जब लंका ने लात मारी और राम ने राज दे दिया—विभीषण की शरणागति ने रुला दिया बिलासपुर
भाई ने अपमान किया, प्रभु ने अभिषेक—रामकथा का सबसे करुण अध्याय

बिलासपुर..संसार में यदि वास्तव में कोई दो नाम आत्मा को शांति देते हैं, तो वे हैं— राम और श्याम। और यदि किसी एक नाम में साहस, विवेक, भक्ति और समर्पण का महासागर समाया है, तो वह है हनुमान। यही भाव, यही चेतना और यही संदेश लाल बहादुर शास्त्री स्कूल मैदान में आयोजित संगीतमय रामकथा के मंच से संत विजय कौशल महाराज ने श्रद्धालुओं के हृदय में उतार दिया।
महाराज ने कहा कि प्रातःकाल उठते ही राम और हनुमान का स्मरण करना चाहिए। कुछ लोग अज्ञानवश सुबह हनुमान नाम लेने से रोकते हैं, जबकि यही समय सबसे पवित्र होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि महिलाओं को हनुमान पूजा से रोकना शास्त्रसम्मत नहीं है—माता स्वरूपा नारी को पूर्ण श्रद्धा से हनुमान पाठ और पूजा करनी चाहिए। पूजा-पाठ के बीच बार-बार उठना भी अनुचित है, क्योंकि भक्ति केवल क्रिया नहीं, एकाग्र समर्पण है।
सुंदरकांड—दुखों के अंधकार में जलता दीप
संत विजय कौशल महाराज ने कहा कि सुंदरकांड सिद्धि का कांड है। इसका निरंतर पाठ भय, बाधा और संकट का नाश करता है। जिन घरों में बुजुर्गों की बात मानी जाती है, वहां जीवन अपने आप सरल हो जाता है।
उन्होंने हनुमान को केवल बल का प्रतीक नहीं, बल्कि विवेक का सर्वोच्च उदाहरण बताया। माता जानकी के आशीर्वाद से उनका शरीर वज्र के समान है। यही कारण है कि आज देश में राम से अधिक हनुमान के मंदिर हैं। वे अष्ट सिद्धि और नव निधि के दाता हैं—और प्रभु राम तक पहुंचने का सेतु भी।
मुद्रिका से विश्वास और सुंदरकांड से संबल
कथा में हनुमान के लंका गमन का दृश्य अत्यंत जीवंत रहा। राम द्वारा दी गई मुद्रिका, ‘कृपानिधाम’ शब्द का संकेत, विभीषण के घर तुलसी दर्शन, अशोक वाटिका में विलाप करती सीता—हर प्रसंग जैसे सजीव हो उठा।
हनुमान द्वारा वाटिका उजाड़ना, रावण की सभा में प्रस्तुति, विभीषण के हस्तक्षेप से पूंछ में आग और उसी आग से पूरी लंका का दहन—यह सब केवल कथा नहीं, अहंकार और भक्ति के संघर्ष का प्रतीक बन गया।
जब भाई ने लात मारी और प्रभु ने लंकेश बनाया
कथा का सबसे मार्मिक क्षण तब आया, जब संत विजय कौशल महाराज ने विभीषण के लंका से निष्कासन का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि यदि हनुमान के परामर्श पर विभीषण समय रहते राम की शरण में चले गए होते, तो विनाश की रेखा शायद न खिंचती।
लेकिन जब भाई से तिरस्कार, अपमान और लातें खाने के बाद विभीषण प्रभु की शरण में पहुंचे—तो प्रभु राम ने उन्हें केवल शरण नहीं दी, बल्कि ‘लंकेश’ कहकर पुकारा और अभिषेक भी किया।
मंदोदरी, माल्यावंत और विनाश की अनसुनी चेतावनी
माल्यावंत और मंदोदरी के संवाद में चेतावनी थी—माता सीता को ससम्मान राम के पास भेज दो। मंदोदरी ने आभूषण उतारकर विधवा होने की घोषणा तक कर दी। विभीषण ने समझाया कि स्वयं कालों के काल राम पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं, उनकी शरण में जाने से सब अपराध क्षमा हो जाएंगे—लेकिन रावण नहीं माना। अंततः प्रभु राम को समुद्र की ओर बढ़कर लंका पर निर्णायक कार्यवाही का आदेश देना पड़ा।
भक्त मरता नहीं, अंतर्ध्यान होता है
महाराज ने कहा कि भक्त की कभी मृत्यु नहीं होती—वह केवल अंतर्ध्यान होता है। माता सीता की एक माह की प्रतिज्ञा, सुंदरकांड की अद्वितीय शक्ति और शनिवार-मंगलवार पाठ की परंपरा—इन सबने कथा को जीवन से जोड़ दिया।
आज कथा का अंतिम दिन, ‘नंदिनी’ विशेष आकर्षण
लाल बहादुर शास्त्री स्कूल मैदान में आयोजित रामकथा का आज अंतिम दिन है। कथा प्रातः 9:30 बजे प्रारंभ होगी।
कार्यक्रम में अमर अग्रवाल, शशि अग्रवाल, महेश अग्रवाल, गुलशन ऋषि, गोपाल शर्मा, युगल शर्मा सहित अनेक सामाजिक संगठनों की सहभागिता रही। समापन पर अमर अग्रवाल, शशि अग्रवाल और विधायक धर्मजीत सिंह सहित गणमान्यजन आरती में सम्मिलित हुए।





