दहशत से दस्तक तक: बिलासपुर में अपराधियों का साम्राज्य टूटा, अब परछाईं से भी बच रहे संरक्षणदाता
जिस शहर में गुंडे कानून तय करते थे, वहाँ अब कानून तय कर रहा है गुंडों की किस्मत

बिलासपुर…पिछले पाँच वर्षों के संगठित अपराध नेटवर्क को लेकर बिलासपुर पुलिस ने हिस्ट्रीशीटरों की विस्तृत हिस्ट्रीशीट तैयार कर ली है। इसी पड़ताल में सामने आया कि बिलासपुर जिले के कुछ इलाके—चाटी डीह, लिंगियाडीह, ओम नगर, सिरगिट्टी और देवरी खुर्द—सिर्फ रिहायशी क्षेत्र नहीं रह गए थे, बल्कि संगठित अपराध और नशे के कारोबार की खुली प्रयोगशाला बन चुके थे। हालात यह थे कि व्यापारियों के लिए दुकान खोलना जोखिम भरा हो गया था और चैन स्नेचिंग जैसी वारदातें सामान्य घटनाओं की सूची में शामिल हो चुकी थीं। भय इतना गहरा था कि शिकायत करना भी साहस का काम माना जाता था।
पिछले पाँच वर्षों तक यह संगठित अपराध केवल गुंडों या हिस्ट्रीशीटरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सफेदपोश संरक्षण की मजबूत छतरी के नीचे पनपता रहा। राजनीतिक रसूख, सामाजिक दबदबा और सिस्टम के भीतर बैठी मिलीभगत ने अपराध को इस कदर निडर बना दिया था कि जेल के भीतर बैठे लोग भी बाहर पूरे नेटवर्क का संचालन कर रहे थे। यही वजह थी कि कानून का डर धीरे-धीरे खत्म होता चला गया।
तय्यब ख़ान, अकबर ख़ान, तैय्या मैडी उर्फ निखारे जैसे नाम इलाके की पहचान बनते जा रहे थे। NDPS से जुड़े गिरोह खुलेआम हिंसक औजार लेकर सड़कों पर घूमते थे। एक समय ऐसा भी रहा जब लोग वर्दी के सामने से गुजरने से बचते थे, और थाने के आसपास का इलाका सुरक्षा नहीं बल्कि आशंका का केंद्र बन गया था।
इसी पृष्ठभूमि में प्रदेश सरकार के स्पष्ट निर्देश और विशेष रणनीतिक सहयोग के साथ बिलासपुर पुलिस ने इस आपराधिक ढांचे को जड़ से उखाड़ने का बीड़ा उठाया। यह केवल कार्रवाई नहीं थी, बल्कि एक साफ संदेश था कि अब अपराध न तो सौदेबाज़ी से बचेगा, न सिफारिश से।
नशे के सौदागरों के खिलाफ पुलिस केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रही। पहली बार SAFEMA के तहत करोड़ों रुपये की अवैध संपत्तियों को जब्त किया गया। दिल्ली, जबलपुर, भोपाल और हैदराबाद तक फैली पाप की कमाई पर सीधी कार्रवाई हुई—संपत्तियाँ सील की गईं, बैंक खातों पर शिकंजा कसा गया और यह साबित किया गया कि अपराध का पैसा चाहे जहाँ छिपा हो, कानून वहाँ तक पहुँचेगा।
यह अभियान केवल बाहरी अपराधियों तक सीमित नहीं रहा। पुलिस ने खुद अपनी वर्दी के भीतर मौजूद ग़द्दारी को भी नहीं बख्शा। संविधान की शपथ लेने वाले जिन लोगों ने आचरण को कानून से ऊपर समझा, उनके खिलाफ भी कठोर कदम उठाए गए। इससे यह संदेश साफ हुआ कि वर्दी संरक्षण नहीं देती—अगर चाल-चलन गुंडों जैसा होगा, तो अंजाम भी वही होगा।
रेल प्रशासन के माध्यम से गांजा, अफीम, चरस और हशीश की तस्करी करने वाले नेटवर्क पर भी पुलिस ने निर्णायक प्रहार किया। ऐसे मामलों में गिरफ्तारियाँ और जेल भेजे जाने की कार्रवाइयाँ यह बताने के लिए काफी थीं कि नशे का कारोबार अब किसी भी रास्ते से सुरक्षित नहीं है।
इन लगातार अभियानों का असर जमीन पर साफ दिखाई देने लगा है। जिन इलाकों में शाम ढलते ही दहशत छा जाती थी, वहाँ अब सामान्य आवाजाही लौट रही है। व्यापारी राहत की सांस ले रहे हैं और आम नागरिक यह महसूस कर रहा है कि कानून केवल फाइलों में नहीं, सड़कों पर भी मौजूद है।
अब हालात यहाँ तक बदल चुके हैं कि अपराधियों को निभाने और संरक्षण देने वाले नेता भी उनकी परछाईं से दूरी बना रहे हैं। सरकार और बिलासपुर पुलिस ने वह कर दिखाया है जिसकी कुछ वर्ष पहले तक कल्पना भी नहीं की जाती थी। संगठित अपराध का वह आत्मविश्वास, जो सत्ता की छांव में पलता था, अब पूरी तरह बिखर चुका है।
पुलिस कप्तान रजनेश सिंह का रुख साफ और दो-टूक है बिलासपुर में किसी भी प्रकार का अपराध मंजूर नहीं है। न नशा, न हथियार, न गिरोह। कानून सबके लिए बराबर है। जो लोग जंगलराज में विश्वास रखते हैं, उन्हें स्पष्ट संदेश है—जिला छोड़ दें, वरना उन्हें अच्छी तरह पता है कि उनकी जगह कहाँ है।





