बेलगाम निजी अस्पताल.. हाई-रिस्क प्रसव को बनाया मुनाफे का सौदा!. हॉस्पिटल में जच्चा-बच्चा की मौत
निजी अस्पतालों की जवाबदेही पर बड़ा सवाल

गरियाबंद (छुरा): जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर बेनकाब हुई है। छुरा विकासखंड स्थित लक्ष्मी नारायण हॉस्पिटल में हाई-रिस्क गर्भवती महिला का प्रसव कराना एक ऐसा फैसला साबित हुआ, जिसने कुछ ही घंटों में एक परिवार की पूरी दुनिया उजाड़ दी। इस लापरवाही का अंत जच्चा और बच्चा—दोनों की मौत के रूप में सामने आया, और इसके साथ ही निजी अस्पतालों की जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया।
मृतका प्रेमिन ध्रुव, निवासी रामपुर मदनपुर, की गर्भावस्था पहले से ही जटिल बताई जा रही थी। परिजन लगातार खतरे की आशंका जता रहे थे, इसके बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने न तो स्थिति की गंभीरता को समझा और न ही समय रहते उसे किसी सक्षम स्वास्थ्य केंद्र में रेफर किया। जिस अस्पताल में प्रसव कराया गया, वहां न 24 घंटे स्त्री रोग विशेषज्ञ उपलब्ध था, न नवजात के लिए आईसीयू, न नियमित एनेस्थीसिया डॉक्टर और न ही ब्लड बैंक जैसी अनिवार्य सुविधा। इन हालात में हाई-रिस्क प्रसव कराना सीधे तौर पर मरीज की जान को दांव पर लगाने जैसा था।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिला प्रशासन और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी द्वारा पहले ही साफ निर्देश जारी किए जा चुके हैं कि निजी अस्पताल केवल उन्हीं मामलों में हाई-रिस्क प्रसव कर सकते हैं, जहां संपूर्ण विशेषज्ञ सुविधा मौजूद हो। इसके बावजूद लक्ष्मी नारायण हॉस्पिटल ने इन आदेशों को नजरअंदाज किया। हालात बिगड़ने के बाद भी महिला को समय रहते रेफर नहीं किया गया और अंततः वही हुआ, जिसकी आशंका पहले से जताई जा रही थी।
घटना के बाद अस्पताल प्रबंधन की भूमिका और भी संदिग्ध होती चली गई। सूत्रों का दावा है कि मामले को दबाने के लिए परिजनों पर दबाव बनाया गया और बिना पोस्टमार्टम अंतिम संस्कार कराने की कोशिश हुई। अगर यह तथ्य जांच में सामने आते हैं, तो मामला केवल चिकित्सा लापरवाही का नहीं रहेगा, बल्कि साक्ष्य मिटाने और कानून से बचने की गंभीर साजिश के रूप में देखा जाएगा।
यह भी उल्लेखनीय है कि लक्ष्मी नारायण हॉस्पिटल का विवादों से पुराना नाता रहा है। इससे पहले कुल्हाड़ीघाट प्रकरण में यह अस्पताल प्रशासनिक कार्रवाई का सामना कर चुका है और एक बार सील भी किया गया था। इसके बावजूद ऐसे संवेदनशील मामलों में अस्पताल का संचालन और हाई-रिस्क मरीजों से खिलवाड़ यह दर्शाता है कि निगरानी तंत्र या तो कमजोर है या फिर आंखें मूंदे बैठा है।
घटना के बाद ग्रामीणों और आदिवासी समाज में गहरा आक्रोश है। लोगों का कहना है कि निजी अस्पताल गरीब और ग्रामीण मरीजों को सबसे आसान शिकार मानते हैं। कागजों में नियम और मानक जरूर हैं, लेकिन ज़मीन पर उनका कोई असर नहीं दिखता। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि यह घटना किसी बड़े शहर या प्रभावशाली परिवार से जुड़ी होती, तो क्या प्रतिक्रिया इतनी धीमी रहती?
अब पूरा मामला सीधे प्रशासन की जिम्मेदारी पर आ गया है। किसके संरक्षण में बिना सुविधाओं वाले अस्पताल हाई-रिस्क प्रसव कर रहे हैं? निगरानी करने वाले अधिकारी अब तक क्यों खामोश हैं? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या इस मौत के बाद भी व्यवस्था सिर्फ जांच के नाम पर खानापूर्ति करेगी या फिर सच में किसी को जिम्मेदार ठहराया जाएगा?





