PM मोदी ने क्यों कर दी डॉ. रमन सिंह की तरीफ़…. ?

सूरजपुर (मनीष जायसवाल) ।छत्तीसगढ़ की राजनीति इस समय सूक्ष्म बदलते समीकरणों के दौर से गुजर रही है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा रमन सिंह की खुलकर की गई प्रशंसा और अगस्त 2025 में हुए मंत्रिमंडल विस्तार ने यह संकेत दिया है कि भाजपा राज्य में अपनी टीम का नया संतुलन गढ़ने की तरफ बढ़ रही है..। तीन नए मंत्रियों के शामिल होने और आठ मौजूदा मंत्रियों के विभाग बदले जाने से साफ है कि सरकार ने एक ताज़ा कैबिनेट तैयार कर दिया है, जो आगामी राजनीतिक चुनौतियों के लिए रूपरेखा तय करता हुआ दिखाई दे रह है। इसके बावजूद यह कहना जल्दबाजी होगी कि फिलहाल कोई बड़ा फेरबदल अब नहीं होगा ..। बल्कि स्थिति यह दिखा रही है कि बदलावों का यह दौर अभी पूरी तरह थमा नहीं है।
मंत्रिपरिषद का आकार अपने अधिकतम सीमा के करीब पहुंच जाने के बावजूद मध्यम स्तर पर फेरबदल की गुंजाइश अभी भी बनी हुई है। ऐसे बदलाव आमतौर पर मंत्रालयों के पुनर्विन्यास, कुछ विभागों की अदला-बदली या प्रदर्शन आधारित समायोजन के रूप में सामने आते है..।राजनीतिक पंडितों की माने तो आगामी तीन से नौ महीनों में इस तरह के परिवर्तनों की संभावना मजबूत मानी जा सकती है, क्योंकि पार्टी अक्सर अपने मंत्रियों के कामकाज का मूल्यांकन कुछ अंतराल पर करती है..। यदि किसी मंत्री का प्रदर्शन जनता, मीडिया या पार्टी के आंतरिक सर्वेक्षणों के लिहाज से अपेक्षा से कम पाया जाता है, तो जिम्मेदारियों में परिवर्तन स्वाभाविक है..।
जानकार मानते है कि संगठन स्तर पर भी लगातार हलचल महसूस की जा रही है। मोर्चो और प्रकोष्ठों के ढांचे में हाल के दिनों में हुए बदलाव यह संकेत देते हैं कि भाजपा राज्य में अपनी संगठनात्मक मजबूतियों को फिर से फेरबदल कर रही है। यह प्रक्रिया आमतौर पर तब तेज होती है जब पार्टी किसी बड़े चुनाव या राजनीतिक मोड़ की तैयारी कर रही हो। ऐसे संकेत मौजूद हैं कि वरिष्ठ नेताओं, जिनमें रमन सिंह जैसी अनुभवी शख्सियतें भी शामिल हैं, को महत्वपूर्ण रणनीतिक भूमिकाओं में फिर से सक्रिय किया जा सकता है..।
मुख्यमंत्री स्तर पर बदलाव की संभावना अपेक्षाकृत कम लेकिन पूरी तरह से अनुपस्थित नहीं मानी जा सकती..। हालिया कैबिनेट विस्तार को देखते हुए पार्टी अभी तत्काल कोई बड़ा परिवर्तन नहीं करना चाहती, लेकिन यदि आने वाले महीनों में आंतरिक मूल्यांकन और राजनीतिक परिस्थितियां किसी नए समीकरण की मांग करती हैं, तो यह कदम भी असंभव नहीं है..। ऐसा भाजपा का ट्रेंड रहा है कि वह अक्सर चुनावों से पर्याप्त समय पहले अपनी रणनीति निर्धारित करती है और यदि उसे लगता है कि नेतृत्व में बदलाव से जनता के बीच बेहतर संदेश जाएगा, तो वह ऐसा करने से पीछे नहीं हटती..।
इन संभावनाओं के बीच यह भी ध्यान रखना होगा कि बड़े बदलाव आमतौर पर कुछ विशेष परिस्थितियों पर निर्भर करते है। जैसे विकास संबंधी लक्ष्यों का अधूरा रह जाना, संगठन के भीतर असंतोष, विपक्ष की सक्रियता, जनता की प्रतिक्रिया और केंद्रीय नेतृत्व द्वारा तय की गई दिशा..। यदि इन कारणों का दबाव बढ़ता है, तो राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव अपेक्षा से तेज भी आ सकता है। कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ में हाल के घटनाक्रम इस ओर इशारा करते हैं कि राज्य में टीम री-अरेन्जमेंट, छवि सुधार और संगठनात्मक पुनर संतुलन की प्रक्रिया अभी जारी है, और आने वाले महीनों में राजनीति का तापमान कुछ और बढ़ सकता है..!





