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शेख हसीना को फांसी: ढाका ट्रिब्यूनल का ऐतिहासिक फैसला, छात्र आंदोलन दमन की ‘मुख्य मास्टरमाइंड’ करार

ढाका/भारत….बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल-1 ने बड़ा ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मानवता के खिलाफ गंभीर अपराधों का दोषी ठहराया है। उन्हें फांसी की सजा सुनाई है। अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में हसीना को छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलन के दौरान हुई हिंसा, गोलीबारी और दमन की “मुख्य मास्टरमाइंड” करार दिया। न्यायाधिकरण ने कहा कि उन्होंने न सिर्फ इस कार्रवाई की अनुमति दी, बल्कि इसे योजनाबद्ध तरीके से अंजाम तक पहुँचाने में निर्णायक भूमिका निभाई।

तीन न्यायाधीशों वाली बेंच ने यह पाया कि हसीना तथा उनके शीर्ष नेतृत्व ने आवाज उठाने वाले छात्रों और प्रदर्शनकारियों को दबाने के लिए हेलीकॉप्टर, ड्रोन और घातक हथियारों के उपयोग का समर्थन किया था। अदालत के मुताबिक, आंदोलनकारियों पर हुआ हमला सुनियोजित व्यवस्थित और राजनीतिक उद्देश्य से संचालित अभियान था, जिसे शासन की आलोचना को खत्म करने के लिए अंजाम दिया गया।

अभियोग पक्ष ने अदालत को बताया कि इस दमनात्मक कार्रवाई में लगभग 1,400 लोगों की मौत हुई। ट्रिब्यूनल में पेश किए गए सबूतों में फोन कॉल रिकॉर्डिंग, वॉइस सैंपल, वीडियो फुटेज, गवाहों के बयान और कई आधिकारिक दस्तावेज़ शामिल थे, जिनसे यह स्थापित हुआ कि हसीना ने हिंसा को न सिर्फ सहमति दी, बल्कि उसे सीधे निर्देशित भी किया।

फैसले में पूर्व गृह मंत्री असदुझ्जमान खान कमाल को भी फांसी की सजा दी गई है, जबकि पूर्व पुलिस प्रमुख चौधरी अब्दुल्ला अल-मामुन को पाँच वर्ष की सजा सुनाई गई है। अल-मामुन को ट्रायल के दौरान आंशिक सहयोग करने पर गवाह का दर्जा दिया गया था।

फैसले के बाद शेख हसीना ने इसे “राजनीतिक प्रतिशोध, अनुचित और पूर्वाग्रह से भरी न्याय प्रक्रिया” करार दिया है। हसीना इस समय भारत में हैं और उन्होंने स्पष्ट किया है कि उनके प्रत्यर्पण या स्वदेश वापसी का मुद्दा अब भारत–बांग्लादेश संबंधों में एक बड़े कूटनीतिक विवाद का रूप ले चुका है।

फैसले की घोषणा से ठीक पहले ढाका में सुरक्षा बेहद कड़ी कर दी गई थी। सेना और पुलिस की भारी तैनाती की गई, कई इलाकों में आवागमन नियंत्रित किया गया और इंटरनेट निगरानी बढ़ा दी गई। हसीना समर्थकों ने इस फैसले को “राजनीतिक बदले की कार्रवाई” बताया है, जबकि वर्तमान सरकार और अभियोजन पक्ष ने इसे “न्याय की जीत” कहा है।

यह मामला 2024 में बांग्लादेश में हुए जुलाई छात्र आंदोलन से जुड़ा है। इस आंदोलन ने हसीना सरकार की सत्ता को झकझोर दिया था। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हिंसा के बाद अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल ने मामले को मानवाधिकार हनन और “मानवता के खिलाफ अपराध” के रूप में लिया। अदालत ने दो वर्ष की सुनवाई के बाद यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

फैसले के बाद अब आगे की स्थिति पर कई सवाल उठ गए हैं। हसीना अपील दायर कर सकती हैं या राष्ट्रपति से दया-याचिका कर सकती हैं। दूसरी ओर, भारत में उनकी उपस्थिति ने दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण को लेकर कूटनीतिक गतिरोध पैदा कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी फैसले का संज्ञान लेना शुरू कर दिया है, जो इसे क्षेत्रीय राजनीति पर गहरे प्रभाव वाला मामला बता रहे हैं।

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