अंबिकापुर से बिलासपुर – रायपुर तक दिन के समय सीधी ट्रेन सुविधा पर खामोशी क्यों… ?

सूरजपुर (मनीष जायसवाल) । अंबिकापुर सहित पूरे सरगुजा संभाग में दिन के समय बिलासपुर और रायपुर तक सीधी ट्रेन की मांग कोई नई नहीं है। बरसों से यह चर्चा है, ज्ञापन है, आश्वासन है, प्रस्ताव है। फर्क बस इतना है कि हर साल उम्मीद नई होती है और परिणाम वही पुराना है..। इधर देश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बड़ी चर्चा है। मंचों से कहा जा रहा है कि अब मशीनें सोचेंगी, आंकड़े बोलेंगे और फैसले तेज होंगे। देश के प्रधानमंत्री Narendra Modi ने हाल ही में India AI Impact Summit 2026 में कहा कि तकनीक का उपयोग जनता की सेवा के लिए होना चाहिए। बात सुनने में अच्छी लगती है। लेकिन लगता है यह संदेश बिलासपुर में South East Central Railway के रेल भवन तक पहुंचते-पहुंचते किसी सिग्नल पर अटक जाएगा।
सरगुजा अंचल के यात्रियों से पूछिए कि उन्हें एआई नहीं, पहले दिन में एक नई ट्रेन और व्यवस्थित समय चाहिए ..।अंबिकापुर-अनूपपुर मार्ग पर पांच ट्रेनें जरूर चलती हैं। तीन एक्सप्रेस और दो मेमू। कागज पर सब ठीक दिखता है। लेकिन दो ट्रेनों को छोड़ दें तो बाकी का समय पालन ऐसा कि घड़ी भी अपनी सुइयां छिपा ले। मेमू ट्रेन और एक एक्सप्रेस मानो यह साबित करने निकलती हैं कि उनका काम यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचाना नहीं, पटरियों की जबरदस्ती मालिश करना है। देरी उनकी पहचान बन चुकी है। और जिस दिन कोई ट्रेन अनूपपुर समय पर पहुंच जाए, तो लगता है उस दिन पटरियों का मालिश करवाने का मन नहीं होगा।
यहां का टाइम टेबल देखिए तो वह किसी अनुशासित व्यवस्था का दस्तावेज कम और किसी अफसर के बिगड़े मिजाज का आईना ज्यादा लगता है। जो अंबिकापुर-बिलासपुर- अंबिकापुर की ओर दिन में सीधी मेल देने का विकल्प वर्षो में भी ठोस रूप नहीं ले पाया। रेलवे शायद इसे व्यवस्था कहे, लेकिन यात्री इसे अव्यवस्था से कम नहीं मानते।
अब तो जमाना आकड़ों का है। जरा इन मेमू और एक्सप्रेस ट्रेनों की टिकट बुकिंग का डेटा सार्वजनिक कर दीजिए। साफ हो जाएगा कि कौन सचमुच सफेद हाथी है और कौन यात्रियों से ठसाठस भरा हुआ चल रहा है। किस ट्रेन में लंबी वेटिंग लिस्ट है और किसमें सीटें खाली घूमती हैं। एआई का दौर है, विश्लेषण कोई दुरूह काम नहीं। पर शायद भय यह है कि आंकड़े ही सच न बोल दें और वर्षो से चली आ रही लापरवाही का परदा न उठ जाए।
कहा जाता है कि अब निर्णय तथ्यों के आधार पर होंगे। तो क्या तथ्य यह नहीं बताते कि यात्रियों की संख्या बढ़ रही है। क्या यह नहीं दिखता कि लोग मजबूरी में महंगी बसों का सहारा लेते हैं। क्या टाइम टेबल में समन्वय कर दिन में एक सीधी, व्यवस्थित ट्रेन चलाना असंभव है। यदि मालगाड़ियों के लिए रास्ते साफ हो सकते हैं, तो यात्रियों के लिए सिग्नल लाल ही क्यों रहता है।
रेलवे प्रशासन की प्राथमिकताएं किसी से छिपी नहीं हैं। जहां माल ढुलाई है, वहां गति है। जहां आम आदमी है, वहां प्रतीक्षा है। जनप्रतिनिधि मांग करते हैं, ज्ञापन जाते हैं, जवाब आता है , विचाराधीन। और फिर वही फाइलों का चक्कर..!
तकनीक पर भाषण देना सरल है, पर समय पर ट्रेन चलाना शायद कठिन। सरगुजा का यात्री अब समझ चुका है कि समस्या संसाधनों की कमी नहीं, संवेदनशीलता की कमी है। फिर वह राजनीतिक हो या प्रशासनिक यदि इच्छा हो तो समाधान दूर नही..। पर जब तक मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक एआई के युग में भी यहां की पटरियों पर वही पुरानी सुस्ती दौड़ती रहेगी।
आम सरगुजिया जनता जानना चाहती है जब देश आंकड़ों के आधार पर निर्णय लेने की बात कर रहा है, तब सरगुजा की जनता कब तक अंदाजे और इंतजार के भरोसे सफर करती रहेगी।





