रेहड़ी से कर्तव्य पथ तक छत्तीसगढ़ की छलांग: गणतंत्र दिवस में पथ-विक्रेताओं की मौजूदगी, सत्ता नहीं—संवेदनशील शासन की पहचान
पथ-विक्रेताओं का प्रधानमंत्री संग्रहालय और कमल मंदिर का भ्रमण

रायपुर…नई दिल्ली के कर्तव्य पथ पर इस बार गणतंत्र दिवस का दृश्य सिर्फ परेड और सैन्य शौर्य तक सीमित नहीं रहेगा। छत्तीसगढ़ की गलियों, चौक-चौराहों और बाजारों में रोज़ संघर्ष कर अपनी रोज़ी कमाने वाले शहरी पथ-विक्रेता भी देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मंच का हिस्सा बनेंगे। यह एक औपचारिक निमंत्रण नहीं, बल्कि उस मेहनतकश वर्ग की सार्वजनिक स्वीकृति है, जिसे लंबे समय तक व्यवस्था के हाशिये पर खड़ा रखा गया।
छत्तीसगढ़ के मुंगेली और लोरमी के दो पथ-विक्रेताओं को प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना के तहत 77वें गणतंत्र दिवस समारोह में विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाना कई स्तरों पर संदेश देता है। यह बताता है कि लोकतंत्र केवल सत्ता के गलियारों में नहीं, बल्कि फुटपाथ पर खड़े उस व्यक्ति में भी जीवित है, जो हर दिन आत्मसम्मान के साथ अपना काम करता है।
उप मुख्यमंत्री और नगरीय प्रशासन मंत्री अरुण साव ने इन पथ-विक्रेताओं से वीडियो कॉल पर बातचीत कर न सिर्फ बधाई दी, बल्कि उनके संघर्ष, परिश्रम और आत्मनिर्भरता को सम्मान दिया। साव का कहना था कि वर्षों से शहरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहे पथ-विक्रेताओं को राष्ट्रीय मंच पर पहचान मिलना छत्तीसगढ़ के लिए गर्व का विषय है। यह सामाजिक समावेशन और समावेशी विकास की उस अवधारणा को मजबूत करता है, जिसकी बात तो अक्सर होती है, लेकिन उदाहरण कम दिखते हैं।
प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना के ज़रिए स्वरोजगार, डिजिटल लेन-देन और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े पथ-विक्रेताओं की मौजूदगी यह भी साबित करती है कि नीति अगर जमीन से जुड़ी हो, तो उसका असर सिर्फ फाइलों में नहीं, लोगों की ज़िंदगी में दिखता है। गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय आयोजन में उनकी भागीदारी सत्ता और समाज के बीच की दूरी को पाटने का संकेत है।
पथ-विक्रेताओं का प्रधानमंत्री संग्रहालय और कमल मंदिर का भ्रमण भी इस यात्रा को सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि वैचारिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाता है। यह उन्हें देश की लोकतांत्रिक परंपराओं और राष्ट्रीय मूल्यों से सीधे जोड़ने का अवसर देगा।
यह आयोजन दरअसल एक संदेश है—कि राष्ट्र निर्माण केवल बड़े उद्योगों या ऊँचे पदों से नहीं होता, बल्कि उस मेहनत से होता है जो रोज़ सड़क पर दिखती है, लेकिन अक्सर अनदेखी रह जाती है। छत्तीसगढ़ के लिए यह क्षण सिर्फ सम्मान का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में बढ़ते एक ठोस कदम का प्रतीक है।





