इस गांव में है चोरों का ‘एटीएम’…. ?

सूरजपुर/बिश्रामपुर ।कभी शांत और सुरक्षित मानी जाने वाली South Eastern Coalfields Limited की कोयलांचल नगरी बिश्रामपुर इन दिनों लगातार बढ़ रही चोरियों की घटनाओं से परेशान है। ऊपर से सख्ती और जीरो टॉलरेंस की बातें जरूर हो रही हैं, अवैध नशे के विरुद्ध बड़ी सख्त पुलिसिंग हो रही है । लेकिन चोरी के मामले में जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। हालात ऐसे बन गए हैं कि अब लोगों को अपने ही घर में सुरक्षा का भरोसा डगमगाने लगा है..।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस इलाके में चोरी की घटनाएं सबसे ज्यादा हो रही हैं, उसके एक किलोमीटर की परिधि में अनेक पुलिस अफसरों के निवास है। यह कोई सामान्य मोहल्ला नहीं SECL की कॉलोनी है। यहां बड़ी संख्या में कोल इंडिया कर्मचारी और अधिकारी रहते हैं, और यही इलाका एक तरह से पुलिस कर्मियों का गांव भी माना जाता है। जयनगर और विश्रामपुर थाना सहित जिले के कई पुलिस अधिकारी और जवान यहीं निवास करते हैं। SECL की ओर से कंपनी की आवासीय सुविधा मिलने के कारण कई लोग सालों से यहां रह रहे हैं।
इसके बावजूद, पुलिस की मौजूदगी के बीच यही इलाका चोरों के लिए सबसे आसान निशाना बनता जा रहा है। एक तरह से यह क्षेत्र अब चोरों का एटीएम बन गया है । ऐसा इलाका जहां चोर आसानी से आते हैं, वारदात करते हैं और खाली हाथ नहीं लौटते…।
इधर कॉलोनी के कर्मचारी और अधिकारी तीन शिफ्ट की नौकरी में उलझे रहते हैं। ऐसे में अब उन्हें ड्यूटी के साथ-साथ घर की सुरक्षा की चिंता भी सताने लगी है। स्थिति यह हो गई है कि लोग सोचने को मजबूर हैं कि नौकरी करें या घर की चौकीदारी। कुछ घंटों के लिए भी घर खाली छोड़ना जोखिम भरा लगने लगा है।
हाल ही में कॉलोनी में दो अलग-अलग सूने मकानों में चोरी की घटनाएं सामने आई। एक मामले में एफआईआर दर्ज की गई, जबकि दूसरे में केवल शिकायत लेकर कार्रवाई का भरोसा दिया गया..! लेकिन पुलिस झांकने तक नहीं गई।
अगर घटनाओं को ध्यान से देखा जाए, तो ऐसा लगता है कि चोरियां अचानक नहीं हो रहीं, यह एक तय पैटर्न पर हो रही हैं। चोर जानते है पुलिस सुस्त है। बहुत से लोग अवैध रूप से रह रहे है। इसलिए चोर पहले इलाके की रेकी करते हैं । कभी कबाड़ी बनकर, कभी कोई फेरी बेचने के बहाने, तो कभी चंदा लेने के नाम पर। वे यह समझते हैं कि कौन सा घर कब खाली रहता है और किस समय इलाके में आवाजाही कम होती है। इसके बाद टारगेट तय कर महज 10 से 15 मिनट में वारदात को अंजाम देकर निकल जाते हैं।
सबसे अहम बात यह सामने आ रही है कि इन वारदातों में बाहरी लोगों से ज्यादा स्थानीय जानकारी रखने वालों की भूमिका होने की आशंका है। यानी चोरों को पहले से पता होता है कि कहां क्या रखा है और कब मौका मिलेगा।
पुलिस मानती है कि गश्त और निगरानी बढ़ाई गई है, लेकिन स्थानीय लोगों का अनुभव इससे अलग नजर आता है। लोगों का आरोप है कि कई मामलों में घटनास्थल पर जरूरी जांच नहीं हो पाती, फॉरेंसिक टीम भी हर बार नहीं पहुंचती और तकनीक का उपयोग सीमित ही दिखाई देता है। गश्त भी कागजों में ज्यादा और जमीन पर कम नजर आती है।
लोगों के बीच यह चर्चा भी आम हो चली है कि अगर पुलिस चाहे तो इन चोरियों पर लगाम लगाई जा सकती है..। जरूरत है चोरों की पूरी क्रोनोलॉजी रेकी, टारगेट, वारदात और माल खपाने के तरीके को समझकर उनसे चार कदम आगे की वैज्ञानिक और ए आई आधारित रणनीति बनाने की है। लेकिन हालात ऐसे हैं कि चोरों की तैयारी मजबूत दिख रही है और पुलिस की प्रतिक्रिया कमजोर…।
कुल मिलाकर, बिश्रामपुर में चोरी की घटनाएं यह आम सी छोटी-मोटी वारदात नहीं यह लोगों के भरोसे और सुरक्षा की भावना से जुड़ा गंभीर मुद्दा भी हैं। जरूरत इस बात की है कि पुलिस घटना के बाद नहीं, वह पहले से सक्रिय हो। इलाके में गश्त बढ़े, संदिग्धों पर नजर रखी जाए और तकनीक का प्रभावी इस्तेमाल हो..! वरना हालात ऐसे ही रहे, तो सवाल यह नहीं रहेगा कि अगली चोरी कहां होगी… सवाल होगा होगा कि अगला नंबर किसका है..!





