बिलासपुर… जिला शिक्षा विभाग में पदोन्नति, पदस्थापना, अनुकंपा नियुक्ति, प्रतिनियुक्ति, अटैचमेंट और युक्तियुक्तकरण से जुड़े मामलों को लेकर महीनों से उठ रहे सवाल अब विभागीय कार्रवाई तक पहुंच गए हैं। कनिष्ठ लेखा परीक्षक सुनील कुमार यादव को तत्काल प्रभाव से निलंबित करने का आदेश जारी हुआ है। कार्रवाई ऐसे समय हुई है, जब इन प्रक्रियाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर कांग्रेस नेता अंकित गौरहा दस्तावेजों के साथ लगातार शिकायतें और निष्पक्ष जांच की मांग उठाते रहे हैं।

गौरहा ने 9 फरवरी से 4 मई 2026 के बीच पांच अलग-अलग शिकायतें प्रस्तुत कर शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे। इन शिकायतों में अनुकंपा नियुक्ति, प्रतिनियुक्ति, अटैचमेंट, युक्तियुक्तकरण, कोटा से जुड़े वित्तीय मामलों, पदोन्नति, पदस्थापना, वरिष्ठता और न्यायालयीन आदेशों के पालन जैसे मुद्दे शामिल थे। उन्होंने संबंधित मूल नस्ती, नोटशीट, पत्राचार, पदोन्नति एवं वरिष्ठता सूची तथा पदस्थापना संबंधी अभिलेखों की जांच कराने की मांग की थी।

गौरहा की शिकायतों का फोकस केवल आरोप लगाने तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने बार-बार यह मांग रखी कि संबंधित रिकॉर्ड की जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जाए और जिन स्तरों पर जिम्मेदारी सामने आए, वहां नियमानुसार जवाबदेही तय की जाए। मामला मुख्यमंत्री हेल्पलाइन तक भी पहुंचा।

गौरहा के सवाल सरकार के संज्ञान तक

मामला आगे बढ़ा तो अंकित गौरहा की ओर से उठाए गए सवाल केंद्रीय मंत्री तोखन साहू के संज्ञान में भी पहुंचे। जानकारी के अनुसार, उन्होंने प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए सरकार के स्तर पर इसकी जांच कराने और मामले को देखने की बात कही थी। इसके बाद इस प्रकरण को लेकर अन्य स्तरों से भी शिकायतें सामने आती गईं।

हालांकि शिकायतों का दायरा बाद में बढ़ा, लेकिन इस पूरे मामले में शुरुआत से दस्तावेजों के आधार पर सवाल उठाने और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच की मांग करने वालों में अंकित गौरहा प्रमुख रूप से सामने रहे।

शिकायतों में रिकॉर्ड की जांच पर जोर

गौरहा ने अपनी शिकायतों में विभागीय निर्णयों की केवल समीक्षा की मांग नहीं की, बल्कि संबंधित मूल अभिलेखों की जांच पर जोर दिया। पदोन्नति एवं वरिष्ठता सूची, पदस्थापना आदेश, नोटशीट, पत्राचार और संबंधित नस्तियों को जांच के दायरे में लेने की मांग की गई थी।

युक्तियुक्तकरण और पदोन्नति से जुड़े मामलों में शिक्षकों के अधिकार प्रभावित होने की शिकायतों को भी उन्होंने उठाया। उनका कहना था कि पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकता है कि किन स्तरों पर नियमों का पालन हुआ और कहां चूक हुई।

 डीईओ की भूमिका, लेखा परीक्षक निलंबित

प्रकरण की जांच आगे बढ़ने पर तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे की भूमिका भी जांच के दायरे में आई। जांच रिपोर्ट में युक्तियुक्तकरण और पदोन्नति प्रक्रिया से जुड़े बिंदुओं तथा नियमों के पालन को लेकर टिप्पणियां दर्ज की गईं।

अब विभाग ने कनिष्ठ लेखा परीक्षक सुनील कुमार यादव के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की है। आदेश में जांच समिति की रिपोर्ट, संबंधित अभिलेखों के परीक्षण और उनके जवाब का उल्लेख किया गया है। निलंबन के बाद अब उन अन्य बिंदुओं पर भी नजर है, जो इस पूरे प्रकरण की जांच के दायरे में रहे हैं।

शिकायत से कार्रवाई तक पहुंचा मामला

इस पूरे घटनाक्रम में एक बात स्पष्ट है कि शिक्षा विभाग की पदोन्नति, पदस्थापना और युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवाल अब केवल शिकायतों की फाइल तक सीमित नहीं हैं। शिकायतों के बाद जांच हुई और जांच के बाद विभागीय कार्रवाई सामने आई है।

अब बड़ा सवाल यह है कि जांच में सामने आए तथ्यों का असर उन शिक्षकों के मामलों पर क्या पड़ेगा, जिनकी पदोन्नति, पदस्थापना या युक्तियुक्तकरण को लेकर आपत्तियां उठाई गई थीं। क्या उनके मामलों की दोबारा समीक्षा होगी और यदि किसी का अधिकार प्रभावित हुआ है तो उसे उसका हक मिलेगा—यह आगे की कार्रवाई से स्पष्ट होगा।

मुद्दा व्यक्ति का नहीं, शिक्षकों के अधिकार का

अंकित गौरहा ने कहा कि उनकी शिकायतों का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाना नहीं था। उन्होंने दस्तावेजों के आधार पर विभागीय प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और प्रभावित शिक्षकों को उनका अधिकार दिलाने के लिए सवाल उठाए।

उन्होंने कहा कि शिकायतों के बाद जांच हुई और अब कार्रवाई सामने आई है। लेकिन उनका उद्देश्य केवल किसी एक कर्मचारी पर कार्रवाई तक सीमित नहीं है। पदोन्नति, पदस्थापना और युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया में जिन शिक्षकों का अधिकार प्रभावित हुआ है, उनके मामलों की भी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए।

गौरहा ने कहा कि जिन-जिन स्तरों पर जिम्मेदारी सामने आती है, वहां नियमानुसार जवाबदेही तय होनी चाहिए। शिकायत से जांच और जांच से कार्रवाई तक मामला पहुंच चुका है। अब अगला कदम प्रभावित शिक्षकों को उनका वास्तविक हक दिलाना होना चाहिए।