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14 साल से अटका हक: बिलासपुर–रायपुर सड़क के मुआवजे पर 17 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में निर्णायक सुनवाई

बिलासपुर–रायपुर सड़क मुआवजा विवाद: 14 साल बाद फैसला करीब

नई दिल्ली/बिलासपुर… वर्ष 2012 से अटके बिलासपुर–रायपुर फोर लेन और सिक्स लेन सड़क परियोजना के मुआवजा विवाद ने एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर हलचल पैदा कर दी है। सड़क किनारे की अपनी बहुमूल्य जमीन गंवाने वाले किसान डेढ़ दशक से न्याय की प्रतीक्षा में हैं। अब मामला सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ—जस्टिस दीपंकर दत्ता और जस्टिस सतीश शर्मा—के समक्ष निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। अगली सुनवाई 17 मार्च को तय की गई है, जिसे इस लंबे संघर्ष की दिशा तय करने वाला दिन माना जा रहा है।

मुआवजा वितरण में असंगति की स्वीकारोक्ति

सुनवाई के दौरान नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुआवजा वितरण में असंगति की बात स्वीकार की। उन्होंने अदालत को बताया कि इस विषय पर छत्तीसगढ़ सरकार से भी चर्चा जारी है और पक्ष रखने के लिए समय की आवश्यकता है। अदालत ने आग्रह स्वीकार करते हुए अगली तिथि निर्धारित की, लेकिन यह स्पष्ट संकेत दिया कि अब मामले को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता।

पुराने मामलों पर नए नियम नहीं — सुदीप श्रीवास्तव

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव ने पूरी गंभीरता के साथ अदालत के समक्ष यह दलील रखी कि यह विवाद 12–14 वर्षों से न्यायालयों में लंबित है। उनके अनुसार राज्य सरकार द्वारा बाद में बनाए गए मार्गदर्शक सिद्धांतों को पूर्ववर्ती अधिग्रहण मामलों पर लागू करना विधिसंगत नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि समान परिस्थिति में अधिग्रहित भूमि के लिए अलग-अलग दरें न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत हैं।

श्रीवास्तव ने यह भी रेखांकित किया कि जिन किसानों की जमीन सड़क किनारे समान श्रेणी में थी, उनमें से छोटे भू-स्वामियों को अपेक्षाकृत अधिक दर से मुआवजा मिला, जबकि अधिक भूमि रखने वालों को कम दर दी गई। यह न केवल असंगति है, बल्कि समानता के संवैधानिक अधिकार पर भी प्रश्न खड़ा करता है।

लंबी कानूनी यात्रा, अब अंतिम पड़ाव?

प्रकरण अब तक दो बार आर्बिट्रेटर, दो बार जिला न्यायालय और एक बार हाई कोर्ट की प्रक्रिया से गुजर चुका है। हाई कोर्ट की दो अलग-अलग खंडपीठों ने भी संकेत दिया था कि समान स्थिति वाली जमीन के लिए भिन्न-भिन्न मुआवजा दरें न्यायोचित नहीं ठहराई जा सकतीं। इसके बावजूद अंतिम स्पष्टता न मिल पाने से किसान वर्षों से असमंजस में हैं।

17 मार्च: राहत या फिर प्रतीक्षा?

किसानों के लिए 17 मार्च की तारीख सिर्फ एक सुनवाई नहीं, बल्कि 14 वर्षों की प्रतीक्षा का संभावित उत्तर है। यदि अदालत मुआवजा निर्धारण के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करती है, तो यह न केवल बिलासपुर–रायपुर परियोजना बल्कि देशभर की समान अधिग्रहण प्रक्रियाओं के लिए भी मिसाल बन सकता है।

फिलहाल निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं—क्या इस बार वर्षों से चल रही कानूनी धुंध साफ होगी, या संघर्ष की घड़ी और लंबी खिंचेगी।

Bhaskar Mishra

पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग 16 साल का अनुभव।विभिन्न माध्यमों से पत्रकारिता के क्षेत्र मे काम करने का अवसर मिला।यह प्रयोग अब भी जारी है।कॉलेज लाइफ के दौरान से पत्रकारिता से गहरा जुड़ाव हुआ।इसी दौरान दैनिक समय से जुडने का अवसर मिला।कहानी,कविता में विशेष दिलचस्पी ने पहले तो अधकचरा पत्रकार बनाया बाद में प्रदेश के वरिष्ठ और प्रणम्य लोगों के मार्गदर्शन में संपूर्ण पत्रकारिता की शिक्षा मिली। बिलासपुर में डिग्री लेने के दौरान दैनिक भास्कर से जु़ड़ा।2005-08 मे दैनिक हरिभूमि में उप संपादकीय कार्य किया।टूडे न्यूज,देशबन्धु और नवभारत के लिए रिपोर्टिंग की।2008- 11 के बीच ईटीवी हैदराबाद में संपादकीय कार्य को अंजाम दिया।भाग दौड़ के दौरान अन्य चैनलों से भी जुडने का अवसर मिला।2011-13 मे बिलासपुर के स्थानीय चैनल ग्रैण्ड न्यूज में संपादन का कार्य किया।2013 से 15 तक राष्ट्रीय न्यूज एक्सप्रेस चैनल में बिलासपुर संभाग व्यूरो चीफ के जिम्मेदारियों को निभाया। 1998-2000 के बीच आकाशवाणी में एनाउँसर-कम-कम्पियर का काम किया।वर्तमान में www.cgwall.com वेबपोर्टल में संपादकीय कार्य कर रहा हूं।
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