शिवरीनारायण : (मनीष जायसवाल)। राजनीतिक दलों की समीक्षा बैठक और अधिवेशन अक्सर चर्चा में रहते हैं। शिक्षकों के बीच इन दिनों छत्तीसगढ़ सहायक शिक्षक समग्र शिक्षक फेडरेशन का दो दिवसीय संगठन समीक्षा, संवाद एवं संकल्प प्रांतीय अधिवेशन चर्चा में है..। इसके पहले दिन शनिवार को शिवरीनारायण के तेंदुआधाम में प्रदेशभर के शिक्षक नेताओं का जमावड़ा लगा। जिलों और सभी विकासखंडों से पदाधिकारी पहुंचे थे। अधिवेशन के पहले दिन लंबित मांगों की बात हुई। TET की बात हुई। मोदी की गारंटी में किए गए वादों को पूरा कराने की बात हुई…। मगर इस आयोजन को सिर्फ मांगों का अधिवेशन कहना ठीक नहीं होगा। यहां संगठन ने अपने लोगों को सामने बैठाकर यह भी देखने की कोशिश की कि सरकार के करीब तीन साल पूरे होने के बीच शिक्षकों के मुद्दे कहां खड़े हैं। संगठन कहां से चला, कहां रुका और अब किस दिशा में जा रहा है..!

 

फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र राठौर ने अध्यक्षीय भाषण से अधिवेशन की शुरुआत की। प्रदेश भर से पहुंचे पदाधिकारियों का स्वागत करते हुए उन्होंने फेडरेशन को शिक्षकों का परिवार और उनकी सामूहिक आवाज बताया। उनका कहना था कि संगठन का हर पदाधिकारी इसकी ताकत है। अब समय सिर्फ बैठकर बात करने का नहीं है। अपने अधिकार और किए गए वादों को पूरा कराने के लिए संगठन को अपनी बात मजबूती से रखनी होगी।

 

फेडरेशन के संस्थापक सदस्य रंजीत बनर्जी ने अधिवेशन के नाम में छिपी बात के बारे में बताया कि प्रकृति में कोई क्रिया बेकार नहीं जाती। उसकी कोई न कोई प्रतिक्रिया होती है। मगर जीवन और संगठन में सिर्फ ताकत लगा देना काफी नहीं होता। ताकत किस दिशा में लग रही है, यह भी देखना पड़ता है…। उन्होंने शिक्षक को रचनाकार और नवाचारी बताते हुए कहा कि संगठन भी उसी तरह है। नाविक पतवार पूरी ताकत से चलाता रहे और उसे किनारा ही पता न हो तो नाव आगे जाने के बजाय लहरों में घूमती रहेगी। इसलिए संगठन के पास ताकत है तो उसके साथ दिशा भी होनी चाहिए…।

 

शिक्षक नेता अश्विनी कुर्रे ने इसी बात को आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा कि न्यूटन का नियम अपनी जगह है, मगर जीवन का गणित सिर्फ बल का गणित नहीं है..। विवेक और दिशा भी जरूरी है..। संगठन में संख्या है, सामर्थ्य है, पदाधिकारी हैं, शिक्षक हैं। जरूरत इस बात की है कि यह ताकत किस दिशा में लगाई जाए..।

 

यही इस अधिवेशन की बड़ी बात भी थी। मांगें अपनी जगह है, लेकिन संगठन के भीतर यह बात भी चल रही थी कि आगे की लड़ाई कैसी हो..! मोदी की गारंटी के नाम से किए गए वादों को पूरा कराने के लिए संगठन आगे क्या करेगा, इस पर भी चर्चा हुई। रंजीत बनर्जी ने बताया कि अधिवेशन में इन वादों को लेकर संकल्प लिया जाएगा और आने वाले दिनों में इन्हीं मुद्दों को लेकर संगठन अपनी दिशा तय करेगा..!

 

टीईटी का मुद्दा यहां चर्चा में था सिराज बक्श ने कहा कि एक साल में तीन बार विभागीय टीईटी कराने की बात कही गई थी, लेकिन अभी तक कोई ठोस योजना सामने नहीं आई है…। परीक्षा कब होगी, कैसे होगी और आगे की प्रक्रिया क्या होगी, इसे लेकर शिक्षकों में असमंजस है। फेडरेशन ने विभाग से नीति और समय-सारणी की मांग की है।

 

प्रदेश सचिव राजू टंडन ने बात को शिक्षक से निकालकर बच्चे तक ले गए। उन्होंने कहा कि संगठन का काम शिक्षक की सेवा संबंधी मांगों तक ही नहीं है। गांव के बच्चों की पढ़ाई, शिक्षा की गुणवत्ता और नई शिक्षा नीति में शिक्षक की भूमिका पर भी अधिवेशन में चर्चा का विषय है..। शिक्षक अपने अधिकार की बात करेगा तो बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी भी उसके साथ रहेगी..।

 

सरकार के रुख पर कटाक्ष करते हुए कौशल अवस्थी बताते है कि हुकूमत उस तिराहे पर खड़ी है, जहां वह सहायक शिक्षकों रूपी नींव की ईट को न तो उखाड़ सकती है और न ही उसे महल का हिस्सा मान पा रही है…। वह जानती है कि इस नींव को नजरअंदाज किया तो पूरी इमारत हिल जाएगी। फिर आखिर ऐसी कौन-सी अदृश्य जंजीरें हैं, जो फैसलों के हाथ बांधे बैठी है…? जो सरकार दरिया पार करने के दावे करती है, वह शिक्षकों के जायज हक के एक कदम पर आकर पशोपेश के दलदल में क्यों धंस जाती है…! टालमटोल की यह चुप्पी मजबूरी है या कुछ और, यह आने वाला समय बताएगा।

 

प्रदेश संयोजक एवं फेडरेशन के संस्थापक सदस्य मनीष मिश्रा ने सरकार के रुख पर तंज कसते हुए कहते है कि शिक्षक समाज सालों से संयम का कड़वा घूंट पीकर लोकतांत्रिक मर्यादा की चौखट पर खड़ा है..। बातचीत के हर दौर में हमने उम्मीद की रोशनी खोजी, लेकिन हुकूमत के पिटारे से हमेशा कागजी आश्वासनों का झुनझुना ही निकला..। अब पानी सिर से ऊपर बह चुका है। कोरी सांत्वना के पत्तों से पेट नहीं भरता, अब ठोस निर्णय की जमीन चाहिए।आंदोलन की अगली दिशा किसी बंद कमरे का फरमान नहीं, शिक्षक बिरादरी की सामूहिक हुंकार से तय होगी।

 

अधिवेशन में प्रदेश स्तर पर राजू टंडन, देवेंद्र हरमुख, शेषनाथ पांडेय, बसंत कौशिक, कौशल अवस्थी, सुरजीत सिंह चौहान, अश्वनी कुर्रे, सिराज बक्श, आदित्य गौरव साहू, दिनेश नायक, पुरुषोत्तम झाड़ी, हैम कुमार साहू, तरुण वैष्णव, अशोक धुर्वे, छबि राम पटेल, राजा राम पटेल, प्रदीप पटेल, गोकुल प्रसाद जायसवाल, आलोक त्रिवेदी, इंद्रजीत शर्मा, टिकेश्वर बोय, दीनबंधु वैष्णव, उमा पांडे और बुधनी अजय सहित बड़ी संख्या में पदाधिकारी मौजूद रहे।

 

जिला स्तर पर दिनेश राठौर, सुरेश नेताम, संदीप पांडे, संकीर्तन नंद, सुधीर चौहान, निर्भय केवाची, धीरेन्द्र मांझी, देव राज खूंटे, मदन राठौर, महेश यालम, लखेश्वर वर्मा, मुरित श्रीवास, दौलत ध्रुव, सीपी डडसेना, राहुल, आशीष कुमार सिंह, अजय गुप्ता, कृष्णा वर्मा, हरीश कुमार, गोपाल और पोखन साहू सहित पदाधिकारी पहुंचे।

 

विकासखंडों से कृष्ण कुमार, संत कुमार साहू, अजय कुमार मधुकर, गणेश चौहान, लोकेश साहू, ममता प्रजापति, सरयूकांत बंजारे, कमलेश नायक, वीरेंद्र कुमार यादव, अजीत कुजूर, लोचन प्रसाद बांधे, मनोज कुमार भारद्वाज, महेंद्र कुमार पटेल, चरण राठौर, रोशन सहारे, राम स्वरूप साहू, राम सिंह नायक, मंडावी जोगा, धनसाय नाग, कन्हैया सोनवानी, तृपेश चापड़ी, कोदूराम देवांगन, बाबूलाल ध्रुव, जगदीश हितकर, छत्रपाल, मुकेश साहू, जयप्रकाश कश्यप और शैलेन्द्र मार्बल सहित बड़ी संख्या में पदाधिकारी शामिल हुए।

 

तेंदुआधाम में पहले दिन की इस बैठक में बहुत सी बातें हुई। कुछ बातें मांगों की थीं, कुछ संगठन की थीं और कुछ आने वाले दिनों की। किसी संगठन के लिए समीक्षा का मतलब सिर्फ हिसाब-किताब देखना नहीं होता। कभी-कभी अपने लोगों के बीच बैठकर यह देखना भी होता है कि साथ चलने वाले कितने हैं, रास्ता कौन सा है और मंजिल की तरफ कदम किस तरफ उठ रहे हैं। शायद इसी वजह से इस अधिवेशन का नाम संगठन समीक्षा, संवाद और संकल्प रखा गया था। अब देखना यह है कि तेंदुआधाम में हुई यह बातचीत संगठन के अगले फैसलों में कितनी दूर तक जाती है।