बिलासपुर नगर निगम खुद करवा रहा अतिक्रमण….और पार्षद को बनाया खलनायक, जोन-7 का खुला कबूलनामा!
अतिक्रमण का ठेका निगम का, बदनामी पार्षद की—जोन-7 की स्क्रिप्ट उजागर

बिलासपुर..बिलासपुर नगर निगम का जोन क्रमांक-7 अब अवैध निर्माण रोकने की जिम्मेदारी से औपचारिक रूप से पल्ला झाड़ चुका है। नोटिस की आड़ में जो संदेश दिया गया है, वह साफ है—“नगर निगम कुछ नहीं करेगा, अगर कार्रवाई हो रही है तो वह पार्षद की जिद है।” यह मामला सिर्फ नोटिस का नहीं, बल्कि प्रशासनिक ईमानदारी और जवाबदेही के पतन का है।
अशोक विहार डबरीपारा, साइंस कॉलेज मेन रोड क्षेत्र में 2025 की बरसात के दौरान हुआ जलभराव किसी संयोग का नतीजा नहीं था। सड़क, नाली और नालों की जमीन दबाकर किए गए धड़ल्ले से अवैध निर्माण इसकी असली वजह रहे। इस गंभीर स्थिति को लेकर पहले आम नागरिकों ने आवेदन दिए, फिर पार्षद मनोरमा यादव ने 30 अप्रैल 2025 को लिखित शिकायत कर अवैध निर्माण रोकने की मांग की—लेकिन नगर निगम महीनों तक मौन रहा।
मामला तब गरमाया जब सामान्य सभा में अवैध निर्माण पर सवाल उठे। इसके बाद जोन-7 हरकत में आया, लेकिन कार्रवाई के नाम पर जो किया गया, वह और भी चौंकाने वाला है। 17 अवैध निर्माणधारियों को नोटिस जरूर दिए गए, पर नोटिस में यह स्पष्ट किया गया कि यह नगर निगम की कार्रवाई नहीं, बल्कि पार्षद के कहने पर की गई औपचारिकता है।
यानी नगर निगम ने खुद लिखित रूप में यह जता दिया कि अवैध निर्माण रोकना उसका दायित्व नहीं है।
पूर्व पार्षद विष्णु यादव ने इस पूरे घटनाक्रम को जिम्मेदारी से भागने की सोची-समझी रणनीति बताया है। उनका कहना है कि निगम ने खुद को “सज्जन” और पार्षद को “दुर्जन” साबित करने की कोशिश की है, ताकि अवैध निर्माणधारियों की नाराजगी जनप्रतिनिधि पर गिरे और अधिकारी सुरक्षित रहें।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो काम जोन कमिश्नर और इंजीनियर का है, वह पार्षद के खाते में क्यों डाला जा रहा है? सड़क, नाली और नालों की रक्षा क्या अब निर्वाचित प्रतिनिधि करेंगे या फिर निगम का पूरा तंत्र सिर्फ फाइलें सरकाने के लिए बचा है?
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर समय रहते निगम ने कार्रवाई की होती, तो न जलभराव होता, न सड़कें डूबतीं और न ही पार्षद को सामान्य सभा में सवाल उठाने पड़ते। लेकिन अब हालात यह हैं कि अवैध निर्माण करने वालों को मूक सहमति और सवाल उठाने वालों को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है।
25 वर्षों में पहली बार ऐसा दृश्य सामने आया है, जब नगर निगम खुद यह साबित करता दिख रहा है कि अवैध निर्माण रोकना उसकी प्राथमिकता ही नहीं है। नतीजा साफ है—आने वाली हर बरसात में शहर डूबेगा और जिम्मेदारी फिर किसी और पर डाल दी जाएगी।





