सीबीएसई के नाम पर ‘शिक्षा की लूट’! लाखों की फीस वसूलने के बाद अब छत्तीसगढ़ बोर्ड परीक्षा — नारायण टेक्नोक्रेट पर बड़ा आरोप
पूरे साल सीबीएसई का प्रचार; मुफ्त किताबें नहीं लीं, महंगी किताबें बिकवाईं — जिला शिक्षा अधिकारी ने तलब किए दस्तावेज

बिलासपुर…शहर के नेहरू नगर क्षेत्र में संचालित नारायण टेक्नोक्रेट स्कूल को लेकर शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि स्कूल प्रबंधन ने पूरे शैक्षणिक सत्र में खुद को सीबीएसई पैटर्न का बताकर सैकड़ों छात्रों का प्रवेश लिया, लाखों रुपये फीस वसूली और महंगी किताबें बिकवाईं, जबकि विद्यालय को सीबीएसई की मान्यता 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी बताई जा रही है।
अब सत्र समाप्ति के समय कक्षा 5वीं और 8वीं के छात्रों को छत्तीसगढ़ बोर्ड की परीक्षा में बैठाने की तैयारी शुरू होने से अभिभावकों में भारी नाराजगी है। पूरे वर्ष बच्चों को एनसीईआरटी आधारित किताबों से पढ़ाया गया और अब उन्हें एससीईआरटी पैटर्न की परीक्षा देने को मजबूर किया जा रहा है।
लाखों की फीस, शिक्षा के नाम कॉरपोरेट मॉडल
सूत्रों के अनुसार इस स्कूल में बड़ी संख्या में छात्रों का प्रवेश कराया गया है और प्रति छात्र एक लाख रुपये से अधिक फीस वसूली गई है। अभिभावकों ने बेहतर शिक्षा के भरोसे मोटी रकम खर्च की, लेकिन अब बोर्ड बदलने की स्थिति ने पूरे मॉडल पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
शहर में तेजी से उभर रहे बड़े निजी स्कूलों का यह कॉरपोरेट मॉडल शिक्षा को सेवा नहीं बल्कि व्यावसायिक कारोबार में बदलता दिखाई दे रहा है, जहां चमकदार भवन, आक्रामक प्रचार और भारी फीस के सहारे अभिभावकों को आकर्षित किया जाता है।
कक्षा तक संचालन, फिर भी सीबीएसई का प्रचार
जिला शिक्षा विभाग के अनुसार इस विद्यालय को फिलहाल कक्षा 1 से 7 तक संचालन की अनुमति दी गई है। अगले सत्र में कक्षा 8 प्रारंभ हो सकेगी। इसके बावजूद पूरे वर्ष सीबीएसई पैटर्न के नाम पर प्रवेश और पढ़ाई कराए जाने के आरोप गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
मुफ्त किताबें छोड़ महंगी किताबों का खेल
राज्य शासन की ओर से छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम की किताबें स्कूलों को मुफ्त वितरण के लिए उपलब्ध कराई गई थीं। लेकिन शिक्षा विभाग के अनुसार नारायण टेक्नोक्रेट स्कूल ने इन किताबों का उठाव ही नहीं किया। इसके बजाय छात्रों को निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें खरीदने के लिए कहा गया।
इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या किताबों की बिक्री के जरिए भी एक बड़ा आर्थिक खेल संचालित किया गया।
अधिकारी की फटकार, दस्तावेज तलब
जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे ने मामले को गंभीर मानते हुए स्कूल प्रबंधन को फोन पर फटकार लगाई है और सभी दस्तावेज लेकर कार्यालय में उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं।
उन्होंने कहा कि जब तक सीबीएसई की मान्यता प्राप्त नहीं थी, तब तक सीबीएसई के नाम पर प्रवेश देना और उसी आधार पर पढ़ाई कराना नियमों के खिलाफ है। उन्होंने यह भी पूछा कि जब राज्य शासन की ओर से मुफ्त किताबें उपलब्ध थीं तो स्कूल ने उन्हें क्यों नहीं लिया।
षड्यंत्र हो सकता है” — जिला शिक्षा अधिकारी
जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे ने कहा कि यदि पूरे साल बच्चों को एनसीईआरटी से पढ़ाया गया और अब उन्हें एससीईआरटी पैटर्न की परीक्षा में बैठाया जा रहा है तो यह छात्रों के भविष्य के साथ गंभीर अन्याय है।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि सीबीएसई का प्रचार कर प्रवेश लिया गया और बाद में राज्य बोर्ड परीक्षा में बैठाया जा रहा है, तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि एक बड़ा षड्यंत्र भी हो सकता है। ऐसे मामले में जांच के बाद कठोर कार्रवाई से पीछे नहीं हटेंगे।
प्राचार्य प्रभात झा का पक्ष
नारायण टेक्नोक्रेट स्कूल के प्राचार्य प्रभात झा ने फीस के सवाल पर स्पष्ट आंकड़ा बताने से बचते हुए कहा कि फीस का संबंध केवल बोर्ड से नहीं होता। उनके अनुसार चाहे सीबीएसई, छत्तीसगढ़ बोर्ड या अन्य किसी भी पाठ्यक्रम का स्कूल हो, फीस विद्यालय की गुणवत्ता, संसाधन और सुविधाओं के आधार पर तय होती है।
उन्होंने कहा कि यदि फीस पर सवाल उठाया जा रहा है तो यह सवाल शहर के अन्य निजी स्कूलों से भी पूछा जाना चाहिए। झा का दावा है कि एनसीईआरटी और एससीईआरटी के पाठ्यक्रम में बहुत अधिक अंतर नहीं होता और उच्च स्तर की पढ़ाई करने वाले छात्र राज्य बोर्ड की परीक्षा भी दे सकते हैं।
शिक्षा विभाग और निजी स्कूलों की ‘मिलीभगत’?
पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। यदि बिना मान्यता के सीबीएसई के नाम पर प्रवेश लिया गया, लाखों रुपये फीस वसूली गई और पूरे साल पढ़ाई कराई गई, तो यह सब शिक्षा विभाग की नजर से कैसे बचा रहा।
यह स्वीकार करना कठिन है कि शिक्षा विभाग और निजी स्कूलों के बीच कोई तालमेल नहीं है। यदि ऐसा नहीं होता तो प्रशासन की नाक के नीचे इस तरह का खेल लंबे समय तक कैसे चलता रहता।
सत्ता के नजदीक, बेखौफ कारोबार
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह स्कूल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री अरुण साव के निवास से चंद कदम की दूरी पर स्थित है। इसके बावजूद यदि अभिभावकों से भारी फीस लेकर बोर्ड और पाठ्यक्रम को लेकर भ्रम फैलाया गया है तो यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि आखिर इन निजी स्कूलों को इतना बेखौफ बना कौन रहा है।
अब जांच और कार्रवाई पर टिकी नजर
मामले के सामने आने के बाद शिक्षा विभाग ने दस्तावेज तलब किए हैं। यदि जांच में यह साबित होता है कि सीबीएसई के नाम पर प्रवेश लेकर बाद में राज्य बोर्ड परीक्षा में बैठाया जा रहा है, तो यह न केवल अभिभावकों के साथ धोखा है बल्कि शिक्षा व्यवस्था और कानून की भावना को खुली चुनौती भी माना जाएगा।
अब देखना यह है कि जांच के बाद क्या सच सामने आता है और क्या शिक्षा के नाम पर चल रहे इस कथित कॉरपोरेट खेल पर वास्तव में कठोर कार्रवाई होती है या नहीं।





