CG News:छत्तीसगढ़ लोक आयोग को बिलासपुर हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. हाई कोर्ट ने लोक आयोग की उन दो अलग-अलग अर्जियों को खारिज कर दिया है।

जिनमें आयोग ने वर्ष 2018 के अपने दो ऐतिहासिक फैसलों में संशोधन करने और अपनी शक्तियों व अधिकारों से जुड़ी तल्ख टिप्पणियों को हटाने की मांग की थी.

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि लोक आयोग जिन कानूनी निष्कर्षों और टिप्पणियों को हटाने की मांग कर रहा है।

वह मूल मामले की दोबारा सुनवाई (Re-hearing) कराने जैसी है. कोर्ट ने कहा कि यदि आयोग को 2018 के आदेश से कोई आपत्ति थी, तो उसके पास वैधानिक अपील का रास्ता खुला था.

विवाद की शुरुआत जल संसाधन विभाग में नाली निर्माण व लाइनिंग कार्य में वित्तीय अनियमितता के आरोपों से हुई थी।

 17 सितंबर 2012 को लोक आयोग ने अपनी जांच में तीन अधिकारियों-कर्मचारियों को दोषी मानते हुए सरकारी खजाने को ₹30,51,857.55 के नुकसान का आकलन किया.

आयोग ने विभाग के तत्कालीन सब-इंजीनियर जीएस ठाकुर (मुंगेली) और विक्टर मिंज (अंबिकापुर) समेत अन्य से राशि वसूलने, कड़ी विभागीय कार्रवाई करने और राज्य सरकार को 3 महीने में अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) प्रस्तुत करने का निर्देश दिया.

लोक आयोग की अनुशंसा पर राज्य सरकार ने 4 अक्टूबर 2012 को जीएस ठाकुर से एक-तिहाई राशि यानी ₹10,17,285.55 वसूलने का आदेश जारी कर दिया. इसके खिलाफ जीएस ठाकुर और विक्टर मिंज ने वर्ष 2012 में हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

3 जुलाई 2018 को जस्टिस पी. साम कोशी की एकल पीठ ने दोनों अधिकारियों की याचिकाओं को स्वीकार करते हुए वसूली आदेश को रद्द कर दिया था. कोर्ट ने अपने फैसले में महत्वपूर्ण सिद्धांत तय किए थे:

 सरकार ने वसूली आदेश से पहले अधिकारियों को कोई शो-कॉज नोटिस या अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया था.

हाई कोर्ट ने लोक आयोग की शक्तियों की सीमा तय करते हुए कहा था कि आयोग केवल जांच कर अपनी रिपोर्ट सरकार को भेज सकता है. आयोग किसी अधिकारी की सजा तय (Propose Punishment) नहीं कर सकता और न ही सरकार से अनुपालन रिपोर्ट मांगने का अधिकार रखता है.

8 साल बाद आयोग ने क्यों जताई आपत्ति और कोर्ट ने क्यों किया खारिज?

लोक आयोग ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से 2018 के फैसले के पैरा-9 में दर्ज टिप्पणियों पर आपत्ति दर्ज कराते हुए संशोधन अर्जी दाखिल की थी. आयोग का तर्क था कि ये टिप्पणियां ‘छत्तीसगढ़ लोक आयोग अधिनियम 2002’ की धारा 11(2) और 11(3) के विपरीत हैं और फैसले में विरोधाभास है.

जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की पीठ ने आयोग के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि आयोग केवल किसी स्पष्ट त्रुटि (Clerical Error) को ठीक कराने की मांग नहीं कर रहा

बल्कि कोर्ट द्वारा निकाले गए कानूनी निष्कर्षों को चुनौती दे रहा है. कोर्ट ने दोटूक कहा कि अर्जी के जरिए पुराने केस को दोबारा नहीं खोला जा सकता; यदि आयोग असहमत था, तो उसे उच्च पीठ में अपील दायर करनी चाहिए थी.