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Bilaspur

चालान की बौछार और सियासी सवाल

बिलासपुर: (मनीष जायसवाल)शहर के सिर्फ चार चौक में ट्रैफिक सुधार की कहानी अब एक नए मोड़ पर आ खड़ी हुई है..। सवाल है कि जब हर घर में चालान का मैसेज पहुंच रहा है, तो इसका राजनीतिक नुकसान किसे होगा..? एक और दो सेकंड के ट्रैफिक सिग्नल जंप का जुर्माना जनता को तो जेब से देना ही पड़ रहा है, पर नाराज़गी किसके खाते में जाएगी..?

पूरा शहर घूम लीजिए सड़क पर अव्यवस्था जस की तस है। कई चौराहों पर सिग्नल की टाइमिंग बेमेल, कहीं मशीन बंद, कहीं कैमरा चालू। लेफ्ट फ्री लेन पर ऑटो और ठेले जमा, मुख्य मार्गो के किनारे अवैध पार्किंग, दुकानों का सामान बाहर पड़ा हुआ है शहर की चौड़ी सड़कें दिन में गलियों में तब्दील हो रही है। जहां नजर जाए समस्या दिखाई देती है, समाधान नही…। लेकिन मोबाइल पर चालान का संदेश बिना चूक पहुंच जाता है।
ऐसा लगता है कि सरकार ने राजस्व कमाई का नया जरिया खोज लिया है।

ट्रैफिक व्यवस्था का संचालन छत्तीसगढ़ पुलिस के अधीन होता है, और नीति-निर्देशन अंततः सरकार के हाथ में है। ऐसे में जनता फर्क नहीं करती कि आदेश किस स्तर से आया। उसे बस इतना दिखता है कि जेब से पैसा जा रहा है और सड़क पर सुधार नजर नहीं आ रहा। यही वह बिंदु है जहां प्रशासनिक सख्ती धीरे-धीरे राजनीतिक असंतोष में बदलने लगती है..।

राजनीति का सरल गणित है जिसके समय में जनता पर बोझ बढ़े, नाराज़गी उसी के खाते में लिखी जाती है..। यदि हर मोहल्ले में, हर घर में चालान की चर्चा हो रही है, तो यह महज ट्रैफिक का विषय नहीं रहता, यह जनभावना का विषय बन जाता है..। लोग पूछने लगते है क्या सुधार का मतलब सिर्फ दंड है…? क्या अव्यवस्था की जिम्मेदारी भी तय होगी, या केवल चालक ही दोषी रहेगा..?

सख्ती जरूरी है, नियमों का पालन भी अनिवार्य है। लेकिन जब सुधार का चेहरा केवल चालान बन जाए और जाम, कब्जा, अवैध पार्किंग, ग़लत सिग्नल टाइमिंग पर ठोस कार्रवाई न दिखे, तो संदेश गलत जाता है..। जनता त्रस्त हो जाए तो उसका असर सिर्फ सड़क पर नहीं, सियासत पर भी पड़ता है..।

एक या दो सेकंड में सिग्नल जंप करने की छोटी-छोटी गलतियां जिससे बड़ी जनहानि नहीं हो सकती ऐसा करने वालो के घर आन लाइन चालान भेजना आक्रोश को बढ़ा रहा है। और यह इसलिए है क्योंकि सड़क पर सुविधाएं और व्यवस्थाएं दिखाई नहीं देती।
अब गेंद नीति-निर्माताओं के पाले में है। ट्रैफिक सुधार को संतुलित, न्यायपूर्ण और पारदर्शी रहे वरना हर घर पहुंचता चालान एक दिन चुनावी चर्चा का मुद्दा बन सकता है..।

Chief Editor

छत्तीसगढ़ के ऐसे पत्रकार, जिन्होने पत्रकारिता के सभी क्षेत्रों में काम किया 1984 में ग्रामीण क्षेत्र से संवाददाता के रूप में काम शुरू किया। 1986 में बिलासपुर के दैनिक लोकस्वर में उपसंपादक बन गए। 1987 से 2000 तक दिल्ली इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के राष्ट्रीय अखबार जनसत्ता में बिलासपुर संभाग के संवाददाता के रूप में सेवाएं दीं। 1991 में नवभारत बिलासपुर में उपसंपादक बने और 2003 तक सेवाएं दी। इस दौरान राजनैतिक विश्लेषण के साथ ही कई चुनावों में समीक्षा की।1991 में आकाशवाणी बिलासपुर में एनाउँसर-कम्पियर के रूप में सेवाएं दी और 2002 में दूरदर्शन के लिए स्थानीय साहित्यकारों के विशेष इंटरव्यू तैयार किए ।1996 में बीबीसी को भी समाचार के रूप में सहयोग किया। 2003 में सहारा समय रायपुर में सीनियर रिपोर्टर बने। 2005 में दैनिक हरिभूमि बिलासपुर संस्करण के स्थानीय संपादक बने। 2009 से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में बिलासपुर के स्थानीय न्यूज चैनल ग्रैण्ड के संपादक की जिम्मेदारी निभाते रहे । छत्तीसगढ़ और स्थानीय खबरों के लिए www.cgwall.com वेब पोर्टल शुरू किया। इस तरह अखबार, रेडियो , टीवी और अब वेबमीडिया में काम करते हुए मीडिया के सभी क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई है।
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