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CG NEWS: शिक्षा विभाग को क्यों मिल रही शाबासी….? बीते हफ़्ते की दो ख़ास ख़बरों पर एक नज़र…

CG NEWS बीते सप्ताह छत्तीसगढ़ में स्कूलों के दो पाठ सुर्खियां में रहे । पहला 14 साल बाद वापसी करते हुए पांचवीं और आठवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं का सफल आयोजन और दूसरा राइट टू एजुकेशन अधिनियम (RTE) से जुड़े विवाद..। इन दोनों मुद्दों ने स्कूल शिक्षा क्षेत्र की चर्चा को बनाए रखा, लेकिन बाते वही सुनाई दी जो दिखाया बताया गया। पहले पाठ में छत्तीसगढ़ में करीब 14 साल बाद पांचवीं और आठवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाएं केंद्रीकृत रूप से आयोजित की गईं। यह छात्र हित को देखते हुए राज्य शासन का बड़ा निर्णय था। विभाग के सामने तो एकल शिक्षक और शिक्षक विहीन स्कूलों की जमीनी परिस्थितियां भी थी उसके बाद भी
यह परीक्षाएं बिना किसी बड़े विवाद के सफलता पूर्वक संपन्न हुई, जिसके लिए स्कूल शिक्षा विभाग प्रशंसा का पात्र बनाता ही है..!

राज्य शासन के निर्णय पर स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव सिद्धार्थ कोमल परदेशी ने सटीक रणनीति के साथ पांचवीं और आठवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं को जमीं पर उतारा और जिला से लेकर ब्लॉक स्तर तक के शिक्षा अधिकारियों, शिक्षकों और लिपिकों की कड़ी मेहनत ने इस महा परीक्षा को संभव बनाया। कई अधिकारियों और शिक्षकों के लिए यह पहला अनुभव था, फिर भी इसे बखूबी अंजाम दिया गया। क्योंकि 2010 में इन बोर्ड परीक्षाओं को खत्म कर दिया गया था, जिसके बाद सामान्य मूल्यांकन के रूप में ये परीक्षाए होती थीं। इतने लंबे अंतराल के बाद इस सिस्टम को फिर से खड़ा करना, मंत्रालय से लेकर प्रदेश के सुदूर स्कूलों तक इसे प्रभावी ढंग से लागू करना, और वह भी बिना किसी जटिलता के यह काबिले-तारीफ है।

ये बोर्ड परीक्षाएं इसलिए भी खास रहीं क्योंकि पूर्व शिक्षा सचिव डॉ. आलोक शुक्ला के कार्यकाल के बाद स्कूल शिक्षा विभाग ने पहली बार कोई बड़ा और महत्वपूर्ण निर्णय लिया है..! इस सरकार में अब तक ज्यादातर योजनाएं उनके कार्यकाल की ही परछाई बनी हुई है, जिनमें से कुछ विवादास्पद भी रही जिसे यह सरकार भी अमल करती रही जिसमे शिक्षक भर्ती पदोन्नति में विषय बाध्यता की अनिवार्यता समाप्त होना और इसके अलावा बीएड-डीएड विवाद सबसे अधिक सुर्खियों में था..। विवादों से हट कर आईएस सिद्धार्थ कोमल परदेशी ने शासन के निर्देश पर पांचवीं और आठवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाऐं फिर से सफलता पूर्वक शुरू करके शिक्षा क्षेत्र में गुणवत्ता लाने की दिशा में सबसे प्रभावी कदम जरूर बढ़ा दिया है ।

छत्तीसगढ़ में निजी स्कूलों की संख्या तेजी से बढ़ी है, और इनके विवाद भी तेजी से उभरे है। एक याचिका के दौरान न्यायालय की तल्ख टिप्पणी भी समाने आई है। बीते हुए हफ्ते का दूसरा पाठ राइट टू एजुकेशन अधिनियम (RTE) मे कुछ जगहो पर सेंधमारी का विवाद भी चर्चा में आया है । मालूम हो कि RTE के तहत निजी स्कूलों को 25% सीटें मुफ्त शिक्षा के लिए आरक्षित करनी होती हैं, जिसका भुगतान राज्य सरकार करती है। बड़े और नामी स्कूलों के लिए यह नियम सिरदर्द बना हुआ है, क्योंकि भुगतान में देरी और सरकारी शुल्क का मसला उन्हें परेशान करता है। इसलिए बहुत से स्कूल प्रबंधन इस नियम से बचने के जुगत में रहते हैं। वहीं, छोटे निजी स्कूलों, जो शहर की गलियों से लेकर गांव पगडंडियों तक बने हुए जिनको लेकर धारणाएं बनी हुई है कि इसमें से अधिकांश स्कूल चार कमरों में सिमटे हुए हैं, उनके लिए RTE का यह नियम आय का बड़ा साधन और स्कूल को चलाने का बड़ा आधार है.!

हालांकि मुद्दे की बात यह भी है कि , RTE की चर्चा में एक महत्वपूर्ण पहलू हमेशा नजर अंदाज होता गया है कि निजी स्कूलों की भौतिक स्थिति, सुविधाएं , वहां पढ़ने वाले छात्रों की वास्तविक संख्या, खेल के मैदान से लेकर प्रशिक्षित शिक्षकों तक की स्थिति धरातल पर क्या है ..? इनके निरीक्षण पर कौन सा नियम लागू होता है।इनके लिए राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) के नियम कितने प्रभावी है..!

एक विषय यह भी है कि RTE के तहत राज्य शासन जब बजट जारी करता है तो उसका भुगतान जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय से होता है। इसमें विवाद भी जुड़ता रहा है। यही वजह है कि इसमें कमीशन का खेल चलता है..। इस बात की पुष्टि हाल ही में प्रदेश के एक जिले के DEO को एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) ने इसी मामले की शिकायत के आधार पर रंगे हाथों गिरफ्तार भी किया, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या अन्य जिलों में भी ऐसी कमीशन बाजी चल रही है? या कमीशन के चक्कर में इनके भुगतान अटके हुए है..!

अभी RTE को मजबूत करते हुए इसमें पारदर्शिता लाने में एक अहम कड़ी अपार आईडी समाने आई है जो छात्रों के लिए बनाई गई । अपार आईडी यानी (ऑटोमेटेड परमानेंट अकैडमिक अकाउंट रजिस्ट्री ) यह एक डिजिटल रिकॉर्ड है, जो सरकारी और निजी स्कूलों के लिए अनिवार्य होने की ओर बढ़ रहा है। हालांकि, कई निजी स्कूल इसमें पीछे हैं, और उनकी दर्ज संख्या और अपार आईडी में भारी अंतर देखा जा रहा है। अंतर के कई तकनीनिक कारण भी हो सकते है।

जानकारों का मानना है कि यदि अपार आईडी आधार कार्ड से लिंक होती है।यह अगर शत-प्रतिशत लागू हो जाए,  तो भविष्य में RTE के तहत शासन की ओर से होने वाले भुगतान एक दम पारदर्शी हो जाएंगे। कुछ जगहों पर एक ही छात्र का दो जगह पर नामांकन का यह खेल खत्म हो जाएगा। इसके अलावा अवैध रूप से फल-फूल रहे मुट्ठी भर कागजी स्कूलों की हकीकत भी सामने आ सकती है।

देखा जाए तो पांचवीं और आठवीं बोर्ड परीक्षा से निजी स्कूलों का संबंध भी गहरा है। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के एक निर्णय के कारण इस साल कई निजी स्कूल इन परीक्षाओं में शामिल नहीं हुए।क्योंकि शासन का यह निर्णय बीच सत्र में आया। स्कूल संचालकों की चिंता थी कि उन्होंने ने बोर्ड पैटर्न की पढ़ाई नहीं कराई है। वही किस्से यह भी है कि कुछ स्कूल CBSE का दावा करते हुए पढ़ाई करा रहे थे और CG बोर्ड की मान्यता पर चल रहे थे उन्हें भी अवसर मिल गया।

बीते सप्ताह छत्तीसगढ़ की दो प्रमुख खबरों का सार यह रहा कि बीता सप्ताह छत्तीसगढ़ के शिक्षा क्षेत्र के लिए एक नया सबक लेकर आया। एक ओर बोर्ड परीक्षाओं की सफलता ने व्यवस्था में विश्वास जगाया, तो दूसरी ओर RTE और निजी स्कूलों के मसले ने पारदर्शिता व जवाबदेही की जरूरत को रेखांकित किया। यदि शासन सख्ती से कदम उठाए,निजी स्कूलों की मान्यता देने में जमीनी स्तर को मजबूत करे तो निजी क्षेत्र की शिक्षा में गुणवत्ता और निष्पक्षता का एक नया दौर शुरू हो सकता है। क्योंकि राष्ट्र के समग्र विकास में जितना योगदान सरकारी स्कूलों का है उतना ही निजी स्कूलों का भी है।

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