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शिक्षा – शिक्षक की बातः कक्षा में बच्चे, हाथ में मोबाइल: छत्तीसगढ़ के शिक्षक अब “गुरुजी” से बन गए “डाटा एंट्री ऑपरेटर” ….

बिलासपुर (मनीष जायसवाल) ।शिक्षक का असली धर्म पढ़ना-लिखना और नैतिक शिक्षा देकर अज्ञानता का अंधकार मिटाना रहा है। लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल शासन के इस दौर में सरकारी स्कूलों में यह काम अब प्राथमिकता सूची के आखिर में खिसक गया है। छत्तीसगढ़ में आज आलम यह कि शिक्षक जैसे ही स्कूल की देहरी पर कदम रखते हैं, उनकी नजर ब्लैक बोर्ड या किताब पर नहीं, मोबाइल की स्क्रीन पर टिक जाती है। VSK ऐप की हाजिरी चढ़े बिना मन अशांत रहता है। नेटवर्क अटका तो पढ़ाई ठिठक जाती है, क्योंकि सवाल उस दिन के वेतन से जुड़ा होता है। स्कूल की घंटी, प्रार्थना और बच्चों से दो नीति-परक बातें अब औपचारिकता बनकर रह गई हैं। सबसे बड़ा काम हाजिरी और मध्यान्ह भोजन की पोर्टल में एंट्री करना बन चुका है। इसके बाद सीजी स्कूल, अपार आईडी और न जाने कितने पोर्टल इंतजार में खड़े रहते हैं। प्राथमिक और मिडिल स्कूल अब कक्षा नहीं, डेटा सेंटर बन गया है, जहां बच्चे सीखें न सीखें, ऐप जरूर संतुष्ट होने चाहिए।

ऊपर से योजनाओं की ऐसी रेलमपेल है कि गिनती गड़बड़ा जाए। सेतु पाठ्यक्रम, लर्निंग आउटकम, सौ दिन का कौशल, अंगना में शिक्षा, संबल सीख, शून्य निवेश नवाचार, भाषा एकरूपता, आमाराइट, नव जतन, खिलौना निर्माण, डिजिटल पढ़ाई हर योजना के साथ फोटो, रिपोर्ट, अपलोड और समीक्षा का बोझ जुड़ा है। टॉय फेयर, असर, बालवाड़ी, विद्यान्जली, शिक्षा सप्ताह, वेबिनार, मध्यान्ह भोजन, स्वास्थ्य जांच, दवा वितरण, पंजी संधारण, निष्ठा, दीक्षा, निखार, चर्चा पत्र जैसे प्रशिक्षण, परीक्षा, मूल्यांकन और नंबर चढ़ाने की झंझट अलग। छात्रवृत्ति के कागज, शाला सिद्धि, मिशन स्टेटमेंट, डिजिटल कंटेंट, लक्ष्य वेध, रीडिंग कॉर्नर, इको क्लब, शाला सुरक्षा, प्रवेशोत्सव, पढ़ई तुंहर द्वार, मोहल्ला क्लास, ड्रॉपआउट रोकथाम, रेडियो-SMS शिक्षण और विभागीय समीक्षा जैसी चल रही और हो चुके प्रयोगों की सूची खत्म ही नहीं होती।

सरकारी स्कूल का बोझ स्कूल परिसर तक सीमित नहीं है। मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण हो या चुनाव ड्यूटी, मतगणना हो या आने वाली जनगणना हर जगह शिक्षक ही तैनात है। सरकार सर्वे कराए तो शिक्षक, आपदा आए तो शिक्षक, टीकाकरण हो तो शिक्षक, सफाई अभियान चले तो शिक्षक। कलेक्टर, बीईओ या पंचायत स्तर की कोई योजना अटक जाए, तो सबसे पहले शिक्षक याद आता है। रैली हो, अभियान हो या बस भरनी हो शिक्षक हाजिर रहे । बाहर की ड्यूटी निपटाकर स्कूल लौटे तो मिड डे मील का हिसाब, राशन की निगरानी, हर चीज का वीडियो-फोटो और उसे डैशबोर्ड पर चढ़ाने की जद्दोजहद। गड़बड़ी न हो इसका सबूत जुटाने की जिम्मेदारी भी शिक्षक पर ही है।

आदेश के बाद भी अटैच शिक्षक रिलीव नहीं हो पाते। कहीं माननीय को निजी स्टाफ चाहिए तो शिक्षक, कहीं राजस्व विभाग को कर्मचारी चाहिए तो शिक्षक। व्यवस्था इसी तरह चल रही है। आज कलम और चाक की जगह मोबाइल शिक्षक का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है। पढ़ाने के लिए नहीं आदेश निभाने के लिए। शिक्षकों के लिए तकनीक मददगार कम और सिरदर्द ज्यादा साबित हो रही है। गांव-कस्बों में दो-तीन शिक्षकों से स्कूल चल रहे हैं। युक्तिकरण के बाद कई स्कूल एक-दो शिक्षकों के भरोसे हैं।
स्कूल का सेटअप युक्तिकरण में गुम हो ही चुका है। ऐसे में बच्चों को संभालना ही पहाड़ हो जाता है, पढ़ाना सपना बन रहा है। अच्छे शिक्षक भी थक रहे हैं, क्योंकि कक्षा से ज्यादा कागज और बच्चों से ज्यादा प्रबंधन हावी हो गया है।

प्रदेश में अब तो स्टाफ रूम में पढ़ाई की चर्चा कम और आदेशों, मांगों, समस्याओं और आंदोलनों की बात ज्यादा होती है। शिक्षक संघों के आंदोलन और हड़तालें इसलिए खत्म नहीं हो रहीं, क्योंकि समस्याओं का स्थाई समाधान नहीं हुआ है। इनकी तकलीफ तब और बढ़ जाती है, जब व्हाट्सएप पर मौखिक फरमान आते हैं। उन्हें जमीन पर उतारने की जवाबदेही अंततः शिक्षक की ही होती है।

बच्चा रोज स्कूल आए, उसका आधार बने, बैंक खाता खुले, जाति प्रमाण पत्र बने, आवारा पशुओं और कुत्तों से सुरक्षा हो।सब कुछ शिक्षक ही देखे। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि मंत्रालय और संचालनालय में बैठे जिम्मेदारों को स्कूल की मिट्टी की तासीर का अंदाजा नहीं है। उन्हें कागजों पर योजनाएं चमकदार दिखती हैं, लेकिन वे शिक्षकों को कक्षा से दूर और उलझा रही हैं।

यह स्थिति केवल प्राथमिक और मिडिल स्कूल तक सीमित नहीं है। हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी स्कूलों में भी यही हाल है। कला और वाणिज्य के बारहवीं पास को विज्ञान प्रयोगशाला सहायक बना दिया गया है। कहीं फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी के सहायक मौजूद हैं, तो कहीं एक भी नहीं। जबकि प्रैक्टिकल महीने में एकाध बार होता है। कुछ को छोड़ स्कूल की प्रयोग शालाओं की हालत तो और भी दयनीय है।

व्यवस्था की सुविधा के नाम पर भले ही वाहवाही लूटी जा रही हो, लेकिन इस प्रयोग का नुकसान सीधा बच्चों को हो रहा है। शिक्षा पर भारी-भरकम बजट खर्च हो रहा है, पर सरकारी शिक्षा का नतीजा गुम है। निजी स्कूल टॉपर पैदा कर रहे हैं, जबकि सरकारी स्कूलों के शिक्षक उनसे अधिक प्रशिक्षित हैं।

सच्चाई यह है कि शिक्षक स्कूल में मौजूद है, लेकिन उसके हाथ में किताब नहीं फाइल और मोबाइल है। इसी वजह से यह बात आम हो गई है कि शिक्षक अब पढ़ाने के लिए नहीं हैं, वे सिर्फ सरकारी ड्यूटी निभाने आते हैं। ऐसे में सरकार किस आधार पर प्रदेश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने का दावा कर रही है.? जब पढ़ाने वाला शिक्षक बाबू बन गया हो, तो मजबूत शिक्षा व्यवस्था सिर्फ कागजों और डैशबोर्ड तक ही सीमित रह जाती है।

इसके बावजूद यदि आज प्रदेश के शैक्षणिक परिणाम आंकड़ों की भाषा में कहीं संतोषजनक दिखाई दे रहे हैं तो उसका श्रेय कक्षा में खड़े उन शिक्षकों को ही जाता है, जो तमाम दबावों, आदेशों और गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियों के बीच भी बच्चों को पढ़ाने का रास्ता खोज लेते हैं। यह उपलब्धि व्यवस्था की नहीं, शिक्षकों की जिद और प्रतिबद्धता की देन है। अगर शिक्षक को कथित तौर पर सौंपा गया बाबू का प्रभार उससे मुक्त कर दिया जाए और उसे सिर्फ पढ़ाने का अधिकार और वातावरण दिया जाए, तो शिक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं, क्रांति आ सकती है। तब सरकारी स्कूलों की पहचान ऐप और पोर्टल से नहीं कक्षा में हो रही पढ़ाई से तय होगी।

Chief Editor

छत्तीसगढ़ के ऐसे पत्रकार, जिन्होने पत्रकारिता के सभी क्षेत्रों में काम किया 1984 में ग्रामीण क्षेत्र से संवाददाता के रूप में काम शुरू किया। 1986 में बिलासपुर के दैनिक लोकस्वर में उपसंपादक बन गए। 1987 से 2000 तक दिल्ली इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के राष्ट्रीय अखबार जनसत्ता में बिलासपुर संभाग के संवाददाता के रूप में सेवाएं दीं। 1991 में नवभारत बिलासपुर में उपसंपादक बने और 2003 तक सेवाएं दी। इस दौरान राजनैतिक विश्लेषण के साथ ही कई चुनावों में समीक्षा की।1991 में आकाशवाणी बिलासपुर में एनाउँसर-कम्पियर के रूप में सेवाएं दी और 2002 में दूरदर्शन के लिए स्थानीय साहित्यकारों के विशेष इंटरव्यू तैयार किए ।1996 में बीबीसी को भी समाचार के रूप में सहयोग किया। 2003 में सहारा समय रायपुर में सीनियर रिपोर्टर बने। 2005 में दैनिक हरिभूमि बिलासपुर संस्करण के स्थानीय संपादक बने। 2009 से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में बिलासपुर के स्थानीय न्यूज चैनल ग्रैण्ड के संपादक की जिम्मेदारी निभाते रहे । छत्तीसगढ़ और स्थानीय खबरों के लिए www.cgwall.com वेब पोर्टल शुरू किया। इस तरह अखबार, रेडियो , टीवी और अब वेबमीडिया में काम करते हुए मीडिया के सभी क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई है।
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