8 जिलों की उबलती पीड़ा महा जन-सुनवाई में: बेटी की संदिग्ध मौत, दहेज विवाद और उत्पीड़न के मामलों पर महिला आयोग सख्त
महिला आयोग के सामने खुली 8 जिलों की पीड़ा: 159 मामलों की सुनवाई, 28 का मौके पर निपटारा

बिलासपुर …8 जिलों की उबलती पीड़ा महा जन-सुनवाई में उस समय एक मंच पर सामने आई, जब बिलासपुर संभाग से आए दर्जनों मामलों में महिलाओं ने दहेज, घरेलू हिंसा, भरण-पोषण, कार्यस्थल उत्पीड़न और संदिग्ध मौत जैसे गंभीर आरोपों के साथ अपनी शिकायतें रखीं। छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. किरणमयी नायक की अध्यक्षता में जिला पंचायत सभाकक्ष में आयोजित इस सुनवाई में कुल 159 प्रकरणों पर विचार हुआ, जिनमें से 28 मामलों का मौके पर निराकरण किया गया।
यह सुनवाई प्रदेश स्तर की 377वीं और जिला स्तर की 22वीं सुनवाई रही, जिसमें बिलासपुर, रायगढ़, कोरबा, जांजगीर-चांपा, सक्ती, गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही, मुंगेली और सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिलों से आए मामलों को एक साथ सुना गया। कई मामलों में दोनों पक्षों को आमने-सामने बैठाकर समझाइश दी गई, जबकि जटिल मामलों में आगे की सुनवाई और जांच के निर्देश दिए गए।
सुनवाई के दौरान एक मामला सबसे ज्यादा चर्चा में रहा, जिसमें एक महिला ने अपनी बेटी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत और हत्या की आशंका जताई। आवेदिका ने बताया कि उसकी बेटी अनावेदक के साथ दूसरी पत्नी के रूप में रह रही थी, लेकिन अचानक उसका कोई पता नहीं चल पाया। शिकायत के आधार पर पहले थाना स्तर पर आवेदन दिया गया था, परंतु स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी। आयोग ने इस मामले को गंभीर मानते हुए बलरामपुर पुलिस अधीक्षक को विस्तृत जांच के निर्देश देते हुए पत्र भेजने का निर्णय लिया, ताकि पूरे मामले की सच्चाई सामने लाई जा सके।
एक अन्य मामले में विवाह के दौरान दिए गए महंगे सामान और नकद राशि को लेकर विवाद सामने आया। आवेदिका ने बताया कि शादी के समय सूची के अनुसार लगभग 29 लाख 73 हजार रुपये का सामान दिया गया था, जिसमें करीब 15 लाख रुपये कीमत की कार भी शामिल थी। आयोग ने दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद संबंधित संरक्षण अधिकारियों को निगरानी में सामान की वापसी की प्रक्रिया पूरी कराने और काउंसलिंग के माध्यम से विवाद सुलझाने का निर्देश दिया। इस मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को रायपुर में निर्धारित की गई है।
कुछ मामलों में गंभीर अपराधों से जुड़े विवाद भी सामने आए, जिनमें पीड़ित महिलाओं को न्यायिक प्रक्रिया में सहायता दिलाने के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से निःशुल्क अधिवक्ता उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए। वहीं जिन मामलों में पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे या मामला न्यायालय में विचाराधीन था, उन्हें नियमों के अनुसार नस्तीबद्ध किया गया।
सुनवाई के दौरान कार्यस्थल पर उत्पीड़न से जुड़ा एक मामला भी सामने आया, जिसमें कई महिला कर्मचारियों ने अपने वरिष्ठ अधिकारी के व्यवहार को लेकर शिकायत की। आयोग ने इसे गंभीर मानते हुए संबंधित विभाग को आंतरिक शिकायत समिति गठित कर दो माह के भीतर जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
दहेज, भरण-पोषण और पारिवारिक विवादों से जुड़े कई मामलों में आयोग ने संरक्षण अधिकारियों को मध्यस्थता कर समाधान की दिशा तय करने का जिम्मा सौंपा। कुछ मामलों में बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र और आधार कार्ड बनवाने तथा भरण-पोषण सुनिश्चित कराने के निर्देश भी दिए गए।
महा जन-सुनवाई में महिला एवं बाल विकास विभाग, संरक्षण अधिकारी, सखी केंद्र, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और पुलिस प्रशासन के अधिकारी-कर्मचारियों की उपस्थिति रही। आयोग ने स्पष्ट किया कि ऐसे मंचों के माध्यम से महिलाओं की शिकायतों को सीधे सुनकर त्वरित राहत और न्याय सुनिश्चित करने का प्रयास लगातार जारी रहेगा।





