33% से आगे क्यों नहीं बढ़ी बात? महिला आरक्षण पर सवालों के बीच भाजपा की प्रेस वार्ता में..‘नारी शक्ति’ का बड़ा दावा”
नारी शक्ति वंदन पर मंच सजा, लेकिन आधे हिस्से के सवाल पर खामोशी

बिलासपुर। नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 को लेकर भाजपा ने बिलासपुर में अपनी रणनीति और राजनीतिक संदेश स्पष्ट किया, लेकिन प्रेस वार्ता के बीच एक सवाल ऐसा उठा जिसने पूरे विमर्श का केंद्र बदल दिया—जब लक्ष्य सशक्तिकरण है, तो आरक्षण 50 प्रतिशत क्यों नहीं?
न्यू सर्किट हाउस, मुंगेली नाका में आयोजित पत्रकारवार्ता में प्रदेश मंत्री हर्षिता पांडेय, महापौर पूजा विधानी, महिला मोर्चा की प्रदेश मंत्री शीलू साहू, जिला अध्यक्ष स्नेह लता शर्मा और समाजसेवी डॉ. श्वेता साव मौजूद रहीं। मंच से नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लोकतंत्र के इतिहास का “युगांतरकारी कदम” बताया गया और इसे महिलाओं को “नीति की लाभार्थी” से “नीति निर्माता” बनाने की दिशा में निर्णायक बताया गया।
हर्षिता पांडेय ने साफ कहा कि 16 से 18 अप्रैल 2026 के बीच प्रस्तावित विशेष सत्र के जरिए लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण सुनिश्चित करने की दिशा में आगे बढ़ा जा रहा है। उनका जोर इस बात पर रहा कि अब तक पंचायत स्तर पर जो बदलाव दिखा है, वही असर संसद और विधानसभाओं में भी देखने को मिलेगा। उन्होंने पंचायतों में 46 प्रतिशत महिला प्रतिनिधित्व और लगभग 14.5 लाख निर्वाचित महिलाओं का हवाला देते हुए कहा कि भागीदारी बढ़ने से शासन की प्राथमिकताएं बदलती हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण जैसे मुद्दे केंद्र में आते हैं।
प्रेस वार्ता में सरकार की योजनाओं और आंकड़ों के जरिए यह संदेश देने की कोशिश रही कि महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में ठोस काम हुआ है। उज्ज्वला से लेकर जल जीवन मिशन, स्वयं सहायता समूहों से जुड़ती महिलाएं, बैंक खातों का विस्तार और मुद्रा योजना में महिलाओं की भागीदारी—इन सभी को नारी सशक्तिकरण की मजबूत जमीन के रूप में पेश किया गया। यह भी रेखांकित किया गया कि देश में महिला मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 48.62 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है और कई चुनावों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से आगे रहा है।
लेकिन प्रेस वार्ता का सबसे अहम और असहज क्षण तब आया, जब 50 प्रतिशत आरक्षण को लेकर सीधा सवाल पूछा गया। मंच पर मौजूद महिला नेताओं ने इस पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया और चर्चा का फोकस फिर 33 प्रतिशत आरक्षण और उसके संभावित प्रभावों की ओर मोड़ दिया गया। यहीं से यह सवाल और तेज हो गया कि क्या राजनीतिक दल महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर आधे रास्ते पर ही रुक गए हैं।
कुल मिलाकर, प्रेस वार्ता में जहां एक ओर नारी शक्ति वंदन अधिनियम को ऐतिहासिक बताकर उसका व्यापक राजनीतिक संदेश देने की कोशिश हुई, वहीं 50 प्रतिशत आरक्षण पर चुप्पी ने इस मुद्दे को और बहस के केंद्र में ला दिया है। अब नजर इस बात पर टिक गई है कि संसद के भीतर यह “नारी शक्ति” का दावा वास्तविक प्रतिनिधित्व में कितना बदल पाता है।





