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शिक्षकों की खबरः टीईटी को लेकर संसद में उठा सवाल…. अब आगे क्या हो सकता है.. ?

सूरजपुर (मनीष जायसवाल)।नौ फरवरी को लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान सांसद लालजी वर्मा ने स्कूल शिक्षा मंत्रालय से शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी टीईटी को लेकर कई सवाल किए। इन सवालों के जवाब के बाद वर्ष 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों का मामला एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है..। शिक्षा मंत्रालय ने बताया कि अब यह पूरा विषय सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर 2025 के फैसले और निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के वैधानिक ढांचे के तहत संचालित होगा..। सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि 2011 से पहले जिन शिक्षकों की नियुक्ति हुई थी, वह उस समय लागू नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार की गई थी, जब टीईटी जैसी कोई अनिवार्यता प्रभाव में नहीं थी..। इसके बाद बने कानून और अदालती व्याख्याओं के कारण आज वही शिक्षक टीईटी की शर्तो, पदोन्नति की अड़चनों और सेवा से जुड़ी अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं।

सरकार की ओर से यह भी जानकारी दी गई कि टीईटी की अनिवार्यता आरटीई अधिनियम की धारा 23 के तहत 23 अगस्त 2010 को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद की अधिसूचना से लागू हुई थी, जबकि इसका व्यावहारिक क्रियान्वयन देश के विभिन्न राज्यों में वर्ष 2011 से शुरू हुआ। और यही वजह है कि 2011 से पहले नियुक्त शिक्षक यह दलील देते हैं कि उनकी नियुक्ति ऐसे समय हुई थी, जब टीईटी नाम की कोई शर्त अस्तित्व में नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने 1 सितंबर 2025 के फैसले में इस विवाद को संतुलित करने का प्रयास किया है। जिन शिक्षकों की सेवा अवधि पांच वर्ष से अधिक शेष है, उन्हें सेवा में बने रहने के लिए दो वर्ष के भीतर टीईटी उत्तीर्ण करने का अवसर दिया गया है। वहीं जिन शिक्षकों की सेवा अवधि पांच वर्ष से कम बची है, उन्हें बिना टीईटी पास किए सेवानिवृत्ति की आयु तक काम करने की अनुमति दी गई है, हालांकि पदोन्नति पर रोक भी लगाई गई है। कागज पर यह व्यवस्था संतुलित दिखाई देती है, जमीन पर स्थिति अलग नजर आती है। दशकों तक गांव-देहात और दूरस्थ इलाकों में स्कूल संभालने वाले हजारों शिक्षक इसे अपने साथ अन्याय के रूप में देख रहे हैं। अचानक परीक्षा और पदोन्नति को जोड़ देने से शिक्षकों में मानसिक दबाव और असमंजस की स्थिति बन रही है।वही टेट परीक्षा में सवाल भी केंद्रीय प्रशासनिक सेवा के समक्ष के हो गए है।

इस पृष्ठभूमि में लोकसभा में सवाल और जवाब के बाद आगे की संभावनाओं पर चर्चा तेज हो गई है। संसद केवल सवाल पूछने का मंच नहीं है, यहां नीतियों पर पुनर्विचार और सुधार की संवैधानिक गुंजाइश भी मौजूद है। कोई भी संवेदनशील सांसद इस मुद्दे को शून्यकाल में, संसदीय नियमों के तहत या संसदीय समिति के माध्यम से आगे बढ़ा सकता है। यह तर्क रखा जा सकता है कि जिन शिक्षकों की नियुक्ति टीईटी लागू होने से पहले हुई थी, उन पर बाद में जोड़ी गई शर्ते स्वाभाविक न्याय की भावना के अनुरूप नहीं बैठती, भले ही अदालत ने एक अस्थाई रास्ता सुझाया हो।

इसी कड़ी में प्राइवेट मेंबर बिल की संभावना भी बनती है। कोई सांसद चाहें तो ऐसा विधेयक पेश कर सकता है, जिसमें आरटीई अधिनियम और टीईटी अनिवार्यता से पहले नियुक्त शिक्षकों के लिए एक स्पष्ट, समान और मानवीय राष्ट्रीय नीति बनाने का प्रस्ताव हो..। लेकिन ऐसे विधेयक का कानून बन पाना आसान नहीं होता, फिर भी इससे सरकार पर नैतिक और राजनीतिक दबाव तो बनता है। पहले भी कई मामलों में प्राइवेट मेंबर बिलों ने सरकार को नीति में बदलाव या दिशा-निर्देश जारी करने के लिए प्रेरित किया है। इस मामले में भी राज्यों से परामर्श कर कोई व्यावहारिक समाधान निकलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

सांसदों और शिक्षकों का रिश्ता इस मुद्दे को और अहम बना देता है। शिक्षक समुदाय देश के हर कोने में फैला हुआ है। गांव से लेकर शहर तक शिक्षक केवल पढ़ाने वाला नहीं, समाज को दिशा देने वाला व्यक्ति भी माना जाता है। संख्या के लिहाज से भी शिक्षक एक बड़ा शिक्षित वर्ग हैं, जिनका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव लंबे समय से देखा जाता रहा है..। चुनाव के समय सांसद इन्हीं शिक्षकों के बीच जाते हैं, स्कूलों में बैठते हैं और उनकी समस्याएं सुनते हैं। ऐसे में टीईटी को लेकर वर्षो से चली आ रही अनिश्चितता सांसदों के लिए भी नजर अंदाज करने वाला विषय नहीं रह जाती।

कुल मिलाकर लोकसभा में उठे सवाल और सरकार की ओर से दी गई जानकारी के बाद इतना तो तय है कि कानूनी स्थिति फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार तय है, पर नीतिगत और मानवीय स्तर पर बहस की गुंजाइश अभी भी बनी हुई है..। यदि कोई सांसद इस मुद्दे पर गंभीर पहल करता है, तो वह शिक्षकों की आवाज को संसद तक पहुंचाने का मजबूत माध्यम बन सकता है। अदालत के फैसले का सम्मान रखते हुए भी संसद के भीतर संवाद, सुझाव और वैकल्पिक रास्ते तलाशे जा सकते हैं, ताकि देश भर के शिक्षकों में फैली अनिश्चितता कुछ हद तक कम हो सके..।

Chief Editor

छत्तीसगढ़ के ऐसे पत्रकार, जिन्होने पत्रकारिता के सभी क्षेत्रों में काम किया 1984 में ग्रामीण क्षेत्र से संवाददाता के रूप में काम शुरू किया। 1986 में बिलासपुर के दैनिक लोकस्वर में उपसंपादक बन गए। 1987 से 2000 तक दिल्ली इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के राष्ट्रीय अखबार जनसत्ता में बिलासपुर संभाग के संवाददाता के रूप में सेवाएं दीं। 1991 में नवभारत बिलासपुर में उपसंपादक बने और 2003 तक सेवाएं दी। इस दौरान राजनैतिक विश्लेषण के साथ ही कई चुनावों में समीक्षा की।1991 में आकाशवाणी बिलासपुर में एनाउँसर-कम्पियर के रूप में सेवाएं दी और 2002 में दूरदर्शन के लिए स्थानीय साहित्यकारों के विशेष इंटरव्यू तैयार किए ।1996 में बीबीसी को भी समाचार के रूप में सहयोग किया। 2003 में सहारा समय रायपुर में सीनियर रिपोर्टर बने। 2005 में दैनिक हरिभूमि बिलासपुर संस्करण के स्थानीय संपादक बने। 2009 से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में बिलासपुर के स्थानीय न्यूज चैनल ग्रैण्ड के संपादक की जिम्मेदारी निभाते रहे । छत्तीसगढ़ और स्थानीय खबरों के लिए www.cgwall.com वेब पोर्टल शुरू किया। इस तरह अखबार, रेडियो , टीवी और अब वेबमीडिया में काम करते हुए मीडिया के सभी क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई है।
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