LIVE UPDATE
Chhattisgarh

Chhattisgarh Highcourt का ऐतिहासिक फैसला: 14 साल बाद कई सब-इंजीनियरों की नियुक्ति रद्द

फैसला बिलासपुर हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल शामिल थे, ने सुनाया है। यह मामला याचिकाकर्ता रवि तिवारी बनाम स्टेट ऑफ छत्तीसगढ़ व अन्य (रिट अपील नंबर 661 ऑफ 2025) का था।

Chhattisgarh Highcourt।बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाते हुए पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में पिछले 14 सालों से कार्यरत कई सब-इंजीनियर्स की नियुक्तियों को रद्द कर दिया है।

यह फैसला बिलासपुर हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल शामिल थे, ने सुनाया है। यह मामला याचिकाकर्ता रवि तिवारी बनाम स्टेट ऑफ छत्तीसगढ़ व अन्य (रिट अपील नंबर 661 ऑफ 2025) का था।

इस केस में याचिकाकर्ता रवि तिवारी की ओर से एडवोकेट शाल्विक तिवारी ने पैरवी की और कोर्ट के सामने यह साबित किया कि कैसे सरकारी नियमों को ताक पर रखकर अयोग्य उम्मीदवारों को नौकरियां दी गई थीं।

बता दे कि यह फैसला न केवल न्याय की जीत है बल्कि उन तमाम नियमों की भी जीत है जो सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए बनाए जाते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर नियुक्ति की नींव ही गलत है, तो चाहे कितने भी साल बीत जाएं, वह नौकरी वैध नहीं हो सकती।

मामले की शुरुआत साल 2011 से होती है जब विभाग ने सब-इंजीनियर (सिविल) के 275 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था। इस विज्ञापन में साफ तौर पर लिखा था कि आवेदन करने की आखिरी तारीख यानी कट-ऑफ डेट 23 मार्च 2011 होगी।

नियम के मुताबिक, उम्मीदवारों के पास इस तारीख तक जरूरी शैक्षणिक योग्यता (इंजीनियरिंग में डिप्लोमा या डिग्री) होनी चाहिए थी। लेकिन भर्ती प्रक्रिया के दौरान बड़ी गड़बड़ी हुई और 383 उम्मीदवारों को नियुक्त कर दिया गया।

इनमें से कई उम्मीदवार ऐसे थे जिनके पास कट-ऑफ डेट पर जरूरी डिग्री या क्वालिफिकेशन नहीं थी, उन्होंने बाद में अपनी डिग्री हासिल की थी। इसके बावजूद उन्हें नौकरी दे दी गई और वे पिछले 14 सालों से वेतन ले रहे थे।

याचिकाकर्ता रवि तिवारी ने इसी अनियमितता के खिलाफ आवाज उठाई थी। पहले सिंगल बेंच ने उनकी याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि उन्हें इस मामले में बोलने का कोई अधिकार नहीं है, लेकिन रवि तिवारी और उनके वकील शाल्विक तिवारी ने हार नहीं मानी और डिवीजन बेंच में अपील दायर की।

एडवोकेट शाल्विक तिवारी ने डिवीजन बेंच के सामने दमदार दलीलें रखते हुए कहा कि ‘को वारंटो’ (Quo Warranto) की रिट में यह मायने नहीं रखता कि याचिकाकर्ता कौन है, बल्कि यह मायने रखता है कि क्या कोई व्यक्ति गलत तरीके से पब्लिक पोस्ट पर बैठा है।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि विज्ञापन की शर्तों और रिक्रूटमेंट रूल्स का पालन करना अनिवार्य था। एडवोकेट शाल्विक तिवारी ने तर्क दिया कि जिन लोगों के पास अंतिम तारीख यानी 23 मार्च 2011 तक डिग्री नहीं थी, वे उस पद के लिए पात्र ही नहीं थे। बाद में डिग्री हासिल करना या विभाग द्वारा कोई प्रशासनिक आदेश निकालकर उन्हें छूट देना पूरी तरह से गैर-कानूनी था।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि खेल शुरू होने के बाद खेल के नियम नहीं बदले जा सकते। राज्य सरकार और प्राइवेट रेस्पोंडेंट्स की तरफ से दलील दी गई कि अब उन्हें नौकरी करते हुए 14 साल हो चुके हैं, उनका प्रोबेशन पीरियड खत्म हो चुका है और वे कन्फर्म हो चुके हैं, इसलिए मानवीय आधार पर उन्हें नहीं हटाया जाना चाहिए।

हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने एडवोकेट शाल्विक तिवारी की दलीलों से सहमति जताई। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि सहानुभूति कानून से ऊपर नहीं हो सकती। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी की नियुक्ति की शुरुआत ही अवैध है, तो लंबी सर्विस या कन्फर्मेशन उसे वैध नहीं बना सकती।

कोर्ट ने माना कि रिक्रूटमेंट रूल्स सर्वोपरि हैं और कोई भी विभागीय अधिकारी अपनी मर्जी से या नोटशीट चलाकर कट-ऑफ डेट के नियमों में ढील नहीं दे सकता।

कोर्ट ने कहा कि यह सार्वजनिक पद का मामला है और किसी भी अयोग्य व्यक्ति को इस पर बने रहने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने उन 89 उम्मीदवारों का भी जिक्र किया जिन्हें कमेटियों ने पहले ही अयोग्य पाया था लेकिन फिर भी कार्रवाई नहीं हुई थी।

फैसले के तहत, कोर्ट ने प्राइवेट रेस्पोंडेंट्स नंबर 4 से 73 तक की नियुक्तियों को अवैध घोषित करते हुए उन्हें रद्द कर दिया है। हालांकि, कोर्ट ने दो उम्मीदवारों वर्षा दुबे और अभिषेक भारद्वाज को राहत दी है क्योंकि दस्तावेजों की जांच में पाया गया कि उनके पास कट-ऑफ डेट से पहले की ही डिग्री मौजूद थी, इसलिए उनकी नौकरी सुरक्षित रहेगी।

बाकी सभी अयोग्य सब-इंजीनियर्स को तत्काल प्रभाव से पद छोड़ना होगा। एडवोकेट शाल्विक तिवारी की मेहनत रंग लाई और कोर्ट ने याचिकाकर्ता रवि तिवारी की अपील को स्वीकार कर लिया।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि इसमें गलती राज्य शासन और चयन करने वाले अधिकारियों की भी थी जिन्होंने नियमों का पालन नहीं किया, इसलिए इन कर्मचारियों ने पिछले 14 सालों में जो वेतन और भत्ते लिए हैं, उनकी रिकवरी (वसूली) उनसे नहीं की जाएगी।

यह फैसला सरकारी मशीनरी के लिए एक कड़ा संदेश है कि भर्ती प्रक्रियाओं में ‘बैक-डोर एंट्री’ या नियमों की अनदेखी अब नहीं चलेगी और कानून का हाथ गड़बड़ी को सुधार ही देता है, चाहे कितना भी लंबा समय क्यों न बीत जाए ।

फोन पर हुई बातचीत में याचिकाकर्ता रवि तिवारी ने इस लंबी कानूनी लड़ाई के पीछे अपनी मंशा जाहिर की। उनका कहना था कि जो लोग खुद भ्रष्टाचार या गलत तरीके से सिस्टम में घुसते हैं, वे आगे चलकर भ्रष्टाचार को और बढ़ावा ही देते हैं।

उन्होंने जोर देकर कहा कि ग्रामीण विकास विभाग हमारे देश की असली जड़ है और अगर जड़ में ही भ्रष्टाचार लग जाएगा तो देश खोखला हो सकता है। रवि तिवारी ने बताया कि उन्होंने यह मामला इसीलिए कोर्ट के सामने रखा ताकि देश की इस नींव को भ्रष्टाचार से साफ और सुरक्षित रखा जा सके, और यही इस जनहित की लड़ाई को लड़ने का उनका एकमात्र उद्देश्य था।

Chief Editor

छत्तीसगढ़ के ऐसे पत्रकार, जिन्होने पत्रकारिता के सभी क्षेत्रों में काम किया 1984 में ग्रामीण क्षेत्र से संवाददाता के रूप में काम शुरू किया। 1986 में बिलासपुर के दैनिक लोकस्वर में उपसंपादक बन गए। 1987 से 2000 तक दिल्ली इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के राष्ट्रीय अखबार जनसत्ता में बिलासपुर संभाग के संवाददाता के रूप में सेवाएं दीं। 1991 में नवभारत बिलासपुर में उपसंपादक बने और 2003 तक सेवाएं दी। इस दौरान राजनैतिक विश्लेषण के साथ ही कई चुनावों में समीक्षा की।1991 में आकाशवाणी बिलासपुर में एनाउँसर-कम्पियर के रूप में सेवाएं दी और 2002 में दूरदर्शन के लिए स्थानीय साहित्यकारों के विशेष इंटरव्यू तैयार किए ।1996 में बीबीसी को भी समाचार के रूप में सहयोग किया। 2003 में सहारा समय रायपुर में सीनियर रिपोर्टर बने। 2005 में दैनिक हरिभूमि बिलासपुर संस्करण के स्थानीय संपादक बने। 2009 से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में बिलासपुर के स्थानीय न्यूज चैनल ग्रैण्ड के संपादक की जिम्मेदारी निभाते रहे । छत्तीसगढ़ और स्थानीय खबरों के लिए www.cgwall.com वेब पोर्टल शुरू किया। इस तरह अखबार, रेडियो , टीवी और अब वेबमीडिया में काम करते हुए मीडिया के सभी क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई है।
Back to top button
close