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Bilaspur

पुराना बस स्टैंड..! तीसरा रास्ता या तीसरी सियासत..?

बिलासपुर( मनीष जायसवाल ) शहर के बीचों-बीच स्थित पुराना बस स्टैंड एक बार फिर सवालों के घेरे में है। यहां बीते कई सालों से संचालित शराब दुकान हमेशा विवादों में रही, लेकिन हाल के महीनों में नगर निगम के एक फैसले ने इस विवाद को और गहरा कर दिया। राज्य परिवहन निगम का शेड तोड़कर शराब दुकान के सामने सीधा रास्ता खोल दिया गया। और यहीं से माहौल ने नया मोड़ ले लिया।

पहले जो दुकान सीमित दायरे में थी, अब वह सीधे मुख्य मार्ग और राजीव प्लाजा के सामने खुली दिखाई देती है। सवाल यह नहीं कि शराब बिक रही है। वह तो सरकार की अधिकृत व्यवस्था है। सवाल यह है कि क्या शहर के सबसे संवेदनशील, व्यावसायिक और भीड़भाड़ वाले इलाके में ऐसी तस्वीर और पहुंच बढ़ाना दूरदर्शी निर्णय था..?

व्यापारी असंतुष्ट है..। शराबी कही भी बैठ कर शराब पी रहे है। पार्किग करने वाले परेशान है। यहां बाहर से आने वाले लोग असुरक्षित महसूस करते हैं। छाया होटल परिसर, आसपास की दुकानों और लॉज में ठहरने वाले परिवारों के लिए यह माहौल क्या संदेश देता है..? क्या नगर नियोजन का उद्देश्य सुविधा बढ़ाना था या विवाद का दायरा..?

यह भी विचित्र है कि शहर में कई शराब दुकानें अपेक्षाकृत लो प्रोफाइल ढंग से संचालित होती हैं, लेकिन यहां तीसरा रास्ता खोलकर इसे केंद्र में ला खड़ा किया गया..। क्या यह प्रशासनिक चूक है..? या फिर आय बढ़ाने की अनकही प्राथमिकता..? सरकार के लिए शराब राजस्व का बड़ा स्रोत है । यह किसी से छिपा नहीं। लेकिन राजस्व और सामाजिक संतुलन के बीच रेखा खींचने की जिम्मेदारी भी तो प्रशासन की ही है..!

महापौर और जनप्रतिनिधि सार्वजनिक आयोजनों में सक्रिय दिखते हैं। पर क्या उन्होंने इस क्षेत्र की जमीनी स्थिति का निरीक्षण किया..? यदि किया, तो आपत्ति क्यों नहीं..? यदि नहीं किया, तो क्यों नहीं..? क्या निकाय प्रशासन पर अफसरशाही हावी है, या फिर निर्णय कहीं और से संचालित हो रहे है..?

शहर की राजनीति में यह सवाल इसलिए भी गूंज रहा है कि नगर की सत्ता, विधानसभा क्षेत्र और संसदीय प्रभाव सब यहीं केंद्रित हैं। ऐसे में किसी भी निर्णय का असर सिर्फ तीसरे रास्ते तक सीमित नहीं है। यह छवि, विश्वास और जन भावना तक जाता है..।ऐसे में क्या यह निर्णय जन आकांक्षाओं के अनुरूप था..? या फिर यह वही स्लो प्वाइजन है जो धीरे-धीरे असंतोष को जन्म देता है..?

लोकतंत्र में शराब नीति पर बहस नई नहीं है। फर्क बस इतना है कि पहले जो नीति दूर कहीं बनती थी, उसका असर अब मोहल्ले के चौराहे पर दिख रहा है..। नगर निगम का यह निर्णय प्रशासनिक फाइल में भले एक साधारण आदेश हो, लेकिन जमीन पर यह सामाजिक प्रयोग जैसा लगता है। और प्रयोग भी ऐसा जिसकी कीमत शहर का आम नागरिक चुका रहा है..।

आज जरूरत आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, असल में ठोस जन हित के निर्णय की है। जरूरत है यह बताने की है आखिर, तीसरा रास्ता खोलने का औचित्य क्या था..? क्या स्थानीय व्यापारियों से राय ली गई..? क्या यहां कुछ नया बनने वाला था..? और यदि स्थिति अव्यवस्थित है, तो सुधार की योजना क्या है..?

शहर सिर्फ सड़कों, इमारतों और चमकदार लाइटों से नहीं बनता, उसकी पहचान उसके माहौल से बनती है। यदि निर्णय विकास के नाम पर अशांति पैदा करें, तो वे विकास नहीं, विवाद कहलाते है..। पुराना बस स्टैंड आज सिर्फ एक स्थान नहीं,असल में यह नगर शासन की कार्यशैली का आईना बन गया है..। अब देखना यह है कि इस आईने में दिखती तस्वीर को सुधारने की इच्छा व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों में है या नहीं..

Chief Editor

छत्तीसगढ़ के ऐसे पत्रकार, जिन्होने पत्रकारिता के सभी क्षेत्रों में काम किया 1984 में ग्रामीण क्षेत्र से संवाददाता के रूप में काम शुरू किया। 1986 में बिलासपुर के दैनिक लोकस्वर में उपसंपादक बन गए। 1987 से 2000 तक दिल्ली इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के राष्ट्रीय अखबार जनसत्ता में बिलासपुर संभाग के संवाददाता के रूप में सेवाएं दीं। 1991 में नवभारत बिलासपुर में उपसंपादक बने और 2003 तक सेवाएं दी। इस दौरान राजनैतिक विश्लेषण के साथ ही कई चुनावों में समीक्षा की।1991 में आकाशवाणी बिलासपुर में एनाउँसर-कम्पियर के रूप में सेवाएं दी और 2002 में दूरदर्शन के लिए स्थानीय साहित्यकारों के विशेष इंटरव्यू तैयार किए ।1996 में बीबीसी को भी समाचार के रूप में सहयोग किया। 2003 में सहारा समय रायपुर में सीनियर रिपोर्टर बने। 2005 में दैनिक हरिभूमि बिलासपुर संस्करण के स्थानीय संपादक बने। 2009 से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में बिलासपुर के स्थानीय न्यूज चैनल ग्रैण्ड के संपादक की जिम्मेदारी निभाते रहे । छत्तीसगढ़ और स्थानीय खबरों के लिए www.cgwall.com वेब पोर्टल शुरू किया। इस तरह अखबार, रेडियो , टीवी और अब वेबमीडिया में काम करते हुए मीडिया के सभी क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई है।
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