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शिक्षा विभाग में मातहत की पदोन्नति का फैसला सुनाने वाले अफसर खुद अपनी पदोन्नति की राह देख रहे, सिस्टम खामोश

बिलासपुर (मनीष जायसवाल) ।राज्य से लेकर जिला स्तर तक शिक्षक संघों से जुड़ी खबरें अक्सर सुर्खियों में रहती हैं। पदोन्नति की मांग लेकर जब शिक्षक जिला शिक्षा अधिकारी, संभागीय संयुक्त संचालक या संचालनालय के अफसरों के सामने ज्ञापन रखते हैं, तब माहौल पूरी तरह औपचारिक होता है। ज्ञापन पढ़े जाते हैं, नियमों का हवाला दिया जाता है, विभागीय निर्देश और प्रक्रिया समझाई जाती है। शिक्षक अपनी ठोस उम्मीदों के साथ लौटते हैं, लेकिन उसी समय शायद अफसरों के मन में भी एक सवाल कुलबुलाता रहता है..!जिस पदोन्नति की बात आज हम सुन रहे हैं और जिसका आश्वासन दे रहे हैं, क्या हमारी अपनी बारी भी कभी आएगी..?

क्या हम भी डीपीसी की बैठक और पदोन्नति सूची का यूं ही इंतजार करते रह जाएंगे..? आखिर हमारी बारी कब आएगी..? यही सवाल उन अधिकारियों के भीतर भी है, जिन्हें समयमान वेतनमान की पात्रता होने के बावजूद इसका लाभ नहीं मिल पाया है, जबकि रिटायरमेंट अब दूर नहीं रहा..।
यही तस्वीर आज छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग की हकीकत बन चुकी है..। कागजों में पदोन्नति के नियम बने हुए हैं, राजपत्र में प्रावधान बने हुए हैं, वरिष्ठता सूचियां तैयार हैं और गोपनीय प्रतिवेदन भी कई बार समय पर जमा हो चुके है..। इसके बाद भी शैक्षिक और प्रशासनिक संवर्ग के ऊंचे पद सालों से खाली पड़े है..। नतीजा यह है कि प्रदेश की स्कूल शिक्षा की प्रशासनिक व्यवस्था बड़े पैमाने पर प्रभारी अधिकारियों के सहारे चल रही है..!

सहायक संचालक, उप संचालक और संयुक्त संचालक, अपर संचालक जैसे कई पद, जिन्हें नियमों के अनुसार पदोन्नति से भरा जाना था, आज भी नियमित अधिकारियों का इंतजार कर रहे हैं। प्रदेश के चार संभागों में संयुक्त संचालक स्तर तक की जिम्मेदारी प्रभारी अधिकारियों के कंधों पर है। जिलों में भी अधिकांश जिला शिक्षा अधिकारी मूल रूप से प्राचार्य हैं, जिन्हें स्थाई पदोन्नति का लाभ अब तक नहीं मिल सका है।

विभाग के भीतर यह बात आम चर्चा में है कि पदोन्नति की प्रक्रिया लंबे समय से आगे नहीं बढ़ पाई है। पीएससी या नियमित भर्ती से आए प्राचार्य, व्याख्याता से प्राचार्य बने अधिकारी सालों से एक ही पद पर टिके हुए हैं..। जबकि इनकी भूमिका प्रभारी के रूप में कई जगह बनी हुई है। कोई प्रथम श्रेणी के पद पर है तो कोई द्वितीय श्रेणी में, लेकिन सभी की नजरें पदोन्नति पर टिकी है..। पिछली बार रमन सरकार के कार्यकाल में पदोन्नति की प्रक्रिया चली थी, जब कुछ प्राचार्य सहायक संचालक बने थे। उसके बाद से फाइलें दफ्तरों के चक्कर ही काट रही हैं।

बीच के स्तर पर स्थिति और उलझी हुई है। सहायक शिक्षक प्रधान पाठक और शिक्षक बने,मिडिल स्कूल के शिक्षक वही प्रधान पाठक तक बन गए और इनके नियोक्ता अधिकारी अधिकांश प्रभारी ही रहे..।आलम यह है कि बड़ी संख्या में व्याख्याता प्राचार्य तो बने, मगर लंबे समय से पदस्थ प्राचार्य आगे नहीं बढ़ सके। इसका सीधा असर यह हुआ कि ऊपर की कुर्सियां खाली रहीं और प्रभारी व्यवस्था लगातार मजबूत होती चली गई।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर नियमित पदोन्नति की प्रक्रिया रुकी क्यों है। जब शासन पर इससे कोई बड़ा आर्थिक बोझ नहीं पड़ता, नियम बने हुए हैं, पात्र अधिकारी उपलब्ध हैं और कई अधिकारी पहले से ही उच्च वेतनमान के दायरे में आ चुके हैं, तब फाइलें अटकी क्यों हैं..? विभागीय गलियारों में दबे स्वर में कहा जा रहा है कि निर्णय लेने में देरी और प्रशासनिक सुस्ती ने शिक्षा विभाग को लंबे इंतजार की स्थिति में डाल दिया है..।
शिक्षा जैसा संवेदनशील विभाग लंबे समय तक इस तरह नहीं चल सकता। जब पदोन्नति का फैसला सुनाने वाले अफसर खुद अपनी पदोन्नति की राह देखते रहें, तब सिस्टम की खामोशी अपने आप बहुत कुछ कह जाती है..। अब नजरें शासन पर टिकी हैं कि वह इस ठहराव को कब तोड़ता है और सालों से रुकी पदोन्नति की प्रक्रिया को आगे बढ़ाकर शिक्षा विभाग को स्थायित्व देता है..!

Chief Editor

छत्तीसगढ़ के ऐसे पत्रकार, जिन्होने पत्रकारिता के सभी क्षेत्रों में काम किया 1984 में ग्रामीण क्षेत्र से संवाददाता के रूप में काम शुरू किया। 1986 में बिलासपुर के दैनिक लोकस्वर में उपसंपादक बन गए। 1987 से 2000 तक दिल्ली इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के राष्ट्रीय अखबार जनसत्ता में बिलासपुर संभाग के संवाददाता के रूप में सेवाएं दीं। 1991 में नवभारत बिलासपुर में उपसंपादक बने और 2003 तक सेवाएं दी। इस दौरान राजनैतिक विश्लेषण के साथ ही कई चुनावों में समीक्षा की।1991 में आकाशवाणी बिलासपुर में एनाउँसर-कम्पियर के रूप में सेवाएं दी और 2002 में दूरदर्शन के लिए स्थानीय साहित्यकारों के विशेष इंटरव्यू तैयार किए ।1996 में बीबीसी को भी समाचार के रूप में सहयोग किया। 2003 में सहारा समय रायपुर में सीनियर रिपोर्टर बने। 2005 में दैनिक हरिभूमि बिलासपुर संस्करण के स्थानीय संपादक बने। 2009 से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में बिलासपुर के स्थानीय न्यूज चैनल ग्रैण्ड के संपादक की जिम्मेदारी निभाते रहे । छत्तीसगढ़ और स्थानीय खबरों के लिए www.cgwall.com वेब पोर्टल शुरू किया। इस तरह अखबार, रेडियो , टीवी और अब वेबमीडिया में काम करते हुए मीडिया के सभी क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई है।
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