कब तक हमारा नेतृत्व पहचान के मान्यकरण के आकर्षण में बंधा रहेगा ? — दीपक पाण्डेय

सवाल बहुत बड़ा है और असलियत इससे भी बड़ी। दशकों पहले कांशीराम का नारा—”ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर चोर – बाकी सब DS-4″—बहुतों के दिलों-दिमाग में आग लगा देता था। आज वही नारा सुनाइए, कोई सवर्ण हिंदू न उद्वेलित होता है, न आंदोलित। बामसेफ और डीएस-4 अपने तय ढांचे में अब भी सक्रिय हैं, पर समाज की ऊर्जा को अब वे दिशा नहीं दे पा रहे।मंडल आयोग लागू हुआ, राजीव गोस्वामी ने जंतर-मंतर पर आत्मदाह कर दिया। लेकिन कितने लोगों को याद है? चार—पाँच साल बात होती रही, फिर इतिहास की फाइलों में दब गई।दलित समुदाय के दिमाग में सदियों से यह बात बैठा दी गई कि उनकी हर समस्या की जड़ सवर्ण हैं। योग्यता न आने का कारण ‘मनुवाद’ है—यह एक स्थायी राजनीतिक कथा है। पर सच यह है कि हर दल अपनी-अपनी थाली के हिसाब से एजेंडा परोसता है। सबका अंतिम लक्ष्य सिर्फ़ वोट है।
मोदी जी को सत्ता में आए 2014 से 2026… पूरे 12 साल हो चुके। इस दौरान सबसे ज्यादा बहस हिंदू–मुस्लिम पर ही अटकी रही। इसके बीच समाज का बड़ा हिस्सा बीजेपी से जुड़ा जरूर, पर अब युवा वर्ग आकर्षित नहीं है।क्यों? क्योंकि रोज़गार की जमीनी योजना उतनी ही दूर दिखाई देती है जितनी पहले थी। जब तक किसी बड़े स्तर की रोजगार योजना लागू नहीं होगी, युवाओं की निराशा घर के दरवाज़े पर खड़ी रहेगी।
राजनीति freebies की हो गई है। ‘फ्री में देना और चुनाव जीत जाना’—देश की नई प्रवृत्ति बन चुकी है। और यह प्राकृतिक सिद्धांत है कि एक बार दिया गया प्रिविलेज वापस नहीं लिया जा सकता। जिस दिन कोई दूसरा दल ज़्यादा दे देगा, वोट वहीं चले जाएंगे।
कल प्रधानमंत्री का स्टार्टअप पर लंबा भाषण हुआ। पर जमीनी हकीकत यह है कि कोई युवा बैंक लोन लेने जाए तो खाली हाथ लौट आता है।
कागज़ों में सब कुछ आसान —“आधार कार्ड दो और सुविधाएं लो।”—लेकिन धरातल पर वास्तविकता कोसों दूर है। भारत में मौलिक अन्वेषण और खोज ठहर-सी गई लगती है। गूगल, कंप्यूटर, एआई—सब विदेश से आयातित। चीन से प्रतियोगिता की बात तो छोड़िए — वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल खुद कह चुके हैं कि हम 200 वर्षों तक चीन के बराबर नहीं पहुंच सकते।
देश में SEZ सिर्फ अहमदाबाद में है। स्टार्टअप सर्विस सेक्टर में तो पनप रहे हैं— Swiggy, Zomato, Blinkit, Ola, Uber…पर ये सब विदेश मॉडल की नकल हैं।
ज्यादातर भारतीय युवा उद्यम शुरू करते हैं और दो महीनों के भीतर बंद भी कर देते हैं। वजह?
या तो बुनियादी सोच नहीं विकसित हुई, या समाज जाति-धर्म की राजनीति में इतना उलझा है कि दूरदर्शिता का विकास ही नहीं हो पाता।
जाति की राजनीति करने वाले अधिकतर लोग स्वयं सुरक्षित, सम्पन्न और प्रतिष्ठित हैं। लेकिन वे बहस को वहीं घुमाते हैं जहां उनका फायदा है।वामपंथ का हवाला देते हैं, जबकि देश में वामपंथ अब प्रासंगिक ही नहीं रहा।हम बस बहसों में उन्हें जिंदा रखे हुए हैं।
यह वर्ग बीजेपी का committed, core vote bank है।पर क्या सिर्फ इस वर्ग के भरोसे देश आगे बढ़ सकता है?दुनिया का 80% बाजार चीन के पास है।भारत अभी विकासशील है, विकसित बनने की यात्रा कठिन है, पर असंभव नहीं।इसी बीच ट्रंप ने चीन पर 100% और 500% टैरिफ लगाने की बात कही है।यह ऐतिहासिक अवसर है—जो कई पीढ़ियों में एक बार मिलता है।
प्रसिद्ध पत्रकार शेखर गुप्ता लिखते हैं कि यदि भारत ने इस अवसर का लाभ उठाया तो दुनिया में पहला या दूसरा आत्मनिर्भर राष्ट्र बनने की राह आसान हो जाएगी।
आइंस्टीन ने कहा था—“Information is not knowledge unless you act on it.” सूचना तभी ज्ञान है जब उस पर काम किया जाए।पीयूष गोयल के पास योजनाएं हैं, दूरदृष्टि है।
पर पार्टी में वही सर्वोपरि नहीं।नेतृत्व और थिंक-टैंक validation और spotlight syndrome में उलझे हुए हैं।इस मानसिकता से निकलना जरूरी है।
शेयर बाजार का सिद्धांत है:
“पिछला प्रदर्शन भावी प्रदर्शन की गारंटी नहीं।”
राजनीति के लिए भी यही सच है।
दीपक पाण्डेय
गैर पेशेवर राजनीतिक विश्लेषक,
बिलासपुर


