बलरामपुर (पृथ्वी लाल केशरी)… गरीब परिवारों को सस्ता और मुफ्त अनाज उपलब्ध कराने वाली सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आखिर गरीबों को कैसा चावल मिल रहा है? बलरामपुर जिले में सामने आए दो मामले इस सवाल को और गंभीर बना रहे हैं। कहीं राशन के चावल में भारी मात्रा में कंकड़-पत्थर मिलने की शिकायत है, तो कहीं गरीबों में बांटे जाने वाले चावल पर घरों से निकलने वाला गटर का गंदा पानी डाले जाने का मामला सामने आ चुका है। ये महज चावल की गुणवत्ता से जुड़े सवाल नहीं हैं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की निगरानी पर सवाल हैं, जिसके भरोसे हजारों गरीब परिवारों की खाद्य सुरक्षा टिकी है।

बलरामपुर विकासखंड के ग्राम खड़ियाडामर की शासकीय उचित मूल्य दुकान में चावल वितरण के दौरान उस समय हंगामा मच गया, जब हितग्राहियों ने बोरों में रखे चावल में बड़ी मात्रा में कंकड़-पत्थर देखे। राशन लेने पहुंचे उपभोक्ताओं ने इस पर नाराजगी जताई और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को इसकी सूचना दी। मौके पर पहुंचे अधिकारियों ने चावल का निरीक्षण किया और संबंधित खेप को अस्वीकार कर दूसरी खेप उपलब्ध कराने की बात कही। सवाल यह है कि यदि चावल में इतनी बड़ी मात्रा में कंकड़-पत्थर मौजूद थे, तो यह खेप गुणवत्ता जांच की प्रक्रिया पार कर राशन दुकान तक पहुंची कैसे?

बताया जा रहा है कि संबंधित चावल की आपूर्ति दीप राइस मिल से हुई थी। ऐसे में जांच का दायरा केवल उचित मूल्य दुकान तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह पता लगाना जरूरी है कि चावल की गुणवत्ता में गड़बड़ी कहां हुई, आपूर्ति से पहले उसकी जांच किसने की और जिम्मेदार स्तर पर लापरवाही हुई तो उसके लिए कौन जवाबदेह है। खराब चावल को लौटाकर दूसरी खेप देने से तत्काल समस्या का समाधान हो सकता है, लेकिन इससे यह सुनिश्चित नहीं होता कि भविष्य में ऐसी गड़बड़ी दोबारा नहीं होगी।

कंकड़-पत्थर,चावल पर गटर का पानी

खड़ियाडामर का मामला सामने आने से पहले जिले के डुमरखोरका गांव की राशन दुकान में चावल पर गटर का गंदा पानी डाले जाने की शिकायत भी सामने आ चुकी है। ग्रामीणों ने विरोध जताया था। इसके बाद जनपद सदस्य समीर सिंह देव और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे। शिकायत की जांच के दौरान चावल पर दूषित पानी डाले जाने की पुष्टि होने की बात सामने आई थी। इसके बाद संबंधित बोरियों को सील कर दिया गया था।

गरीबों को बांटे जाने वाले अनाज के साथ इस तरह की लापरवाही या जानबूझकर की गई हरकत को सामान्य प्रशासनिक चूक मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि चावल में गंदा पानी डालने की पुष्टि हुई है, तो यह जानना भी जरूरी है कि ऐसा किसने और क्यों किया। वहीं, खड़ियाडामर में कंकड़-पत्थर वाला चावल पहुंचने के पीछे आपूर्ति, भंडारण और गुणवत्ता जांच की किस स्तर पर चूक हुई, इसका भी स्पष्ट जवाब सामने आना चाहिए।

दोनों मामलों की प्रकृति अलग है, लेकिन इनसे उठने वाला बुनियादी सवाल एक ही है—गरीबों के हिस्से के अनाज की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? राशन वितरण की व्यवस्था में दुकानदार से लेकर आपूर्ति और निगरानी से जुड़े अधिकारियों तक कई स्तर होते हैं। ऐसे में किसी एक स्तर पर कार्रवाई कर पूरे मामले को समाप्त मान लेना पर्याप्त नहीं होगा।

जांच की औपचारिकता, जवाबदेही तय हो

सार्वजनिक वितरण प्रणाली सरकार की महत्वपूर्ण जनकल्याणकारी योजना है। इसका उद्देश्य जरूरतमंद परिवारों तक सुरक्षित और निर्धारित गुणवत्ता का अनाज पहुंचाना है। लेकिन यदि राशन दुकान तक पहुंचने वाले चावल में कंकड़-पत्थर मिलें और दूसरी जगह उसी अनाज पर गंदा पानी डालने जैसी घटना सामने आए, तो निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अब जिला प्रशासन के सामने चुनौती केवल खराब चावल बदलवाने की नहीं, बल्कि पूरी आपूर्ति शृंखला की जांच करने की है। दीप राइस मिल से संबंधित खेप की गुणवत्ता, नमूनों की जांच, भंडारण की स्थिति, परिवहन और राशन दुकान तक चावल पहुंचने की प्रक्रिया की पड़ताल होनी चाहिए। डुमरखोरका प्रकरण में भी यह स्पष्ट होना चाहिए कि दूषित पानी डालने के लिए जिम्मेदार कौन था और मामले में आगे क्या कार्रवाई हुई।

इन घटनाओं को लेकर राजनीतिक गलियारों से लेकर आम लोगों के बीच चर्चा हो रही है। मगर सवाल किसी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे का है। गरीबों के राशन की गुणवत्ता किसी दल की प्रतिष्ठा का नहीं, बल्कि आम लोगों के अधिकार और प्रशासनिक जवाबदेही का विषय है। दोषी चाहे आपूर्ति से जुड़ा व्यक्ति हो, मिल संचालक हो या निगरानी में लापरवाही बरतने वाला जिम्मेदार अधिकारी—जांच में भूमिका स्पष्ट होने पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

जिला प्रशासन को बताना होगा कि जिले में वितरित होने वाले चावल की गुणवत्ता जांच की मौजूदा व्यवस्था क्या है, खड़ियाडामर की खेप को किस आधार पर अस्वीकार किया गया और भविष्य में ऐसी शिकायतों को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।