Chhattisgarh BJP- शोर में बदल रही भीतर की खामोशी…..? दिग्गजों के बीच खिंच रही तलवारें…
यह इत्फाक है कि सत्ता की राजनीति में आपसी खींचतान का केंद्र बने बिलासपुर में हाल के दिनों में एक और घटना हुई। जब युवा महोत्सव के कार्यक्रम में शामिल होने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय भी बिलासपुर आए। मंच पर बैठने का इंतजाम कुछ इस तरह किया गया कि बीजेपी के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री बिलासपुर के कई बार के विधायक अमर अग्रवाल को पीछे की लाइन में कुर्सी मिली। ऐसे में उनका असहज होना स्वाभाविक था।

Chhattisgarh BJP/( रुद्र अवस्थी ) दीवारों पर टंगे नए साल के कैलेंडर में 5 जनवरी की तारीख दर्ज थी…..। घड़ी का कांटा 11 बजे के आस पास घूम रहा था….। उस वक्त उप मुख्यमंत्री अरुण साव सकरी, बिलासपुर के बचन बाई सरकारी हाई स्कूल में होने वाले कार्यक्रम में जाने की तैयारी कर रहे थे …….। जहां नगर निगम की ओर से दिन में करीब 11:30 बजे सकरी जोन के तहत कई विकास कार्यों का लोकार्पण और भूमि पूजन कार्यक्रम आयोजित किया गया था……। अरुण साव इस जलसे में मुख्य मेहमान के रूप में जाने वाले थे ।कार्यक्रम के कार्ड बांट चुके थे…… फूलों की मालाएं खरीदी जा चुकी थीं… और नाश्ते का भी इंतजाम हो चुका था …..। पूरी तैयारी थी…. सिर्फ कार्यक्रम शुरू होने की देरी थी…..। ठीक इसी वक्त खबर आती है कि अपरिहार्य कारणों से कार्यक्रम स्थागित कर दिया गया है । “अपरिहार्य कारणों” की तह तक जाने की कोशिश में लगे लोगों को बाद में जो कुछ पता चला उसका लब्बोलुआब यही है कि एन वक्त पर दिल्ली से केंद्रीय मंत्री तोखन साहू के दफ्तर से फोन आया और इस बात को लेकर नाराजगी जताई गई कि यह कार्यक्रम क्षेत्रीय सांसद और केंद्रीय मंत्री की गैर मौजूदगी में कैसे कराया जा रहा है ? जबकि इसमें शामिल कई कार्य केंद्र सरकार की योजनाओं के तहत कराए गए हैं या कराए जा रहे हैं ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता तखतपुर के विधायक धर्मजीत सिंह करने वाले थे । अति विशिष्ट अतिथि के रूप में बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला और बिलासपुर महापौर श्रीमती पूजा अशोक विधानी का भी नाम कार्ड में लिखा गया था । शायद यह कार्यक्रम होता तो उस खबर को मीडिया में उतनी जगह ना मिल पाती, जितनी जगह इस कार्यक्रम के स्थगित होने के बाद मिली और केंद्रीय मंत्री तोखन साहू व डिप्टी सीएम अरुण साव के बीच की खींचतान से जुड़ी चर्चाओं को पंख लग गए। डिप्टी सीएम अरुण साव और केंद्रीय मंत्री तोखन साहू दोनों का नाता लोरमी इलाके से है। दोनों नेता साहू समाज से आते हैं । दोनों नेताओं के बीच खींचतान की खबरें समय-समय पर आती रहती हैं। लिहाजा सियासी हल्कों में माना गया कि यह केवल कार्ड में अतिथि के रूप में तोखन साहू का नाम गायब होने या उन्हें इस कार्यक्रम से दूर रखने तक ही सीमित नहीं है। अलबत्ता इसे दोनों नेताओं के बीच पनप रही खाई की गहराई को नापने के एक पैमाने की तरह देखा गया।
जाहिर सी बात है कि छत्तीसगढ़ की सियासत में साहू समाज से आने वाले नेताओं का अपना वजन है। 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले जब अरुण साव को प्रदेश भाजपा संगठन की कमान सौंपी गई तब भी ऐसा ही माना गया था कि बीजेपी ने ओबीसी तबके से एक बढ़िया नेता खोज लिया है। विधानसभा के चुनाव में भी अरुण साव की अपनी भूमिका रही और और एक समय तो उन्हें भावी मुख्यमंत्री के रूप में देखा जा रहा था। जब प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनी तो उन्हें उपमुख्यमंत्री का ओहदा हासिल हुआ।
उधर फ्लैशबैक में देखें तो तोखन साहू पहले भी लोरमी सीट से विधायक रह चुके थे। जाहिर है कि 2023 में उनका दावा लोरमी सीट पर रहा होगा। लेकिन उनकी जगह अरुण साव मैदान में उतरे तो यह चर्चा भी चली थी कि आने वाले समय में तोखन साहू को कोई दूसरी जिम्मेदारी मिल सकती है। कुछ महीने बाद हुए लोकसभा के चुनाव में बीजेपी ने तोखन साहू को बिलासपुर लोकसभा सीट से मैदान में उतारा। वे सांसद चुने गए और उन्हें केंद्र में मंत्री पद मिला। तब से यह बात भी सियासी हल्कों में चल रही है कि बीजेपी ने साहू समाज से तोखन साहू को बड़ी जिम्मेदारी देकर एक लंबी लकीर खींची है और पावर बैलेंस कायम करने की कोशिश की है। और तभी से दोनों नेताओं के बीच समय-समय पर खींचतान की खबरें सुर्खियां बंटोरती रही हैं।
दिल्ली की राजनीति में वजनदार पद हासिल करने की वजह से लोगों को पावर का पलड़ा तोखन साहू की तरफ झुकता दिखाई देता है। केंद्र सरकार में मंत्री पद मिलने के बाद वे मौके का बेहतर इस्तेमाल भी कर रहे हैं। दिल्ली में उनका संपर्क भी बढ़ा है और उनका वजन भी बड़ा है। जिसकी झलक समय-समय पर मिलती है और लगता है कि आने वाले समय में पार्टी नेतृत्व का भरोसा तोखन साहू पर और मजबूत हो सकता है।
यह इत्फाक है कि सत्ता की राजनीति में आपसी खींचतान का केंद्र बने बिलासपुर में हाल के दिनों में एक और घटना हुई। जब युवा महोत्सव के कार्यक्रम में शामिल होने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय भी बिलासपुर आए। मंच पर बैठने का इंतजाम कुछ इस तरह किया गया कि बीजेपी के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री बिलासपुर के कई बार के विधायक अमर अग्रवाल को पीछे की लाइन में कुर्सी मिली। ऐसे में उनका असहज होना स्वाभाविक था। नाराजगी का एहसास होने के बाद मुख्यमंत्री ने उन्हें अपने पास बुलाकर बाजू की कुर्सी में बिठाया। लेकिन तब तक चर्चाओं का गुब्बारा हवा में उड़ चुका था। जिसकी वजह से आम लोगों तक यह मैसेज पहुंचा कि बीजेपी में पुराने स्थापित नेताओं को किनारे लगाने की कवायद चल रही है। जिसके चलते इस तरह के सीन सरकारी कार्यक्रमों में भी नजर आने लगे हैं।
वैसे छत्तीसगढ़ बीजेपी इन दिनों ऐसे दौर से गुजरती हुई नजर आती है, जहां सत्ता में वापसी के बाद संगठन के भीतर
अनुशासन और समन्वय को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। चुनाव में जीत के बाद आमतौर पर पार्टी के भीतर स्थिरता, उत्साह और तालमेल की उम्मीद की जाती है। लेकिन इसके उलट अप्रत्याशित विवाद लगातार सुर्खियों बटोर रहे हैं। बिलासपुर से रायपुर तक हालिया घटनाएं सिर्फ प्रशासनिक या प्रोटोकॉल की चूक नहीं है बल्कि यह संकेत है कि भाजपा के भीतर सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है।
रायपुर सांसद और भाजपा के वरिष्ठ नेता बृजमोहन अग्रवाल ने स्काउट गाइड जंबूरी को लेकर जो मुद्दा उठाया उसे भी गंभीर और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा गया है। उन्होंने आयोजन में आर्थिक और प्रशासनिक अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए मामला हाई कोर्ट तक पहुंचा दिया। राजनीतिक विश्लेषक की यह भी मानते हैं कि बृजमोहन अग्रवाल जैसे पार्टी के वरिष्ठ नेता का सीधे अदालत का दरवाजा खटखटाना इस बात का संकेत है कि वह सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं दे रहे हैं। बल्कि संगठन के भीतर समाधान की उम्मीद नजर नहीं आती, इसलिए अदालती दखल ही उन्हें आखिरी रास्ता नजर आ रहा है। न्यायधानी बिलासपुर से लेकर राजधानी रायपुर तक बीजेपी में हाल के दिनों की इन घटनाओं को सामने रखकर लोग सवाल कर रहे हैं कि भाजपा के भीतर तालमेल की परंपरागत ताकत कहीं कमजोर तो नहीं पड़ रही है ? सवाल यह भी है कि क्या पार्टी के अंदर संवाद की कमी है ? गुटीय असहमति बढ़ती जा रही है ? व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का टकराव नजर आ रहा है और क्या संगठनात्मक अनुशासन में ढील का संकेत है ?
इन घटनाओं से यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या छत्तीसगढ़ बीजेपी के भीतर की ख़ामोशी अब शोर में बदलती जा रही है ? सवाल यह भी है कि छत्तीसगढ़ में चुनाव जीतने के बाद सत्ता से लेकर संगठन तक बीजेपी में नए चेहरे पेश करने की कवायद के बीच से क्या नए समीकरण बन रहे हैं ? और क्या नए – पुराने के बीच तालमेल कायम करने की नई चुनौती पार्टी के सामने खड़ी हो गई है ? आम लोग उम्मीद करते हैं कि चुनाव जीतने के बाद पार्टी के पुराने – नए नेता आपस में तालमेल कर जन अपेक्षाओं के अनुरूप काम करेंगे। । लेकिन जब खुद सांसद हाईकोर्ट जाएँ, मंत्री और पदाधिकारी कार्ड और कुर्सी पर नाराज़ हों, और कार्यक्रम बिना कारण स्थगित हों—तो लिफाफा खोले बिना भी भीतर का मजमून पढ़ा जा सकता है।
राज्य की राजनीति पर नजर रखने वाले विश्लेषकों के लिए ये घटनाएँ असामान्य नहीं, बल्कि स्वाभाविक हैं। सत्ता परिवर्तन के बाद पार्टी के भीतर पद, प्रभाव और नियंत्रण का बंटवारा नए सिरे से होता है । अभी हाल शायद इसका ही दौर चल रहा है। लेकिन जब यह वितरण प्रणाली खुले विवादों में बदल जाए, तो यह भी पूछा जा सकता है कि क्या इसका असर पार्टी की छवि और उसकी शासन क्षमता पर पड़ता है ?
भाजपा के पास राष्ट्रीय नेतृत्व का मजबूत ढाँचा है, और आमतौर पर संगठनात्मक शुचिता उसकी पहचान मानी जाती है। लेकिन यदि छत्तीसगढ़ में समन्वय तुरंत बहाल नहीं हुआ तो—छोटे विवाद बड़े विवादों में बदलेंगे, गुटीय खींचतान रणनीति पर हावी होगी,और विपक्ष को बैठे-बैठे मुद्दे मिलते रहेंगे।




