शिक्षा विभाग में मातहत की पदोन्नति का फैसला सुनाने वाले अफसर खुद अपनी पदोन्नति की राह देख रहे, सिस्टम खामोश

क्या हम भी डीपीसी की बैठक और पदोन्नति सूची का यूं ही इंतजार करते रह जाएंगे..? आखिर हमारी बारी कब आएगी..? यही सवाल उन अधिकारियों के भीतर भी है, जिन्हें समयमान वेतनमान की पात्रता होने के बावजूद इसका लाभ नहीं मिल पाया है, जबकि रिटायरमेंट अब दूर नहीं रहा..।
यही तस्वीर आज छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग की हकीकत बन चुकी है..। कागजों में पदोन्नति के नियम बने हुए हैं, राजपत्र में प्रावधान बने हुए हैं, वरिष्ठता सूचियां तैयार हैं और गोपनीय प्रतिवेदन भी कई बार समय पर जमा हो चुके है..। इसके बाद भी शैक्षिक और प्रशासनिक संवर्ग के ऊंचे पद सालों से खाली पड़े है..। नतीजा यह है कि प्रदेश की स्कूल शिक्षा की प्रशासनिक व्यवस्था बड़े पैमाने पर प्रभारी अधिकारियों के सहारे चल रही है..!
सहायक संचालक, उप संचालक और संयुक्त संचालक, अपर संचालक जैसे कई पद, जिन्हें नियमों के अनुसार पदोन्नति से भरा जाना था, आज भी नियमित अधिकारियों का इंतजार कर रहे हैं। प्रदेश के चार संभागों में संयुक्त संचालक स्तर तक की जिम्मेदारी प्रभारी अधिकारियों के कंधों पर है। जिलों में भी अधिकांश जिला शिक्षा अधिकारी मूल रूप से प्राचार्य हैं, जिन्हें स्थाई पदोन्नति का लाभ अब तक नहीं मिल सका है।
विभाग के भीतर यह बात आम चर्चा में है कि पदोन्नति की प्रक्रिया लंबे समय से आगे नहीं बढ़ पाई है। पीएससी या नियमित भर्ती से आए प्राचार्य, व्याख्याता से प्राचार्य बने अधिकारी सालों से एक ही पद पर टिके हुए हैं..। जबकि इनकी भूमिका प्रभारी के रूप में कई जगह बनी हुई है। कोई प्रथम श्रेणी के पद पर है तो कोई द्वितीय श्रेणी में, लेकिन सभी की नजरें पदोन्नति पर टिकी है..। पिछली बार रमन सरकार के कार्यकाल में पदोन्नति की प्रक्रिया चली थी, जब कुछ प्राचार्य सहायक संचालक बने थे। उसके बाद से फाइलें दफ्तरों के चक्कर ही काट रही हैं।
बीच के स्तर पर स्थिति और उलझी हुई है। सहायक शिक्षक प्रधान पाठक और शिक्षक बने,मिडिल स्कूल के शिक्षक वही प्रधान पाठक तक बन गए और इनके नियोक्ता अधिकारी अधिकांश प्रभारी ही रहे..।आलम यह है कि बड़ी संख्या में व्याख्याता प्राचार्य तो बने, मगर लंबे समय से पदस्थ प्राचार्य आगे नहीं बढ़ सके। इसका सीधा असर यह हुआ कि ऊपर की कुर्सियां खाली रहीं और प्रभारी व्यवस्था लगातार मजबूत होती चली गई।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर नियमित पदोन्नति की प्रक्रिया रुकी क्यों है। जब शासन पर इससे कोई बड़ा आर्थिक बोझ नहीं पड़ता, नियम बने हुए हैं, पात्र अधिकारी उपलब्ध हैं और कई अधिकारी पहले से ही उच्च वेतनमान के दायरे में आ चुके हैं, तब फाइलें अटकी क्यों हैं..? विभागीय गलियारों में दबे स्वर में कहा जा रहा है कि निर्णय लेने में देरी और प्रशासनिक सुस्ती ने शिक्षा विभाग को लंबे इंतजार की स्थिति में डाल दिया है..।
शिक्षा जैसा संवेदनशील विभाग लंबे समय तक इस तरह नहीं चल सकता। जब पदोन्नति का फैसला सुनाने वाले अफसर खुद अपनी पदोन्नति की राह देखते रहें, तब सिस्टम की खामोशी अपने आप बहुत कुछ कह जाती है..। अब नजरें शासन पर टिकी हैं कि वह इस ठहराव को कब तोड़ता है और सालों से रुकी पदोन्नति की प्रक्रिया को आगे बढ़ाकर शिक्षा विभाग को स्थायित्व देता है..!





