लाचार सिस्टम पर सवाल: प्राइवेट स्कूलों की खुली चुनौती, विभाग की खामोशी क्यों?

रामानुजगंज..( पृथ्वी लाल केशरी)स्कूल शिक्षा व्यवस्था पर इन दिनों गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं, जहां नियंत्रण कमजोर पड़ता नजर आ रहा है और उसका असर सीधे गरीब बच्चों के अधिकारों पर पड़ रहा है। प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन ने आरटीई के तहत गरीब बच्चों के प्रवेश में असहयोग का खुला ऐलान कर दिया है—और यह ऐलान किसी बंद कमरे में नहीं, बल्कि खुले मंच से किया गया।
यह स्थिति इसलिए ज्यादा गंभीर हो जाती है क्योंकि यह केवल असहमति नहीं, बल्कि शासन के नियमों को चुनौती देने जैसा है। संगठन ने साफ कहा है कि वह इस प्रक्रिया में सहयोग नहीं करेगा। इसके बावजूद अब तक स्कूल शिक्षा मंत्री और विभागीय अफसरों की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब गरीब बच्चों के शिक्षा अधिकार पर सीधा असर पड़ रहा है, तब जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग चुप क्यों हैं। यह खामोशी अब सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि व्यवस्था की स्थिति को भी उजागर कर रही है। पहली बार ऐसा माहौल बनता दिख रहा है, जहां सिस्टम को इस तरह खुलेआम ललकारा गया हो और जवाब में सन्नाटा हो।
हालांकि इस बीच मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने स्पष्ट संकेत दिया है कि स्कूलों की किसी भी प्रकार की मनमानी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह बयान स्थिति को संभालने का प्रयास जरूर दिखाता है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर कितना दिखेगा, यह आने वाला समय तय करेगा।
फिलहाल नजर इस बात पर है कि इस सत्र में आरटीई के तहत निजी स्कूलों में दाखिले के आंकड़े क्या तस्वीर पेश करते हैं। क्योंकि सवाल सिर्फ आंकड़ों का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है, जो शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा है—और फिलहाल वही भरोसा सबसे ज्यादा कमजोर होता नजर आ रहा है।





