5,000 शिक्षकों की भर्ती से जुड़े कुछ सवाल….

रायपुर। (मनीष जायसवाल) प्रदेश में प्रस्तावित नई शिक्षक भर्ती को लेकर एक बुनियादी सवाल फिर खड़ा हो गया है। जब तक भर्ती से जुड़े नियम, खासकर विषय-बाध्यता को लेकर प्रावधान, राजपत्र (गजट) में विधिवत प्रकाशित नहीं होते, तब तक भर्ती का नोटिफिकेशन आखिर किस आधार पर जारी किया जाएगा। शिक्षकों के समूह छत्तीसगढ़ विषय-बाध्यता मंच का साफ कहना है कि यदि पहले भर्ती शुरू कर दी गई और बाद में विषय-बाध्यता जैसे मूल नियमों में बदलाव हुआ, तो पूरी प्रक्रिया अदालतों में उलझना तय है। ऐसे उदाहरण पहले भी सामने आ चुके हैं, जब भर्ती पर रोक लगी या मामला सालों तक खिंचता रहा। इसका नुकसान शासन की योजना को हुआ और अभ्यर्थियों को भी भटकना पड़ा।
इधर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने शिक्षकों की कमी को गंभीर मानते हुए शिक्षा विभाग को करीब 5,000 पदों पर भर्ती प्रक्रिया शीघ्र शुरू करने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री का कहना है कि स्कूलों में पढ़ाई बाधित नहीं होनी चाहिए और इस भर्ती से शिक्षा व्यवस्था मजबूत होगी, साथ ही प्रदेश के युवाओं को रोजगार के अवसर भी मिलेंगे। खासकर ग्रामीण, आदिवासी और दूरस्थ इलाकों में शिक्षकों की उपलब्धता को सरकार अपनी प्राथमिकता बता रही है।
लेकिन इसी के साथ यह सवाल भी लगातार उठ रहा है कि क्या बिना नियम तय किए भर्ती शुरू करना समझदारी होगी। बीएड और डीएड से जुड़ी पिछली भर्तियों के अनुभव बताते हैं कि भर्ती के दौरान या बाद में नियम बदले गए, तो पूरी प्रक्रिया अदालतों में उलझती चली गई। नतीजा वही रहा भर्ती अधर में, अभ्यर्थी परेशान और स्कूलों में पढ़ाई पर भी असर हुआ । इसी वजह से विषय-बाध्यता मंच की मांग है कि पहले नियमों को राजपत्र में स्पष्ट और दुरुस्त किया जाए, उसके बाद ही भर्ती का नोटिफिकेशन निकाला जाए।
मालूम हो कि प्रदेश के सरगुजा और बस्तर संभाग समेत कई जिलों में पूर्ववर्ती सरकार के समय बड़े पैमाने पर शिक्षक भर्ती की गई थी। 11 जुलाई 2023 को मिडिल स्कूलों में पदोन्नति से जुड़े नियमों में संशोधन कर विषय-बाध्यता को खत्म कर दिया गया। इस फैसले का सीधा असर स्कूलों की पढ़ाई पर पड़ा और विषयवार व्यवस्था पूरी तरह गड़बड़ा गई।
आज हालात यह हैं कि कहीं अंग्रेज़ी पढ़ाने वाला शिक्षक गणित की कक्षा ले रहा है, कहीं गणित का शिक्षक हिंदी पढ़ा रहा है, तो कहीं वाणिज्य विषय से पढ़ा शिक्षक विज्ञान जैसे विषय पढ़ाने को मजबूर है। कक्षा 6 से 8 तक, जिसे शिक्षा की नींव का अहम चरण माना जाता है, वहीं बच्चों की समझ कमजोर पड़ रही है और इसका असर आगे चलकर हाई स्कूल स्तर तक साफ दिखाई दे रहा है।
विषय-बाध्यता मंच का कहना है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 और राष्ट्रीय शिक्षा नीति, दोनों ही मिडिल स्तर पर विषयवार शिक्षकों की व्यवस्था को जरूरी मानते हैं। इसके बावजूद विषय-बाध्यता हटाकर इन नियमों की मूल भावना को ठेस पहुंचाई गई। मंच का आरोप है कि यह मुद्दा लंबे समय से उठाया जा रहा है, लेकिन व्यवस्था से जुड़े जिम्मेदारों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया।
मंच पूर्व सरकार के कार्यकाल का उदाहरण देते हुए बताता है कि वरिष्ठ आईएएस अधिकारी आलोक शुक्ला के समय नई भर्ती में बड़ी प्रशासनिक चूक हुई। इसका नतीजा यह निकला कि वर्तमान सरकार के दौर में बस्तर और सरगुजा जैसे इलाकों में वर्षों से जमे कई शिक्षक युक्तियुक्तकरण के नाम पर अपनी संस्था से बाहर कर दिए गए और उनकी जगह नए पदस्थ शिक्षक मान्य हो गए, क्योंकि भर्ती नियमों में विषय-बाध्यता का संतुलन नहीं रखा गया था। नतीजा विषय को ध्यान में नहीं रखकर नई भर्ती की स्कूलों में पदस्थापना कर दी गई।
विषय-बाध्यता मंच का साफ कहना है कि इस समस्या का तात्कालिक समाधान यही है कि मिडिल स्कूलों में सहायक शिक्षकों की पदोन्नति को प्राथमिकता दी जाए और विषय-बाध्यता को फिर से लागू किया जाए। यह कोई कागजी औपचारिकता नहीं, असल में शिक्षा की गुणवत्ता और विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा गंभीर सवाल है। समय रहते यदि इस पर ठोस फैसला नहीं लिया गया, तो इसकी कीमत प्रदेश की पूरी स्कूली शिक्षा व्यवस्था को चुकानी पड़ेगी।




