्षा की जड़ें स्थानीय स्तर पर मजबूत करने की कोशिश हुई।
उनके इस मॉडल को बाद में कई राज्यों ने भी अपने-अपने तरीके से अपनाया और उसमें बदलाव भी किए। ऐसे में जब आज वही शिक्षा कर्मी वर्ग एक बड़े संकट का सामना कर रहा है, तो दिग्विजय सिंह का खुलकर सामने आना सिर्फ एक सामान्य बयान नहीं, असल एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक संकेत माना जा रहा है..।
दिग्विजय सिंह यह बात अच्छी तरह समझते हैं कि देश और प्रदेश की सियासत में शिक्षकों की भूमिका कितनी अहम है। गांव से लेकर शहर तक उनकी पकड़ मजबूत है, और आज जो शिक्षक टीईटी को लेकर चिंतित हैं, उनका असर समाज के हर वर्ग तक जाता है। इसलिए उनका यह कदम राजनीतिक रूप से भी काफी मायने रखता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि डॉ. मोहन यादव सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है। क्या सरकार सुप्रीम कोर्ट में जाकर शिक्षकों के पक्ष को मजबूती से रखेगी, या फिर यह मामला और लंबा खिंचेगा..?
जमीन पर देखा जाए तो यह सिर्फ एक नियम का मामला नहीं है। इसके पीछे लाखों शिक्षकों की नौकरी, उनके परिवार और उनका भविष्य जुड़ा हुआ है। गांव-गांव में पढ़ाने वाले ये शिक्षक आज खुद अपने भविष्य को लेकर चिंता में हैं..।
आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गरम हो सकता है। क्योंकि जब बात रोज़गार और सम्मान की होती है, तो आवाज़ भी तेज होती है और असर भी बड़ा होता है। अब देखना यह है कि देश और प्रदेश की सरकारें क्या फैसला लेती है और शिक्षकों को राहत मिलती है या नहीं।





