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डॉल्फिन के बाद फिर वही स्क्रिप्ट? ‘नारायणा मॉडल’ बेनकाब—अधूरी मान्यता, फीस मुंबई ट्रांसफर और अधिकारियों की लापरवाही से तैयार हो रही बड़े स्कैम की बुनियाद

डॉल्फिन प्रकरण की परछाईं में नारायणा: CBSE के नाम पर एडमिशन, नियम दरकिनार

बिलासपुर…छत्तीसगढ़ के रायपुर, दुर्ग-भिलाई और बिलासपुर सहित चार जिलों में संचालित नारायणा ई-टेक्नो स्कूलों की कार्यप्रणाली में सामने आए दस्तावेज और जमीनी तथ्य शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और नियामकीय नियंत्रण पर सीधे सवाल खड़े करते हैं। मान्यता, फीस वसूली, शैक्षणिक प्रक्रिया और प्रशासनिक ढांचे में स्पष्ट विसंगतियां दर्ज होती हैं, जहां संस्थान का पूरा नियंत्रण बाहरी इकाइयों के हाथ में केंद्रित है और स्थानीय स्तर पर जवाबदेही का अभाव दिखाई देता है।

चार जिलों में संचालन, नियंत्रण बाहरी हाथ में

नारायणा स्कूल नेटवर्क राज्य के कई जिलों में संचालित है, लेकिन इन संस्थाओं का प्रशासनिक और वित्तीय संचालन पूरी तरह बाहरी केंद्रों से नियंत्रित होता है। स्थानीय स्तर पर न कोई स्वतंत्र गारंटर मौजूद है और न ही ऐसा उत्तरदायी प्रतिनिधि जो संस्थान की गतिविधियों के लिए जवाबदेह हो। सभी निर्णय बाहरी कार्यालयों में लिए जाते हैं और स्थानीय स्तर पर केवल कर्मचारी कार्य करते हैं, जिससे जवाबदेही और नियंत्रण के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।

लीज भवन में संचालन, स्थायित्व पर सवाल

बिलासपुर के नेहरू नगर, अमेरी रोड स्थित नारायणा ई-टेक्नो स्कूल लीज पर लिए गए भवन में संचालित हो रहा है। संस्थान का अपना स्थायी ढांचा नहीं है, जबकि उसी स्थान से नियमित रूप से फीस वसूली और शैक्षणिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। अन्य जिलों में भवन व्यवस्था के संबंध में स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है, लेकिन बिलासपुर की स्थिति संस्थागत स्थायित्व और जवाबदेही पर सीधे प्रश्न खड़े करती है।

CBSE के नाम पर एडमिशन, संबद्धता बाद की

विद्यालय को 31 मार्च 2026 तक राज्य शासन से मान्यता प्राप्त रही, लेकिन इसी अवधि में अभिभावकों को CBSE संबद्धता बताकर प्रवेश दिया गया और उसी आधार पर फीस वसूली गई। उपलब्ध दस्तावेज स्पष्ट करते हैं कि CBSE संबद्धता सत्र 2026-27 से प्रभावी है।

पूरे शैक्षणिक सत्र के दौरान छात्रों को न राज्य बोर्ड के पाठ्यक्रम के अनुसार पढ़ाया गया और न ही CBSE के अनुरूप व्यवस्थित तैयारी कराई गई। कक्षा 5 के छात्रों को परीक्षा से ठीक पहले सीमित प्रैक्टिस पेपर देकर सीधे परीक्षा में शामिल किया गया, जिससे शैक्षणिक प्रक्रिया की निरंतरता और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हुई।

 नियमों की सीधी अनदेखी और मनमानी वृद्धि

विद्यालय में फीस तय करने के लिए किसी वैधानिक समिति का गठन नहीं किया गया और न ही जिला शिक्षा अधिकारी या नोडल अधिकारी की स्वीकृति ली गई। पिछले सत्र की तुलना में इस वर्ष लगभग 8 प्रतिशत फीस बढ़ाई गई, जबकि इसके लिए अभिभावकों को न पूर्व सूचना दी गई और न ही वृद्धि का कोई आधिकारिक आधार प्रस्तुत किया गया। फीस निर्धारण की पूरी प्रक्रिया राज्य के निर्धारित नियमों के विपरीत दर्ज होती है।

‘फ्री’ किताबों के नाम  अवैध  वसूली

विद्यालय प्रबंधन अपनी प्रकाशित पुस्तकों को निशुल्क बताता है, लेकिन शुल्क संरचना यह दर्शाती है कि उनकी लागत अन्य मदों में समाहित कर वसूली की जा रही है। पिछले सत्र में यह व्यवस्था लागू नहीं थी, जिससे शुल्क प्रणाली की पारदर्शिता पर सीधा प्रश्न खड़ा होता है।

फीस मुंबई खाते में, वित्तीय नियंत्रण खत्म

विद्यालय का छत्तीसगढ़ में कोई स्वतंत्र बैंक खाता संचालित नहीं होता और अभिभावकों से प्राप्त पूरी फीस सीधे मुंबई स्थित केंद्रीय खाते में जमा की जाती है। कर्मचारियों का PF और ESIC भी नेल्लोर और मुंबई स्थित कार्यालयों में जमा होता है। इस व्यवस्था में राज्य स्तर पर वित्तीय निगरानी, ऑडिट और नियंत्रण पूरी तरह समाप्त हो जाता है, जिससे फीस के उपयोग और सुरक्षा से जुड़ी प्रक्रिया अपारदर्शी बनी रहती है।

कार्यकारिणी में स्वतंत्र सदस्य नहीं, केवल कर्मचारी

राज्य स्तर पर जो कार्यकारिणी संरचना प्रस्तुत की जाती है, उसमें स्वतंत्र सदस्यों का अभाव है और इसमें केवल वेतनभोगी कर्मचारी ही शामिल हैं। इससे निर्णय प्रक्रिया पूरी तरह आंतरिक नियंत्रण में रहती है और संस्थागत पारदर्शिता प्रभावित होती है।

अभिभावकों की आपत्तियों पर दबाव

शिक्षण व्यवस्था, परीक्षा प्रक्रिया और फीस को लेकर अभिभावकों ने आपत्तियां दर्ज करनी चाहीं, लेकिन उन पर दबाव बनाया गया। कई अभिभावक खुलकर शिकायत दर्ज नहीं कर सके, जिससे स्थिति का पूरा स्वरूप सामने आने में बाधा बनी रही।

प्रशासन को जानकारी, फिर भी  मौन

जिला स्तर के संबंधित अधिकारियों को इन तथ्यों की जानकारी होने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। यह स्थिति प्रशासनिक निष्क्रियता को सीधे उजागर करती है और नियामकीय तंत्र की भूमिका पर सवाल खड़े करती है।

डॉल्फिन प्रकरण जैसा स्थापित पैटर्न

छत्तीसगढ़ में पहले सामने आए डॉल्फिन स्कूल प्रकरण में भी फीस, मान्यता और संचालन को लेकर इसी प्रकार की अनियमितताएं सामने आई थीं। वर्तमान मामला उसी तरह के ढांचे और कार्यप्रणाली को दोहराता हुआ दर्ज होता है, जहां केंद्रीकृत नियंत्रण और स्थानीय जवाबदेही का अभाव एक साथ मौजूद है।

नियमों का पालन नहीं, दस्तावेजों में विसंगतियां

सोसाइटी पंजीयन, राज्य मान्यता, फीस निर्धारण और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के पालन में दस्तावेजों के स्तर पर स्पष्ट खामियां दर्ज होती हैं। यह मामला अब केवल एक संस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर व्यापक असर डालता है।

छात्रों और अभिभावकों पर सीधा प्रभाव

पूरे घटनाक्रम का असर सीधे छात्रों की पढ़ाई, परीक्षा और भविष्य पर पड़ता है, जबकि अभिभावकों द्वारा जमा की गई फीस की पारदर्शिता और सुरक्षा भी स्पष्ट नहीं है। शिक्षा के क्षेत्र में इस प्रकार की कार्यप्रणाली संस्थागत विश्वास को कमजोर करती है और नियामकीय जवाबदेही की आवश्यकता को सामने लाती है।

Bhaskar Mishra

पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग 16 साल का अनुभव।विभिन्न माध्यमों से पत्रकारिता के क्षेत्र मे काम करने का अवसर मिला।यह प्रयोग अब भी जारी है।कॉलेज लाइफ के दौरान से पत्रकारिता से गहरा जुड़ाव हुआ।इसी दौरान दैनिक समय से जुडने का अवसर मिला।कहानी,कविता में विशेष दिलचस्पी ने पहले तो अधकचरा पत्रकार बनाया बाद में प्रदेश के वरिष्ठ और प्रणम्य लोगों के मार्गदर्शन में संपूर्ण पत्रकारिता की शिक्षा मिली। बिलासपुर में डिग्री लेने के दौरान दैनिक भास्कर से जु़ड़ा।2005-08 मे दैनिक हरिभूमि में उप संपादकीय कार्य किया।टूडे न्यूज,देशबन्धु और नवभारत के लिए रिपोर्टिंग की।2008- 11 के बीच ईटीवी हैदराबाद में संपादकीय कार्य को अंजाम दिया।भाग दौड़ के दौरान अन्य चैनलों से भी जुडने का अवसर मिला।2011-13 मे बिलासपुर के स्थानीय चैनल ग्रैण्ड न्यूज में संपादन का कार्य किया।2013 से 15 तक राष्ट्रीय न्यूज एक्सप्रेस चैनल में बिलासपुर संभाग व्यूरो चीफ के जिम्मेदारियों को निभाया। 1998-2000 के बीच आकाशवाणी में एनाउँसर-कम-कम्पियर का काम किया।वर्तमान में www.cgwall.com वेबपोर्टल में संपादकीय कार्य कर रहा हूं।
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