याद रहेगा या भुला दिया जाएगा “साहब” का यह दौरा….?

सूरजपुर (मनीष जायसवाल)।जिले में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का डेढ़ दिन का दौरा खत्म हुए अब तीन दिन बीतने को हैं। शोर थम गया है, मंच खाली हो चुके हैं और कैमरों से निकली तस्वीरें मीडिया और सोशल मीडिया में अपनी-अपनी जगह बना चुकी हैं। अब वह वक्त है जब कार्यक्रमों की चमक से बाहर निकलकर यह समझा जाए कि इन डेढ़ दिनों का राजनीतिक और प्रशासनिक मतलब क्या था। और क्या यह दौरा सिर्फ दिखाने भर का था या कुछ बदलने का इरादा भी साथ लाया था..।
कर्मा महोत्सव से लेकर 172.51 करोड़ रुपए की घोषणाएं और फिर हितग्राहियों के घर तक मुख्यमंत्री की मौजूदगी दरअसल यह दिखाने की कोशिश थी कि सत्ता न दिल्ली के रिमोट से चल रही है, न रायपुर की चारदीवारी में कैद है और न ही सिर्फ फाइलों में सिमटी हुई है। संदेश देने की कोशिश को गई कि सत्ता का इकबाल राजधानी से दूर गांव की गलियों तक पहुंच रहा है। सवाल बस इतना है कि यह इकबाल स्थाई है या दौरे तक सीमित..।
विपक्ष लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री दिल्ली के इशारों पर चलते हैं। सूरजपुर का यह दौरा उसी धारणा को तोड़ने की एक राजनीतिक कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री का खुद शहर और गांव पहुंचना, योजनाओं का निरीक्षण करना और लाभार्थियों से सीधी बातचीत करना यह साबित करने का प्रयास था कि फैसलों की कमान उनके ही हाथ में है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि यह पूरा कार्यक्रम किसी बड़े जन सुराज या ग्राम स्वराज अभियान से पहले की रिहर्सल भर है..! एक ट्रायल रन, जिसमें जमीन की नब्ज टटोली जा रही है।
लेकिन दो-तीन दिन बाद जब तालियों की गूंज खत्म होती है, तो परतें खुलती हैं और कुछ असहज सवाल सामने आने लगते हैं। खासकर सामाजिक संगठनों के साथ हुई मुलाकातों को लेकर। सर्किट हाउस में दर्जनों समाज प्रमुख पहुंचे, ज्ञापन सौंपे, फोटो खिंचवाई और लौट गए। देर रात आठ से नौ बजे के बीच दूर-दराज के इलाकों से आए प्रतिनिधियों के लिए यह मुलाकात संवाद से ज्यादा एक औपचारिक जनदर्शन जैसी लगी। न खुलकर बातचीत हुई, न बैठकर समाज की बातों को समझने की कोशिश दिखी। ठंड के मौसम में एक कप चाय पर बैठकर बात करने भर की फुर्सत तक नजर नहीं आई। यही कमी इस पूरे कार्यक्रम को फीका कर गई।
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी रही कि मुख्यमंत्री ज्यादातर समय पार्टी पदाधिकारियों से घिरे रहे। जबकि यहां दर्जन भर से ज्यादा समाजों के प्रमुखों को बाकायदा सूची बनाकर, नाम तय कर, प्रोटोकॉल के तहत बुलाया गया था। मुलाकात हुई, औपचारिक अभिवादन हुआ, लेकिन आत्मीय संवाद की जगह नहीं बन पाई। बोलचाल की भाषा में कहें तो माहौल पूरी तरह सरकारी रहा ..। मिलना है, औपचारिक परिचय देना है, फोटो खिंचवाना है और आगे बढ़ जाना है। खबरों और सोशल मीडिया के लिए सब कुछ था, भरोसे के लिए कम। यही भाव हावी रहा, और यही इस दौरे की सबसे बड़ी चूक भी मानी जा सकती है..।
डेढ़ दिन का कार्यक्रम तो बीत गया, अब असली कसौटी ज्ञापनों पर होगी। समाज प्रमुखों ने जो मांगें मुख्यमंत्री के सामने रखीं, उनका हश्र क्या होता है, यह आने वाले दिनों में तय करेगा कि यह दौरा याद रखा जाएगा या भुला दिया जाएगा। अगर फैसले और कार्रवाई जमीन पर दिखी, तो यह पहल सरकार की साख बढ़ाएगी। लेकिन अगर सब कुछ फाइलों और तस्वीरों तक ही सीमित रह गया, तो यह दौरा महज एक औपचारिक भेंट और सोशल मीडिया की सुर्खियों तक सिमट कर रह जाएगा।
फिलहाल 172 करोड़ रुपये की घोषणाओं के बाद मार्च में पेश होने वाले राज्य के आगामी बजट को लेकर जिले में उम्मीद जरूर जगी है। अब देखना यह होगा कि ये उम्मीदें निकायों, पंचायतों, सड़कों और गांव की गलियों तक कितनी उतर पाती हैं। यह दौरा अंतिम नहीं है, लेकिन इसका असर तभी माना जाएगा जब इसके नतीजे दिखेंगे कागजों में नहीं, जमीन पर।





