साय सरकार के दो सालः अटकलबाज़ी को हवा कौन दे रहा… ..?

सूरजपुर (मनीष जायसवाल) ।भाजपा सरकार के दो साल पूरे होते ही अचानक एक ही सवाल तेजी से फैलने लगा है कि क्या छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री बदले जाएंगे .? सोशल मीडिया, स्थानीय चैनलों और सत्ता के कुछ हलकों में यह चर्चा इतनी तेजी से उछली है कि लगने लगा कि कोई बड़ा राजनीतिक संकेत सामने आ गया हो…। जबकि हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। यह पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के ढाई-ढाई साल वाले फॉर्मूले की तरह हटकर एक नई अटकल बनाकर पेश करने की कोशिश ज्यादा दिखती है…। भाजपा की निर्णय-प्रक्रिया और राजनीतिक संस्कृति अलग है यहां न तो ऐसे संकेत मिलते हैं और न ऐसी कोई औपचारिक-अनौपचारिक हलचल दिखाई देती है। फिर भी माहौल गढ़ा जा रहा है। असल सवाल यही है कि यह हवा कौन दे रहा है और क्यों..?
विष्णु देव साय सरकार के पिछले दो सालों को कमजोर प्रदर्शन की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। धान बोनस, महतारी वंदन योजना, तेंदूपत्ता दर में वृद्धि, लाखों आवासों की स्वीकृतियां इन फैसलों ने भाजपा की मोदी की गारंटी राजनीति को बढ़त तो दी है।नगरीय निकाय के चुनाव परिमाण ज्यादा पुराने नहीं है..। लेकिन इसके समानांतर यह भी सच है कि इन दो साल बाद भी प्रशासनिक मशीनरी अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाई। सड़क मरम्मत, नगरीय निकायों की अव्यवस्था और बढ़े हुए बिजली बिलों ने जनता में असंतोष का माहौल तो बनाया है। सरकार की यही सुस्ती इन सारी अफवाहों का सबसे बड़ा ईंधन बनी हुई है..।
दिलचस्प यह है कि मुख्यमंत्री परिवर्तन की चर्चा विपक्ष से नहीं, बल्कि भाजपा के कुछ आंतरिक हलकों से उठती ज्यादा दिख रही है। स्थानीय मीडिया और सोशल प्लेटफार्मो पर TRP-चालित चर्चाएं भी इस हवा को और तेज कर रही है..। कुछ विभागों में मंत्रियों की कमजोर पकड़ और इसके बीच अफसरशाही का बढ़ता प्रभुत्व, साथ ही कुछ क्षेत्रों में स्थानीय असंतोष इन वजहों से पार्टी कार्यकर्ताओं के भीतर सवाल बढ़े है..। शीर्ष नेतृत्व इन संकेतों से अनजान नहीं है और संभव है कि आने वाले महीनों में सीमित स्तर पर कैबिनेट फेरबदल या विभागीय पुनर् संरचना हो..। लेकिन इसे मुख्यमंत्री बदलने की ओर ले जाकर व्याख्या करना राजनीतिक अतिशयोक्ति लगती है..।
दो साल में सभी वादों का पूरा न होना न व्यावहारिक है, न वित्तीय रूप से संभव। इसलिए मुख्यमंत्री संकट में है जैसे दावे ज्यादा राजनीतिक रणनीति लगते है, तथ्य नही…! आवास योजनाओं की धीमी प्रगति, महतारी वंदन में तकनीकी अड़चनें, किसानों की शिकायतें, आदिवासी क्षेत्रों में खनन विवाद और कर्मचारियों की नाराजगी ये चुनौतियां हैं, पर किसी भी सरकार में असामान्य नहीं..। इन्हें नेतृत्व परिवर्तन का संकेत मानना जल्द बाजी होगी।
भाजपा समझती है कि 2028 का चुनाव सिर्फ घोषणाओं और विज्ञापनों से नहीं जीता जा सकता। असली लड़ाई ज़मीनी डिलीवरी की होगी। बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और निवेश जैसे मुद्दे अभी भी पार्टी के लिए चुनौती बने हुए है..। ऐसे माहौल मे मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सादगी और साफ छवि भाजपा के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक पूंजी है..। संगठन के भीतर नाम उछलना सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन आदिवासी बहुल छत्तीसगढ़ में अचानक चेहरा बदलना राजनीतिक जोखिम है और मौजूदा परिस्थितियां ऐसी किसी संभावना को बल नहीं देती है।
बीते महीनों में सरकारी अभियानों के पोस्टर, सोशल मीडिया पर कुछ चेहरों की बढ़ती मौजूदगी और TRP आधारित बहसों ने अटकलों को जरूर मसाला दिया है, लेकिन राजनीतिक वास्तविकता इससे अलग है। न सरकार पर तत्काल खतरा है, न संगठन पर ऐसा दबाव कि नेतृत्व परिवर्तन आवश्यक हो। दो साल में अधूरे वादे कोई असाधारण बात नहीं यही स्थिति पूर्ववर्ती सरकार में भी थी।
फिलहाल तथ्य यही कहते हैं कि मुख्यमंत्री बदलने की चर्चा हवा अधिक है, आधार कम है..! भाजपा की शैली आमतौर पर चुपचाप निर्णय लागू करने की होती है, इसलिए किसी बदलाव का संकेत पहले से दिखना मुश्किल है। मौजूदा हालात में नेतृत्व परिवर्तन न तार्किक दिखता है, न संभव…..।





