बिलासपुर…स्कूलों की गुणवत्ता, अधोसंरचना और बच्चों की सुरक्षा को लेकर बैठकों में लगातार मंथन के बीच बिलासपुर में जर्जर स्कूल भवनों की स्थिति ने प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शहर में एक ही दिन दो स्कूलों में छत और फॉल्स सीलिंग का हिस्सा भरभराकर गिरा। दोनों घटनाओं में बच्चे बाल-बाल बच गए। एक घटना रात में हुई, जबकि दूसरी घटना के समय बच्चे मध्यान्ह भोजन के लिए कक्षाओं से बाहर थे। जनहानि नहीं हुई, लेकिन दोनों घटनाओं ने स्कूल भवनों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर खतरे की घंटी जरूर बजा दी है।

उत्कृष्ट स्कूल में छह कमरों की फॉल्स सीलिंग गिरी

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सत्यम चौक स्थित सेजेस डॉ. बी.आर. आंबेडकर उत्कृष्ट हिंदी-अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में तेज बारिश के बाद प्राचार्य कक्ष समेत छह कमरों की फॉल्स सीलिंग गिर गई। घटना रात में होने के कारण स्कूल में विद्यार्थी मौजूद नहीं थे। दिन में कक्षाएं संचालित होने के दौरान ऐसी घटना होती तो स्थिति गंभीर हो सकती थी।

स्कूल की जर्जर स्थिति और बारिश के दौरान पानी भरने की समस्या की जानकारी पहले ही शिक्षा विभाग तक पहुंचने की बात सामने आई है। ऐसे में सवाल यह है कि भवन की स्थिति की समय रहते तकनीकी जांच और आवश्यक मरम्मत क्यों नहीं कराई गई?

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घटना के बाद प्राचार्य ने कलेक्टर, नगर निगम आयुक्त और जिला शिक्षा अधिकारी को पत्र भेजकर 30 अगस्त तक अवकाश की अनुमति मांगी है। इस अवधि में मरम्मत कार्य पूरा कराने की बात कही गई है और 31 अगस्त से नियमित कक्षाएं शुरू करने की तैयारी है। हालांकि, केवल फॉल्स सीलिंग की मरम्मत पर्याप्त होगी या पूरे भवन की संरचनात्मक जांच कराई जाएगी, यह अभी महत्वपूर्ण सवाल है।

सरकंडा

छतें भरभराकर गिरीं, बच्चों की सुरक्षा रामभरोसे; फाइलें सरकती रहीं, प्रशासन मंथन में मशगूल!

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एक ही दिन दो स्कूलों में हादसे टले, सालभर पहले जर्जर बीईओ कार्यालय भी दे चुका था चेतावनी; प्रस्ताव अब तक जमीन पर नहीं

बिलासपुर। स्कूलों की गुणवत्ता, अधोसंरचना और बच्चों की सुरक्षा को लेकर बैठकों में लगातार मंथन के बीच बिलासपुर में जर्जर स्कूल भवनों की स्थिति ने प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शहर में एक ही दिन दो स्कूलों में छत और फॉल्स सीलिंग का हिस्सा भरभराकर गिरा। दोनों घटनाओं में बच्चे बाल-बाल बच गए। एक घटना रात में हुई, जबकि दूसरी घटना के समय बच्चे मध्यान्ह भोजन के लिए कक्षाओं से बाहर थे। जनहानि नहीं हुई, लेकिन दोनों घटनाओं ने स्कूल भवनों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर खतरे की घंटी जरूर बजा दी है।

उत्कृष्ट स्कूल में छह कमरों की फॉल्स सीलिंग गिरी

सत्यम चौक स्थित सेजेस डॉ. बी.आर. आंबेडकर उत्कृष्ट हिंदी-अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में तेज बारिश के बाद प्राचार्य कक्ष समेत छह कमरों की फॉल्स सीलिंग गिर गई। घटना रात में होने के कारण स्कूल में विद्यार्थी मौजूद नहीं थे। दिन में कक्षाएं संचालित होने के दौरान ऐसी घटना होती तो स्थिति गंभीर हो सकती थी।

स्कूल की जर्जर स्थिति और बारिश के दौरान पानी भरने की समस्या की जानकारी पहले ही शिक्षा विभाग तक पहुंचने की बात सामने आई है। ऐसे में सवाल यह है कि भवन की स्थिति की समय रहते तकनीकी जांच और आवश्यक मरम्मत क्यों नहीं कराई गई?

घटना के बाद प्राचार्य ने कलेक्टर, नगर निगम आयुक्त और जिला शिक्षा अधिकारी को पत्र भेजकर 30 अगस्त तक अवकाश की अनुमति मांगी है। इस अवधि में मरम्मत कार्य पूरा कराने की बात कही गई है और 31 अगस्त से नियमित कक्षाएं शुरू करने की तैयारी है। हालांकि, केवल फॉल्स सीलिंग की मरम्मत पर्याप्त होगी या पूरे भवन की संरचनात्मक जांच कराई जाएगी, यह अभी महत्वपूर्ण सवाल है।

सरकंडा के प्राथमिक स्कूल में छत का प्लास्टर गिरा

दूसरी घटना सरकंडा मुक्तिधाम के सामने स्थित शासकीय शास्त्री उच्चतर माध्यमिक बालक स्कूल के बगल में संचालित प्राथमिक स्कूल में हुई। यहां छत का प्लास्टर भरभराकर नीचे गिर गया। स्कूल में करीब 165 बच्चे अध्ययनरत हैं। घटना के समय बच्चे मध्यान्ह भोजन के लिए कक्षाओं से बाहर थे, इसलिए किसी तरह की जनहानि नहीं हुई।

एक ही दिन दो स्कूलों में छत और फॉल्स सीलिंग गिरने की घटनाएं सामने आने के बाद अब सवाल केवल मरम्मत का नहीं, बल्कि स्कूल भवनों की नियमित सुरक्षा जांच का है। दोनों जगह बच्चे सुरक्षित रहे, लेकिन दोनों घटनाओं ने यह जरूर दिखा दिया कि खतरा मौजूद था।

बीईओ कार्यालय भी दे चुका है ऐसी ही चेतावनी

स्कूल भवनों की स्थिति पर सवाल इसलिए भी गंभीर हैं क्योंकि शिक्षा विभाग का अपना विकासखंड शिक्षा कार्यालय भी जर्जर भवन की समस्या से गुजर चुका है। करीब एक वर्ष पहले यहां फॉल्स सीलिंग और प्लास्टर गिरने की घटना हुई थी। वह घटना भी रात में हुई, जिससे किसी अधिकारी या कर्मचारी को चोट नहीं आई।

उस समय तत्कालीन जिला प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लिया था। भवन की स्थिति का आकलन कर प्रस्ताव भेजने और यह तय करने के निर्देश दिए गए थे कि भवन में किस तरह का निर्माण या मरम्मत संभव है और उसे कितना मजबूत बनाया जा सकता है।

इसके बाद प्रस्ताव और पत्राचार आगे बढ़े, लेकिन भवन की समस्या के स्थायी समाधान की स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं है। यही सवाल अब स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी उठ रहा है—जब विभाग अपने ही कार्यालय की जर्जर स्थिति का स्थायी समाधान नहीं कर पाया तो स्कूल भवनों की निगरानी कितनी प्रभावी है?

मॉनिटरिंग है तो जर्जर भवन नजर क्यों नहीं आते?

स्कूलों में शैक्षणिक गुणवत्ता और विद्यार्थियों की सुविधाओं की निगरानी के लिए विभागीय व्यवस्था मौजूद है। ऐसे में भवनों की सुरक्षा भी नियमित निरीक्षण का हिस्सा है या नहीं, यह स्पष्ट होना चाहिए। यदि भवनों का निरीक्षण होता है तो जर्जर छत, कमजोर प्लास्टर, फॉल्स सीलिंग और बारिश के पानी की समस्या समय रहते चिन्हित क्यों नहीं हुई?

और यदि ऐसी तकनीकी जांच नियमित निरीक्षण का हिस्सा नहीं है तो मानसून के दौरान स्कूल भवनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विभाग की कार्ययोजना क्या है?

ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि स्कूलों में बड़ी संख्या में बच्चे प्रतिदिन कई घंटे बिताते हैं। भवन की छोटी सी तकनीकी खामी भी गंभीर दुर्घटना का कारण बन सकती है।

बैठकों से आगे बढ़कर जमीन पर कार्रवाई की जरूरत

स्कूल भवनों की स्थिति सुधारने के लिए समीक्षा और बैठकें जरूरी हैं, लेकिन मौजूदा घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि समीक्षा के साथ जमीन पर कार्रवाई भी जरूरी है। जिले के जर्जर स्कूल भवनों की सूची तैयार कर उनकी तकनीकी जांच कराना, जोखिम वाले हिस्सों को तत्काल उपयोग से बाहर करना और आवश्यक होने पर वैकल्पिक कक्षों की व्यवस्था करना अब प्राथमिकता होनी चाहिए।

साथ ही जिन भवनों के मरम्मत या पुनर्निर्माण के प्रस्ताव पहले से लंबित हैं, उनकी स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होनी चाहिए। कौन-सा प्रस्ताव कब भेजा गया, किस स्तर पर लंबित है और उसके लिए क्या कार्रवाई की गई—इन सवालों के जवाब व्यवस्था में पारदर्शिता लाएंगे।

हादसा टलना राहत है, समाधान नहीं

इन दोनों घटनाओं में जनहानि नहीं हुई, यह राहत की बात है। लेकिन हादसा टल जाना भवन को सुरक्षित होने का प्रमाण नहीं है। एक जगह रात होने के कारण कक्षाएं खाली थीं और दूसरी जगह बच्चे मध्यान्ह भोजन के लिए बाहर थे। यानी दोनों घटनाओं में सुरक्षा से ज्यादा परिस्थितियों ने साथ दिया।

अब जिला प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि इन घटनाओं को केवल मरम्मत तक सीमित न रखा जाए। पूरे जिले के सरकारी स्कूल भवनों की सुरक्षा स्थिति की समीक्षा हो और जहां भी जोखिम है, वहां तत्काल कदम उठाए जाएं।

बैठकों में बच्चों की सुरक्षा पर मंथन जरूरी है, लेकिन उसकी असली परीक्षा फाइलों में नहीं, स्कूल की छत के नीचे होती है। बिलासपुर में दो हादसे टल चुके हैं—अब अगली चेतावनी का इंतजार करने के बजाय कार्रवाई का समय है।

सरकंडा प्राथमिक स्कूल में छत का प्लास्टर गिरा

दूसरी घटना सरकंडा मुक्तिधाम के सामने स्थित शासकीय शास्त्री उच्चतर माध्यमिक बालक स्कूल के बगल में संचालित प्राथमिक स्कूल में हुई। यहां छत का प्लास्टर भरभराकर नीचे गिर गया। स्कूल में करीब 165 बच्चे अध्ययनरत हैं। घटना के समय बच्चे मध्यान्ह भोजन के लिए कक्षाओं से बाहर थे, इसलिए किसी तरह की जनहानि नहीं हुई।

एक ही दिन दो स्कूलों में छत और फॉल्स सीलिंग गिरने की घटनाएं सामने आने के बाद अब सवाल केवल मरम्मत का नहीं, बल्कि स्कूल भवनों की नियमित सुरक्षा जांच का है। दोनों जगह बच्चे सुरक्षित रहे, लेकिन दोनों घटनाओं ने यह जरूर दिखा दिया कि खतरा मौजूद था।

बीईओ कार्यालय भी दे चुका है ऐसी ही चेतावनी

स्कूल भवनों की स्थिति पर सवाल इसलिए भी गंभीर हैं क्योंकि शिक्षा विभाग का अपना विकासखंड शिक्षा कार्यालय भी जर्जर भवन की समस्या से गुजर चुका है। करीब एक वर्ष पहले यहां फॉल्स सीलिंग और प्लास्टर गिरने की घटना हुई थी। वह घटना भी रात में हुई, जिससे किसी अधिकारी या कर्मचारी को चोट नहीं आई।

उस समय तत्कालीन जिला प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लिया था। भवन की स्थिति का आकलन कर प्रस्ताव भेजने और यह तय करने के निर्देश दिए गए थे कि भवन में किस तरह का निर्माण या मरम्मत संभव है और उसे कितना मजबूत बनाया जा सकता है।

इसके बाद प्रस्ताव और पत्राचार आगे बढ़े, लेकिन भवन की समस्या के स्थायी समाधान की स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं है। यही सवाल अब स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी उठ रहा है—जब विभाग अपने ही कार्यालय की जर्जर स्थिति का स्थायी समाधान नहीं कर पाया तो स्कूल भवनों की निगरानी कितनी प्रभावी है?

मॉनिटरिंग है तो जर्जर भवन नजर क्यों नहीं आते?

स्कूलों में शैक्षणिक गुणवत्ता और विद्यार्थियों की सुविधाओं की निगरानी के लिए विभागीय व्यवस्था मौजूद है। ऐसे में भवनों की सुरक्षा भी नियमित निरीक्षण का हिस्सा है या नहीं, यह स्पष्ट होना चाहिए। यदि भवनों का निरीक्षण होता है तो जर्जर छत, कमजोर प्लास्टर, फॉल्स सीलिंग और बारिश के पानी की समस्या समय रहते चिन्हित क्यों नहीं हुई?

और यदि ऐसी तकनीकी जांच नियमित निरीक्षण का हिस्सा नहीं है तो मानसून के दौरान स्कूल भवनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विभाग की कार्ययोजना क्या है?

ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि स्कूलों में बड़ी संख्या में बच्चे प्रतिदिन कई घंटे बिताते हैं। भवन की छोटी सी तकनीकी खामी भी गंभीर दुर्घटना का कारण बन सकती है।

बैठकों से आगे जमीन पर कार्रवाई की जरूरत

स्कूल भवनों की स्थिति सुधारने के लिए समीक्षा और बैठकें जरूरी हैं, लेकिन मौजूदा घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि समीक्षा के साथ जमीन पर कार्रवाई भी जरूरी है। जिले के जर्जर स्कूल भवनों की सूची तैयार कर उनकी तकनीकी जांच कराना, जोखिम वाले हिस्सों को तत्काल उपयोग से बाहर करना और आवश्यक होने पर वैकल्पिक कक्षों की व्यवस्था करना अब प्राथमिकता होनी चाहिए।

साथ ही जिन भवनों के मरम्मत या पुनर्निर्माण के प्रस्ताव पहले से लंबित हैं, उनकी स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होनी चाहिए। कौन-सा प्रस्ताव कब भेजा गया, किस स्तर पर लंबित है और उसके लिए क्या कार्रवाई की गई—इन सवालों के जवाब व्यवस्था में पारदर्शिता लाएंगे।

हादसा टलना राहत है, समाधान नहीं

इन दोनों घटनाओं में जनहानि नहीं हुई, यह राहत की बात है। लेकिन हादसा टल जाना भवन को सुरक्षित होने का प्रमाण नहीं है। एक जगह रात होने के कारण कक्षाएं खाली थीं और दूसरी जगह बच्चे मध्यान्ह भोजन के लिए बाहर थे। यानी दोनों घटनाओं में सुरक्षा से ज्यादा परिस्थितियों ने साथ दिया।

अब जिला प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि इन घटनाओं को केवल मरम्मत तक सीमित न रखा जाए। पूरे जिले के सरकारी स्कूल भवनों की सुरक्षा स्थिति की समीक्षा हो और जहां भी जोखिम है, वहां तत्काल कदम उठाए जाएं।

बैठकों में बच्चों की सुरक्षा पर मंथन जरूरी है, लेकिन उसकी असली परीक्षा फाइलों में नहीं, स्कूल की छत के नीचे होती है। बिलासपुर में दो हादसे टल चुके हैं—अब अगली चेतावनी का इंतजार करने के बजाय कार्रवाई का समय है।