CG NEWS:“कातिल पोस्टर” ने जान ले ली… और बेकसूर गरीबों को सजा…?

CG NEWS:( गिरिजेय )
इस शहर में दुश्मन तो मेरा कोई नहीं था,
फिर किसने मेरा कत्ल किया सोच रहा हूं….
शायर की इन लाइनों को वह शख्स उस वक्त अपने साथ लेकर हमेशा के लिए दुनिया से बिदा हो गया ….। जब छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में सड़क किनारे के एक पोस्टर की चपेट में आकर 26 साल के शुभम मिश्रा की दर्दनाक मौत हो गई। दर्द भरी इस कहानी की एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि शुभम के माता – पिता की पहले ही मौत हो गई है और वह अपनी छोटी बहन के साथ रहता था…। जो अब अकेली रह गई है। हाल के दिनों में यह हादसा उस समय हुआ, जब शुभम अपने एक दोस्त के साथ बुलेट मोटर साइकल में एक शादी से लौट रहा था। रात के अँधेरे में सड़क किनारे लगे पोस्टर से बाइक का हैंडल टकराया, बैलेंस बिगड़ा और हादसे ने एक परिवार का सब कुछ छीन लिया ।
इस दर्द भरी कहानी में यह सवाल भी जुड़ा हुआ है कि वह “कातिल पोस्टर” किसका था…? सड़क पर इस तरह से क्यों लगाया गया था कि इसकी वजह से किसी बेकसूर की जान भी जा सकती है….? इसके लिए जिम्मेदार कौन है..? इन सवालों का जवाब आखिर कौन देगा…? दरअसल बीच रास्ते पर अपनी खुशियों के पल का इज़हार करने का यह रिवाज काफ़ी पुराना है। यह एक तरह से फैशन बन गया है। जन्मदिन, चुनाव में जीत, किसी नेता के आगमन या किसी पद पर मनोनयन की खुशी में बड़े – बड़े पोस्टर जहां – तहां लगा दिए जाते हैं। सड़क के बीच डिवाइडर पर कुछ इस तरह से पोस्टर लगते हैं कि मोड़ की तरफ आर पार कुछ दिखाई नहीं देता। जिससे अचानक रोड क्रास करने वाले चपेट में आ जाते हैं। कई बार डिवाइडर पर लगे पोस्टर टूटकर इस तरह लटके होते हैं कि हादसे का कारण बन सकते हैं। पुराने लोगों को याद होगा कि सिटी कोतवाली के सामने एक होर्डिंग में लिखा रहता था- “वाहन चालन और सौंदर्य दर्शन एक साथ ना करें…”। लेकिन अब इसी शहर में “वाहन चालन के साथ विज्ञापन दर्शन” कराने का चलन है। इस खतरनाक चलन के बारे में कोई कुछ नहीं बोलता..। शायद इसलिए कि सभी अपनी – अपनी बारी में इस सुविधा का लाभ उठाने से नहीं चूकते। तभी तो प्राइवेट से लेकर सरकारी तक सभी के पोस्टर समय – समय पर छाए रहते हैं। सरेराह चल रही विज्ञापनबाज़ी पर नज़र रखने वाला नगर निगम समय – समय पर मुहिम चलाकर कहीं- कहीं कुछ पोस्टर जब्त कर लेता है । फिर वो तारीख आती है, जब कोई अपनी खुशी का इज़हार करना चाहता है और सड़क / डिवाइडर पोस्टर से पाट दिए जाते हैं। यह सिलसिला भी पुराना हो गया है।
इस बार भी हादसे के बाद नगर निगम ने अपने हिस्से की रश्म अदायगी शुरू कर दी है। ख़बरें आ रहीं हैं कि निगम को तोड़ू दस्ता रात में यह मुहिम चला रहा है। जिससे रोड पर आने जाने वालों को कोई परेशानी ना हो। इस मुहिम के चलते सड़क के किनारे और डिवाइडर पर पोस्टर नज़र नहीं आ रहे हैं। सड़क खुली – खुली नज़र आ रही है। निगम ने एक बार फिर अहसास करा दिया है कि वह चाहे तो सब कुछ बढ़िया हो सकता है। लेकिन वह हर समय ऐसा क्यों नहीं चाहता ? इस सवाल का जवाब वहां बैठे व्यवस्था के ज़िम्मेदार लोग ही दे सकते हैं..। जिनसे अब कोई यह गारंटी मांग सकता है कि क्या अब आगे सड़क पर जानलेवा पोस्टर कभी नजर नहीं आएंगे….?
इधर रात में चलने वाली नगर निगम की इस मुहिम के शिकार ऐसे बोर्ड भी हो रहे हैं, जो सड़क किनारे काफी अंदर हैं और जिनकी वजह से ट्रेफिक पर कोई असर नहीं हो रहा है। मुंगेली रोड में 36 माल के पास ऐसे ही एक कॉलोनी के बोर्ड को बुलडोजर से तोड़ दिया गया । “संकट मोचन वाटिका” नाम से कॉलोनी का रास्ता बताने वाले इस बोर्ड को वहां के निवासियों ने 22 जनवरी 2024 को उस दिन स्थापित किया था, जिस दिन राम मंदिर का शुभारंभ हुआ था । फुटपाथ के इस पार यह बोर्ड सड़क के इतने किनारे था कि इसकी वजह से किसी को कोई अड़चन नहीं थी। जाहिर सी बात है कि कॉलोनी की तरफ मुड़ते हुए उस रास्ते पर कॉलोनीवासियों का आना- जाना सबसे अधिक होता है। अगर अड़चन होती तो कॉलोनीवासियों को ही होती। ऐसे में उनकी ओर से यह बोर्ड ही क्यों लगाया जाता… ? ऐसे ही कितने बोर्ड बेकसूर होकर भी नगर निगम की सजा पा रहे हैं।
इसी तरह नगर निगम की इस मुहिम का कहर सड़क किनारे ठेला लगाकर अपना गुजर – बसर करने वाले लोगों पर भी टूट पड़ा है। निगम का दस्ता ऐसे लोगों की रोजी छीन रहा है, जो फुटपाथ के दूसरी तरफ छोटा – मोटा काम कर अपनी ज़िंदगी की गाड़ी खींच रहे हैं। यह सही है कि सड़क किनारे से अतिक्रमण हटना चाहिए। ट्रेफिक पर अड़ंगा डालने वाला बेजा कब्जा हटाया जाना चाहिए । सड़क खुली होनी चाहिए । लेकिन जिनकी वजह से ट्रेफिक पर असर नहीं हो रहा है, ऐसे लोग भी अगर मुहिम के शिकार होते हैं तो निगम का जमीनी अमला खुद भी सवालों के दायरे में नजर आता है।
गौर करने वाली बात यह भी है कि निगम के तोड़ू दस्ते से जब मीडिया ने पूछा कि क्या शुभम मिश्रा की मौत के जिम्मेदार पोस्टर को लेकर कोई कार्रवाई हो रही है….. तो जवाब मिला कि निगम का विज्ञापन विभाग अलग है, वही इस बारे में कुछ बोल सकता है। हमारा काम अवैध निर्माण को हटाना है…। समझा जा सकता है कि सुनवाई किसी की नहीं है…। दरअसल पिछले काफी समय से बिलासपुर नगर निगम में अफसरशाही और अमला ही सिरमौर है। जिसके हिसाब से ही काम हो रहा है। इसमें जनता के बीच से चुनकर आए नुमाइंदों की कोई हिस्सेदारी नज़र नहीं आती। लगता है जैसे नुमाइंदों की फ़ौज को भी अपनी हिस्सेदारी से कोई वास्ता नहीं है और कातिल से लेकर बेकसूर तक सबके साथ इंसाफ का जिम्मा निगम के “मजबूत हाथों” में सौंप दिया है… ?