बिड़ला ओपन स्कूल में मासूमों के भविष्य की ‘नीलामी’: सीबीएसई के नाम पर खुला खेल—सिस्टम की खुली सरपरस्ती?
कोयले के बाद अब ‘शिक्षा’ में सौदा, एक कोड से कई कैंपस—नियमों की खुलेआम धज्जियां

बिलासपुर..न्यायधानी का शिक्षा जगत इन दिनों जिस दौर से गुजर रहा है, वह सीधे तौर पर व्यवस्था की साख पर सवाल खड़ा करता है। निजी स्कूल संचालकों और प्रशासनिक तंत्र की खुली सांठगांठ ने शिक्षा को बाजार में बदल दिया है, जहां नियम किताबों में हैं और जमीनी हकीकत में ‘मनमानी’ चल रही है।
व्यापार विहार में ‘बिरला ओपन माइंड इंटरनेशनल स्कूल’ के नाम पर चल रहा खेल अब किसी से छिपा नहीं है। फीस रसीदों पर सीबीएसई संबद्धता कोड 333052 का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है, जो मोपका स्थित परिसर से जुड़ा है, जबकि व्यापार विहार में अलग कैंपस संचालित हो रहा है। एक ही कोड पर कई ठिकाने चलाने का यह मॉडल सीधे तौर पर नियमों को ठेंगा दिखाता है, लेकिन जिम्मेदार विभाग आंखें मूंदे बैठा है।
यह सिर्फ तकनीकी खेल नहीं है, बल्कि अभिभावकों की जेब पर सीधा वार है। फीस का कोई स्पष्ट ब्योरा नहीं, वेबसाइट पर पारदर्शिता का अभाव और सूचना पटल पर सन्नाटा—सब कुछ बताता है कि यहां व्यवस्था नहीं, बल्कि ‘गोपनीयता’ का खेल चल रहा है।
किताबों के नाम पर भी वही कहानी दोहराई जा रही है। छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम की सस्ती और मानक किताबों को किनारे कर निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें थमाई जा रही हैं, और सीमित दुकानों की ओर रास्ता मोड़ दिया गया है। यह सब उस समय हो रहा है जब नियम साफ कहते हैं कि अभिभावकों पर किसी एक दुकान से खरीद का दबाव नहीं डाला जा सकता।
इसी कड़ी में शहर में यह चर्चा भी तेज है कि जो चेहरे पहले कोयले के कारोबार में हेराफेरी औरअनियमितताओं को लेकर सवालों के घेरे में रहे, वही अब शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय होकर बच्चों के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ कर रहे हैं। कोयले से कमाई गई ताकत अब स्कूलों के जरिए महंगी किताबों और शुल्क के दबाव में बदलती दिख रही है, जहां अभिभावकों को सीमित विकल्प देकर आर्थिक बोझ बढ़ाया जा रहा है। यह एंगल पूरे मामले को और गंभीर बना देता है, क्योंकि यहां सिर्फ नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि भरोसे का भी संकट खड़ा हो रहा है।
छत्तीसगढ़ फीस विनियमन अधिनियम 2020 और शासन के निर्देश यहां सिर्फ कागजों तक सीमित नजर आते हैं। न फीस पर नियंत्रण, न नियमों का पालन—सिस्टम पूरी तरह से निष्क्रिय दिख रहा है या फिर जानबूझकर आंखें फेर ली गई हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह सब वर्षों से चल रहा है और विभाग अनजान बना हुआ है—क्या यह संभव है? या फिर यह ‘अनदेखी’ दरअसल किसी बड़ी मिलीभगत की ओर इशारा करती है?
जिस ट्रस्ट के नाम पर पूरा संचालन खड़ा है, उसके मूल उद्देश्यों पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। जब नींव ही सवालों के घेरे में है, तो इमारत की वैधता पर भरोसा कैसे किया जाए?
शहर में यह कोई पहला मामला नहीं है। ब्रिलिएंट, नारायणा, अचीवर्स, सेंट जेवियर और केपीएस जैसे कई संस्थानों को लेकर भी इसी तरह की चर्चाएं लंबे समय से चल रही हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर हर बार सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाए जाते हैं।
अब यह मुद्दा सिर्फ एक स्कूल तक सीमित नहीं रहा। यह पूरे सिस्टम की सड़ांध को उजागर कर रहा है। अगर समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो वह दिन दूर नहीं जब अभिभावकों का भरोसा पूरी तरह टूट जाएगा और मासूमों का भविष्य इसी तरह ‘नीलामी’ की मंडी में बिकता रहेगा।





