
बिलासपुर (मनीष जायसवाल) ।छत्तीसगढ़ में बोर्ड परीक्षाओं से ठीक पहले शिक्षकों पर एसेंशियल सर्विस एंड मेंटेनेंस एक्ट (एस्मा) लागू किए जाने को लेकर सवाल और शंकाएं गहराने लगी हैं। सर्व शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप पाण्डेय ने इस फैसले पर गंभीर आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया है कि सिस्टम के भीतर बैठे कुछ लोग प्रदेश के मुख्यमंत्री को शिक्षक समाज से दूर करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि सरकार और प्रदेश के सबसे बड़े कर्मचारी वर्ग के बीच अविश्वास की खाई पैदा हो।
प्रदीप पाण्डेय का कहना है कि शिक्षकों को याद नहीं पड़ता कि परीक्षा या परीक्षा ड्यूटी के नाम पर आखिरी बार कब इस तरह का कानून लागू किया गया हो। तीन महीने तक छुट्टी, आंदोलन और ड्यूटी से इनकार पर रोक लगाकर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जैसे शिक्षक भरोसे के काबिल ही न हों। उन्होंने कहा कि जब-जब प्रदेश और देश को जरूरत पड़ी, शिक्षक बिना सवाल किए मैदान में उतरे, चाहे राष्ट्रीय कार्यक्रम रहे हों या कोरोना जैसी गंभीर आपदा। उस वक्त न कोई कानून दिखा, न किसी तरह का संदेह जताया गया।
शिक्षक नेता ने कहा कि एक शिक्षक सिर्फ पढ़ाने वाला कर्मचारी नहीं होता, असल में वह बच्चों का गुरु और मार्गदर्शक होता है। वही शिक्षक छात्र की कमजोरी पहचानता है, उसे संवारता है और एक जिम्मेदार नागरिक बनाने की सोच रखता है। ऐसे शिक्षक पर अविश्वास जताना पूरे समाज पर अविश्वास करने जैसा है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या मंत्री और अफसर यह भूल गए हैं कि शिक्षक कभी जिम्मेदारी से पीछे हटने वाला वर्ग नहीं रहा है।
प्रदीप पाण्डेय ने आरोप लगाया कि इससे पहले ट्रांसफर, युक्ति युक्तकरण में कथित मनमानी और फिर वीएसके ऐप के नाम पर शिक्षकों पर दबाव बनाया गया। अब एस्मा लगाकर हालात को और बिगाड़ने का काम किया जा रहा है। उनका कहना है कि यह सब मिलकर उस धीमे ज़हर की तरह है, जो ऊपर बैठे नेतृत्व और शिक्षक समाज के बीच दूरी बढ़ा रहा है। समय रहते इसे नहीं रोका गया तो नुकसान सिर्फ सरकार का नहीं देखा जाए।तो पूरी शिक्षा व्यवस्था का होगा।
उन्होंने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ की कार्य संस्कृति डर और दंड से चलने की नहीं रही है। यहां हमेशा भरोसे के साथ काम हुआ है। दूसरे राज्यों की नकल कर फैसले लेना राज्य की सामाजिक और प्रशासनिक प्रकृति के अनुरूप नहीं है। समर्पण दबाव से नहीं निकलता और जिम्मेदारी डर से नहीं निभाई जाती। अगर सिस्टम के लोग इसी रास्ते पर चलते रहे तो शिक्षक समाज खुद को ठगा हुआ महसूस करेगा, जिसकी जिम्मेदारी उन्हीं अधिकारियों पर आएगी जो परदे के पीछे बैठकर फैसलों की दिशा तय कर रहे हैं




