9.43 अरब बिलासपुर में, तो पूरे प्रदेश में कितना? महतारी बंधन योजना के खर्च पर बड़ा सवाल
3 करोड़ आबादी वाले राज्य में बजट के बड़े हिस्से पर बहस तेज

बिलासपुर…छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के करीब दो साल पूरे होते ही उसकी प्रमुख योजनाओं का असर अब आंकड़ों की कसौटी पर कसना शुरू हो गया है। महतारी वंदन योजना, जिसे सरकार महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का मजबूत माध्यम बता रही है, अब खर्च बनाम परिणाम की बहस के केंद्र में है।
मार्च 2024 से फरवरी 2026 तक के 24 महीनों में अकेले बिलासपुर जिले में इस योजना के तहत 9 अरब 43 करोड़ 16 लाख 28 हजार 300 रुपए सीधे महिलाओं के खातों में ट्रांसफर किए गए हैं। जिले में 4 लाख से अधिक महिलाएं इस योजना का लाभ ले रही हैं, जिन्हें हर महीने 1000 की सहायता राशि मिल रही है।
दस्तावेजों के मुताबिक हर महीने करीब 39 से 40 करोड़ रुपए का भुगतान हुआ, लेकिन इसमें लगातार उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया। अधिकारियों के अनुसार इसकी मुख्य वजह KYC प्रक्रिया और तकनीकी अड़चनें हैं। शुरुआत में लाभार्थियों की संख्या 6 लाख से अधिक थी, जो सत्यापन के बाद घटकर लगभग 4 लाख रह गई। जिनका KYC अधूरा रहता है या जिनके खातों में तकनीकी समस्या होती है, उनका भुगतान रोक दिया जाता है और बाद में एकमुश्त राशि ट्रांसफर की जाती है।
यही कारण है कि भुगतान का पैटर्न हर महीने बदलता रहा और कई बार अचानक राशि बढ़ती या घटती नजर आई।
इस बीच, एक बड़ा तथ्य यह भी है कि छत्तीसगढ़ में कुल 33 जिले हैं। ऐसे में सिर्फ बिलासपुर के आंकड़ों को आधार मानें तो सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रदेश स्तर पर इस योजना में खर्च की राशि कितनी बड़ी हो सकती है। लगभग 3 करोड़ की आबादी वाले राज्य में यह योजना सीधे बड़ी संख्या में महिलाओं तक पहुंच रही है, जिससे यह राज्य के बजट का एक अहम हिस्सा बनती जा रही है।
सरकार इसे महिलाओं के हाथ में सीधे नकदी पहुंचाने की प्रभावी पहल बता रही है, जिससे घरेलू आर्थिक मजबूती का दावा किया जा रहा है। लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि इतने बड़े पैमाने पर खर्च के बावजूद क्या इसका ठोस और दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक असर सामने आ रहा है।
स्थानीय स्तर पर उठ रही चर्चाओं में यह बात भी सामने आ रही है कि जहां अन्य सामाजिक योजनाओं, जैसे वृद्धा पेंशन में 500 दिए जाते हैं, वहीं इस योजना में 1000 प्रति माह दिए जा रहे हैं। इससे प्राथमिकताओं के संतुलन पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
इसके साथ ही यह मुद्दा भी उभर रहा है कि योजना का लाभ केवल जरूरतमंदों तक सीमित नहीं रह पा रहा। कई सक्षम परिवारों की महिलाएं भी इस योजना का लाभ ले रही हैं, जिससे पात्रता की पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं।
महतारी वंदन योजना अब सिर्फ एक सामाजिक सहायता कार्यक्रम नहीं, बल्कि राज्य के वित्तीय प्रबंधन और नीतिगत प्राथमिकताओं की बड़ी परीक्षा बनती जा रही है। बिलासपुर के आंकड़े इस बहस को और धार देते हैं और सीधा सवाल खड़ा करते हैं— क्या हजारों करोड़ के इस खर्च का कोई ठोस, मापने योग्य परिणाम सामने आएगा, या यह योजना केवल सीमित आर्थिक राहत तक सिमट कर रह जाएगी?





